ग्राम केसरपुरा में रास्ता बंद होने से १ साल से कृषि कार्य ठप, न्याय के लिए भटक रहा सेना के जवान का परिवार
विशेष संवाददाता, अर्जुन कुमावत। पिपलोदा रतलाम
Ratlam । रतलाम जिले की पिपलोदा तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम केसरपुरा में एक रास्ता विवाद के कारण पिछले एक साल से कृषि कार्य पूरी तरह ठप पड़ा है। ग्राम पंचायत निपानिया के इस क्षेत्र में एक पीड़ित परिवार अपनी ही वैध तरीके से खरीदी गई ज़मीन पर बोहनी (बुवाई) करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है। इस मामले में सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि पीड़ित महिला का भाई भारतीय सेना (आर्मी) में देश की सेवा में तैनात है। कर्तव्य पर देश की सीमाओं पर उपस्थित होने के कारण वह बार-बार गांव नहीं आ सकता, और पीड़ित पक्ष का आरोप है कि इसी मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें असहाय समझकर परेशान किया जा रहा है।
खरीदी गई कृषि भूमि (सर्वे नंबर **218/1**, रकबा 0.600 हेक्टेयर) तक पहुँचने का मुख्य मार्ग अवरुद्ध होने के कारण खेत में बड़े-बड़े खरपतवार उग आए हैं। पीड़ित पक्ष द्वारा इस संबंध में जनवरी 2026 से ही जिला कलेक्टर की जनसुनवाई (पंजी क्रमांक 48798) से लेकर तहसील न्यायालय में म.प्र. भू-राजस्व संहिता की धारा 131 के तहत गुहार लगाई जा चुकी है, लेकिन समय-सीमा बीत जाने के बाद भी प्रशासनिक स्तर पर अब तक कोई स्थाई निराकरण नहीं हो सका है।
पटवारी और सुखेड़ा पुलिस चौकी द्वारा पूर्व में किए गए पंचनामे के बावजूद जून महीने में विवादित मार्ग पर जेसीबी चलाकर खाई खोद दी गई और उसे पूरी तरह बंद कर दिया गया। पीड़ित महिला का आरोप है कि जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो उन्हें तलवारें दिखाकर जान से मारने की धमकी दी गई। शासकीय भूमि (सर्वे नंबर 254) पर हुए इस विवाद को लेकर अब दोनों पक्षों के अपने-अतार्किक बयान सामने आए हैं।

📄 इस पूरे मामले में दोनों पक्षों के बयान एवं तर्क:
पीड़ित महिला (यशोदा बाई) के पक्ष का बयान:
> “हमने यह ज़मीन पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत मुकेश अरोड़ा से खरीदी है। हमारे खेत तक जाने का जो मुख्य वैधानिक रास्ता सरकारी नक्शे और रिकॉर्ड में दर्ज है, उसे द्वेषतापूर्वक बंद कर दिया गया है। रास्ते के आसपास की शासकीय भूमि को भी हांक-जोतकर कब्ज़ा कर लिया गया है जिससे हमारा खेत पूरी तरह ब्लॉक हो गया है। रही बात दूसरे पक्ष द्वारा बताए जा रहे वैकल्पिक रास्ते की, तो वह असल में एक ‘नाला’ है। उस नालानुमा क्षेत्र से कृषि कार्य के लिए ट्रैक्टर या कोई भी वाहन निकालना किसी भी स्थिति में संभव नहीं है और न ही वह कोई पुराना रास्ता है। मेरे भाई के सेना में होने के कारण हमें अकेला पाकर इस तरह प्रताड़ित किया जा रहा है। यदि हमारे साथ कोई अनहोनी होती है, तो इसकी सीधी ज़िम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होगी।”
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**अनावेदक (दिलीप) के पक्ष का बयान:**
> “पीड़ित पक्ष द्वारा जिस स्थान को मुख्य रास्ता बताकर दावा किया जा रहा है, वह वास्तव में नियमित रास्ता कभी रहा ही नहीं है। वहां से केवल आपातकालीन (इमरजेंसी) स्थिति में ही कभी-कभार गाड़ियां निकलती थीं। खेत पर आने-जाने का वास्तविक और पारंपरिक मार्ग पटेल मंडी रोड से होते हुए हनुमान जी की गली के पास से जाता है, जहां वर्तमान में दो पाइप भी डले हुए हैं। हम किसी का रास्ता रोकने के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि पारंपरिक मार्ग की बात कर रहे हैं। हम इस मामले में किसी भी प्रकार की प्रशासनिक जांच, नापजोश या गांव के वरिष्ठ नागरिकों के समक्ष बयान दर्ज कराने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।”
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**समाचार पत्र का नज़रिया:**
जब दोनों ही पक्ष प्रशासनिक जांच और नियमों को मानने के लिए तैयार हैं, तो राजस्व विभाग की यह देरी समझ से परे है। मुख्यमंत्री और शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि देश के जवानों और उनके परिवारों की समस्याओं को शीर्ष प्राथमिकता पर हल किया जाए, लेकिन यहाँ ६ महीने से आवेदन लंबित है। जिला प्रशासन और पिपलोदा राजस्व अमले को तुरंत मौके पर जाकर शासकीय नक्शे के आधार पर सीमांकन करना चाहिए और शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाना चाहिए, ताकि सीमा पर तैनात जवान के परिवार को सुरक्षा व न्याय मिल सके और इस समस्या का तत्काल समाधान हो।
