धर्म भय नहीं, विवेक और आत्मनिर्भयता का मार्ग है : अंशुल जैन शास्त्री
रिपोर्टर: मनोज जैन नायक
मुरैना/द्रोणगिरी। धर्म का वास्तविक स्वरूप मनुष्य को भयभीत करना नहीं, बल्कि उसके भीतर विवेक, आत्मविश्वास और निर्भयता का भाव जगाना है। धर्म के नाम पर यदि व्यक्ति भय, आडंबर और अंधविश्वास में उलझ जाता है, तो उसे ठहरकर यह विचार करने की आवश्यकता है कि वह धर्म के मूल स्वरूप को समझ रहा है या केवल बाहरी क्रियाओं को ही धर्म मान बैठा है। यह विचार भाव लेखक अंशुल जैन शास्त्री, द्रोणगिरी ने धर्म के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए व्यक्त किए।
धर्म के साथ भय क्यों जुड़ने लगता है?
अंशुल जैन शास्त्री ने कहा कि जब भी धर्म की बात आती है, व्यक्ति के मन में कई प्रकार के प्रश्न और आशंकाएं उत्पन्न होने लगती हैं। वह सोचने लगता है कि यदि उससे कोई धार्मिक गलती हो गई तो क्या होगा, जीवन में कोई अनिष्ट तो नहीं आएगा या किसी धार्मिक क्रिया को पूरा नहीं करने से उसे नुकसान तो नहीं उठाना पड़ेगा। यही आशंकाएं धीरे-धीरे मन में भय का रूप ले लेती हैं।
उन्होंने कहा कि जब भय व्यक्ति के मन और सोच पर हावी होने लगता है, तब उसकी विवेक-बुद्धि पीछे छूटने लगती है। इसके बाद वह कई बार ऐसी मान्यताओं और बाहरी क्रियाओं को अपनाने लगता है, जिनका धर्म के मूल उद्देश्य से कोई सीधा संबंध नहीं होता।
आडंबर और अंधविश्वास से ऊपर है धर्म
अंशुल जैन शास्त्री के अनुसार, समाज में कई बार लोग अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति को धार्मिक क्रियाओं से जोड़ देते हैं। कोई संतान प्राप्ति के लिए मन्नत मांगता है कि इच्छा पूरी होने पर मंदिर में नारियल चढ़ाएगा, तो कोई काला धागा बांधकर स्वयं को अनिष्ट से सुरक्षित मानने लगता है। कई लोग सामान्य घटनाओं को भी शुभ-अशुभ से जोड़कर भयभीत हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि जो वह कर रहा है, वह वास्तव में धर्म है या भय से उत्पन्न विश्वास। धर्म का उद्देश्य मनुष्य के भीतर भय पैदा करना नहीं, बल्कि उसके भय को समाप्त करना है।
धर्म विवेक देता है, अंधविश्वास नहीं
उन्होंने कहा कि वास्तविक धर्म मनुष्य को विवेक प्रदान करता है। वह व्यक्ति को सत्य और असत्य के बीच अंतर समझने की क्षमता देता है। धर्म आत्मविश्वास जगाता है और जीवन की परिस्थितियों का सामना संयम तथा समझदारी के साथ करने की प्रेरणा देता है।
यदि धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति को लगातार भयभीत किया जा रहा है या उसे केवल दिखावे और आडंबर की ओर ले जाया जा रहा है, तो उसे धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए। केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं को अपनाना ही धर्म नहीं है, बल्कि उनके पीछे छिपे आत्मिक और नैतिक भाव को समझना भी आवश्यक है।
मनोकामनाओं का लेन-देन नहीं है सच्चा धर्म
अंशुल जैन शास्त्री ने कहा कि धर्म को इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम मान लेना उचित नहीं है। यदि कोई व्यक्ति यह सोचता है कि उसकी कोई विशेष इच्छा पूरी हो जाएगी तो वह बदले में कोई धार्मिक कार्य करेगा या भेंट चढ़ाएगा, तो यह धर्म के मूल भाव को सीमित कर देता है।
उन्होंने कहा कि धर्म किसी प्रकार का लेन-देन नहीं है। धर्म व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण, आत्मसंयम और आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है। धार्मिक जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि अपने भीतर सकारात्मक और सात्विक परिवर्तन लाना होना चाहिए।
आत्मा को निर्मल करने की प्रक्रिया है धर्म
अंशुल जैन शास्त्री ने धर्म को आत्मा के भीतर परिवर्तन लाने वाली प्रक्रिया बताते हुए कहा कि सच्चा धर्म व्यक्ति को अपने दोषों को पहचानने और उन्हें दूर करने की प्रेरणा देता है। धर्म मनुष्य को अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को समझने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाता है।
उन्होंने कहा कि धर्म बाहरी दिखावे में उलझने का नाम नहीं है। यह आत्मा से परमात्मा की ओर बढ़ने वाली आध्यात्मिक यात्रा है। जब व्यक्ति धर्म के इस वास्तविक स्वरूप को समझता है, तब उसके भीतर भय के स्थान पर निर्भयता, अंधविश्वास के स्थान पर विवेक और आडंबर के स्थान पर आत्मचिंतन विकसित होने लगता है।
धर्म से डरने नहीं, उसे समझने की जरूरत
अंशुल जैन शास्त्री ने अपने विचारों में कहा कि आज सबसे बड़ी आवश्यकता धर्म से डरने की नहीं, बल्कि उसे सही अर्थों में समझने की है। धर्म मनुष्य को कमजोर या भयभीत नहीं करता, बल्कि भीतर से मजबूत बनाता है।
सच्चा धर्म वही है जो व्यक्ति के भय को दूर करे, उसके भीतर आत्मविश्वास पैदा करे और उसे सत्य, संयम, विवेक तथा आत्मचिंतन के मार्ग पर आगे बढ़ाए। जब धर्म जीवन में विवेक और आत्मनिर्भयता का आधार बनता है, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य सार्थक होता है।
भाव लेखक – अंशुल जैन शास्त्री, द्रोणगिरी
