रक्षाबंधन पर 700 श्रीफल अर्पित, णमोकार महामंत्र से गूंजा जैन बगीची परिसर
आचार्य सिद्धांतसागर महाराज का 34वां आचार्य पदारोहण दिवस मनाया, मुनि उपसर्ग निवारण पर्व और श्रमण संस्कृति रक्षा दिवस पर हुए धार्मिक अनुष्ठान
रिपोर्टर: मनोज जैन नायक
रक्षाबंधन के पावन पर्व पर शुक्रवार को अम्बाह स्थित जैन बगीची में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के बीच विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया। आचार्य श्री 108 सिद्धांत सागर महाराज की शिष्या गणिनी आर्यिका रत्न गुरुमां संगममति माताजी के ससंघ मंगल सान्निध्य में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर जिनेंद्र भगवान की आराधना की।
धार्मिक आयोजन के दौरान णमोकार महामंत्र के जाप और भगवान के जयकारों से पूरा जैन बगीची परिसर भक्तिमय हो गया। महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और बच्चों ने उत्साह के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से श्रीजी का अभिषेक, पूजन और आरती कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
इस अवसर पर आचार्य श्री 108 सिद्धांत सागर महाराज का 34वां आचार्य पदारोहण दिवस, मुनि उपसर्ग निवारण पर्व एवं श्रमण संस्कृति रक्षा दिवस भी श्रद्धापूर्वक मनाया गया।
जिनेंद्र भगवान को समर्पित किए 700 श्रीफल
रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर आयोजित विशेष धार्मिक अनुष्ठान में श्रद्धालुओं ने जिनेंद्र भगवान के चरणों में 700 श्रीफल समर्पित किए। श्रीफल अर्पित करते समय श्रद्धालुओं ने आत्मशुद्धि, कर्म निर्जरा, संयम और सदाचार की भावना व्यक्त की।
एक साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं द्वारा श्रीफल समर्पित किए जाने से आयोजन स्थल पर विशेष आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। धार्मिक क्रियाओं के दौरान णमोकार महामंत्र का जाप किया गया और श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ जिनेंद्र भगवान की आराधना की।
भगवान के मोक्ष कल्याणक के पावन प्रसंग पर निर्वाण लाडू भी अर्पित किया गया। श्रद्धालुओं ने भगवान के चरणों में निर्वाण लाडू समर्पित कर आत्मकल्याण और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की भावना व्यक्त की।
आचार्य सिद्धांत सागर महाराज का 34वां पदारोहण दिवस

कार्यक्रम के दौरान आचार्य श्री 108 सिद्धांत सागर महाराज का 34वां आचार्य पदारोहण दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। आचार्यश्री के त्याग, तप, संयम और धर्म प्रभावना का स्मरण करते हुए श्रद्धालुओं ने उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की।
आचार्यश्री की शिष्या गणिनी आर्यिका रत्न गुरुमां संगममति माताजी के ससंघ सान्निध्य ने आयोजन को विशेष आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया। श्रद्धालुओं ने धर्म आराधना के साथ गुरु परंपरा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
इसके साथ ही मुनि उपसर्ग निवारण पर्व और श्रमण संस्कृति रक्षा दिवस के माध्यम से जैन धर्म की तप, त्याग और संयम प्रधान परंपरा के संरक्षण का संदेश दिया गया।
‘रक्षाबंधन आत्मा की रक्षा का भी संदेश’
धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणिनी आर्यिका रत्न गुरुमां संगममति माताजी ने रक्षाबंधन के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन धर्म के पर्व केवल परंपराओं के निर्वहन तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे मनुष्य को आत्मचिंतन, आत्ममंथन और आत्मजागरण का अवसर प्रदान करते हैं।
माताजी ने कहा कि रक्षाबंधन का वास्तविक आध्यात्मिक संदेश आत्मा को पाप और कषायों से बचाने का है। मनुष्य को अपने भीतर मौजूद उन विकारों पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, जो आत्मा को कर्मबंधन में बांधते हैं।
उन्होंने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषाय आत्मा को कर्मों के बंधन में बांधते हैं। इन कषायों से स्वयं को दूर कर संयम, सदाचार और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ना ही धर्म की वास्तविक साधना है।
साधु-संत दिखाते हैं आत्मकल्याण का मार्ग
आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि जैन साधु-संत त्याग, तप और संयम के माध्यम से समाज को आत्मकल्याण का मार्ग दिखाते हैं। उनका जीवन स्वयं में धर्म, संयम और साधना का संदेश देता है।
उन्होंने कहा कि श्रमण संस्कृति की रक्षा केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए भगवान महावीर के सिद्धांतों और जिनवाणी के संस्कारों को प्रत्येक परिवार तक पहुंचाना आवश्यक है।
विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को धर्म, संस्कार और जैन दर्शन से जोड़ने की आवश्यकता है। नई पीढ़ी जब भगवान महावीर के सिद्धांतों, अहिंसा, संयम और सदाचार को समझेगी, तभी श्रमण संस्कृति और धार्मिक परंपराएं आगे बढ़ेंगी।
‘नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ना ही संस्कृति की वास्तविक रक्षा’
माताजी ने समाजजनों का आह्वान करते हुए कहा कि बच्चों और युवाओं में धार्मिक एवं नैतिक संस्कारों का विकास किया जाना चाहिए। परिवारों में जिनवाणी, धार्मिक शिक्षा और संस्कारों का वातावरण बने, जिससे आने वाली पीढ़ी अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी रहे।
उन्होंने कहा कि श्रमण संस्कृति की वास्तविक रक्षा तभी संभव है, जब उसके मूल सिद्धांत जीवन व्यवहार का हिस्सा बनें। धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका प्रभाव व्यक्ति के विचार, व्यवहार और जीवनशैली में भी दिखाई देना चाहिए।
‘चातुर्मास समाज के लिए आध्यात्मिक सौभाग्य’
जैन समाज अध्यक्ष जिनेश जैन ने कहा कि गणिनी आर्यिका रत्न गुरुमां संगममति माताजी के सान्निध्य में चल रहा चातुर्मास पूरे समाज के लिए आध्यात्मिक सौभाग्य का अवसर है।
उन्होंने कहा कि संतों के सान्निध्य और धार्मिक आयोजनों से समाज में धर्म, संस्कार एवं आध्यात्मिक चेतना का संचार होता है। ऐसे कार्यक्रम समाज को एकजुट करने के साथ नई पीढ़ी को धार्मिक परंपराओं से परिचित कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
महिलाओं, युवाओं और बच्चों ने भी लिया धर्मलाभ
रक्षाबंधन के अवसर पर आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में जैन समाज के सभी आयु वर्ग के लोगों की भागीदारी देखने को मिली। महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और बच्चों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने श्रीजी के अभिषेक, पूजन, आरती और अन्य धार्मिक क्रियाओं में सहभागिता की।
700 श्रीफल समर्पण, निर्वाण लाडू अर्पण और णमोकार महामंत्र के जाप के साथ आयोजित कार्यक्रम ने पूरे जैन बगीची परिसर को धर्ममय बना दिया। श्रद्धालुओं ने रक्षाबंधन के पर्व को पारंपरिक भाई-बहन के रिश्ते के साथ आत्मरक्षा, धर्मरक्षा और श्रमण संस्कृति की रक्षा के आध्यात्मिक संदेश के रूप में भी ग्रहण किया।
