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High Court Major Verdict on Asaram: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, आजीवन कारावास की सजा बरकरार

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Published On: 27 May 2026
Asaram

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High Court Major Verdict on Asaram: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 

Asaram से जुड़े नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और चर्चित फैसला सुनाते हुए उनकी आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस लंबे समय से चल रहे मामले में स्पष्ट कर दिया कि विशेष पॉक्सो कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय सही था और उसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

यह फैसला उस समय आया जब यह मामला पिछले कई वर्षों से कानूनी प्रक्रियाओं और अपीलों के दौर से गुजर रहा था। अदालत का यह निर्णय न केवल इस केस के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को भी स्पष्ट करता है।

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनाया अहम फैसला

इस मामले की सुनवाई राजस्थान हाईकोर्ट की जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेन्द्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने की। लगभग एक महीने पहले सुरक्षित रखे गए इस निर्णय को अदालत ने आज सुनाया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट यानी विशेष पॉक्सो कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई है। इसलिए उस फैसले को पूरी तरह से बरकरार रखा जाता है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और परिस्थितियों के आधार पर दोष सिद्ध होता है, और ऐसे में निचली अदालत के निर्णय में किसी प्रकार का हस्तक्षेप उचित नहीं है।

सह-आरोपियों को मिली राहत

इस बहुचर्चित मामले में जहां मुख्य आरोपी की सजा बरकरार रखी गई, वहीं दो सह-आरोपियों को अदालत ने राहत प्रदान की है।

अदालत ने शिल्पी और शरतचंद को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत इन दोनों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इस निर्णय ने मामले को एक नया मोड़ दिया है, क्योंकि एक ओर मुख्य आरोपी को सजा बरकरार रही, वहीं दूसरी ओर अन्य आरोपियों को संदेह का लाभ मिला।

सरेंडर करना होगा आसाराम को

अदालत के इस फैसले के बाद अब आसाराम को कोर्ट के आदेश के अनुसार सरेंडर करना होगा। फिलहाल वह अंतरिम जमानत पर बाहर हैं, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनकी कानूनी स्थिति में बदलाव आया है।

इस आदेश के बाद संबंधित एजेंसियों की निगरानी और कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर तेज हो गई है। अब आगे की कार्रवाई अदालत के निर्देशों के अनुसार की जाएगी।

मामले की पृष्ठभूमि: 2013 का विवादित केस

यह मामला अगस्त 2013 का है, जब जोधपुर स्थित एक आश्रम में एक नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म का गंभीर आरोप लगाया गया था। यह मामला सामने आने के बाद पूरे देश में भारी चर्चा का विषय बन गया था।

इसके बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया चली, जिसमें गवाहों के बयान, सबूतों की जांच और विस्तृत सुनवाई शामिल रही। वर्षों तक चले इस केस ने न्यायिक प्रणाली की गंभीरता और जटिलता दोनों को उजागर किया।

ट्रायल कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

लंबी सुनवाई के बाद 25 अप्रैल 2018 को विशेष पॉक्सो कोर्ट ने आसाराम को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

यह फैसला उस समय भी बेहद चर्चित रहा था, क्योंकि यह भारत के सबसे हाई-प्रोफाइल मामलों में से एक था। इसके बाद से यह मामला हाईकोर्ट में अपील के चरण में चल रहा था।

बचाव पक्ष की दलीलें

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत में यह तर्क दिया कि मामला मनगढ़ंत है और पीड़िता तथा उसके परिजनों के बयानों में कई विरोधाभास हैं।

इसके अलावा बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि तकनीकी साक्ष्यों जैसे कॉल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल प्रमाणों की कमी है, जिससे आरोपों की पुष्टि नहीं होती।

बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि गवाहों के बयान समय-समय पर बदलते रहे हैं, जिससे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।

अभियोजन पक्ष की मजबूत दलीलें

दूसरी ओर अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि पॉक्सो मामलों में पीड़िता का बयान ही पर्याप्त साक्ष्य माना जाता है। इस सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट भी कई बार मान्यता दे चुका है।

अभियोजन ने यह भी तर्क दिया कि इस मामले में गवाहों पर दबाव डालने और सबूतों को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी।

इसके साथ ही अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य स्पष्ट रूप से आरोपी की भूमिका को दर्शाते हैं।

गैंगरेप और साजिश के आरोपों से राहत

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि गैंगरेप और आपराधिक साजिश के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं।

इसी आधार पर अदालत ने इन आरोपों से संबंधित धाराओं में सह-आरोपियों को बरी कर दिया।

यह फैसला यह दर्शाता है कि अदालत ने प्रत्येक आरोप को अलग-अलग आधार पर परखा और केवल उन्हीं मामलों में सजा बरकरार रखी जहां पर्याप्त सबूत मौजूद थे।

कानूनी प्रक्रिया का लंबा सफर

यह मामला 2013 से 2026 तक कई चरणों से गुजरा है। इसमें ट्रायल कोर्ट, विशेष अदालत और अब हाईकोर्ट का निर्णय शामिल है।

इतने लंबे समय तक चले इस केस ने भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की गहराई और गंभीरता को दर्शाया है। साथ ही यह भी दिखाता है कि हाई-प्रोफाइल मामलों में जांच और सुनवाई कितनी विस्तृत होती है।

सुप्रीम कोर्ट जाने की संभावना

फैसले के बाद यह भी संकेत मिले हैं कि इस मामले को लेकर आगे सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है। विशेष रूप से सह-आरोपियों के बरी होने के फैसले को चुनौती देने की संभावना जताई जा रही है।

यदि ऐसा होता है, तो यह मामला एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में सुर्खियों में आएगा।

समाज और न्याय व्यवस्था पर प्रभाव

इस प्रकार के मामलों का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह न केवल कानूनी व्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि न्यायिक प्रक्रिया कितनी गंभीरता से तथ्यों की जांच करती है।

ऐसे मामलों में निर्णय केवल आरोपों पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों और कानूनी मानकों के आधार पर लिए जाते हैं।

निष्कर्ष

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला एक बार फिर से स्पष्ट करता है कि न्यायिक प्रक्रिया साक्ष्यों और कानून के आधार पर चलती है। आसाराम की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रहना इस बात का संकेत है कि गंभीर अपराधों में अदालतें कठोर रुख अपनाती हैं।

हालांकि कुछ सह-आरोपियों को राहत मिली है, लेकिन मुख्य फैसले ने मामले की दिशा स्पष्ट कर दी है। अब आगे की कानूनी प्रक्रिया और संभावित सुप्रीम कोर्ट अपील इस मामले की अगली कड़ी तय करेगी।

यह फैसला न्याय प्रणाली की गंभीरता, निष्पक्षता और साक्ष्य आधारित निर्णय प्रक्रिया को एक बार फिर सामने लाता है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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