चंपाबाग जैन मंदिर में हुई उत्तम आकिंचन्य धर्म की पूजा, 108 कलशों से हुआ श्रीजी का अभिषेक
पर्युषण महापर्व के नौवें दिन जैन समाज ने की आराधना, आचार्यश्री बोले- परिग्रह का त्याग ही आकिंचन्य धर्म का मूलgwalior-champabagh-jain-mandir-uttam-akinchanya-dharm
Gwalior। पर्युषण महापर्व के नौवें दिन गुरुवार को दाना ओली स्थित दिगंबर बीसपंथी चंपाबाग जैन मंदिर में उत्तम आकिंचन्य धर्म की भक्ति भाव से आराधना की गई। आत्म साधना वर्षायोग समिति एवं सकल जैन समाज के तत्वावधान में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज एवं मुनि श्री अनुमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में संपन्न हुआ। इस अवसर पर जैन समाज के महिला-पुरुषों और बालिकाओं ने विधि-विधान से भगवान जिनेंद्र की पूजा-अर्चना की।
पर्युषण महापर्व के तहत शुक्रवार, 25 सितंबर को दसवें दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा एवं आराधना की जाएगी। मंदिर में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
108 कलशों से हुआ भगवान जिनेंद्र का पंचामृत अभिषेक
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि प्रतिष्ठाचार्य पंडित डॉ. आनंद प्रकाश शास्त्री के निर्देशन में भगवान जिनेंद्र का 108 कलशों से पंचामृत अभिषेक किया गया। मंत्रोच्चार और भगवान जिनेंद्र के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं ने अभिषेक किया।
इसके बाद आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज द्वारा मंत्रोच्चार के साथ श्रीजी की बृहद शांतिधारा कराई गई। धार्मिक वातावरण में श्रद्धालुओं ने भगवान के समक्ष अर्घ्य समर्पित किए और आराधना में हिस्सा लिया।
अष्ट द्रव्य से की गई पूजन-अर्चना
दसलक्षण धर्म के अंतर्गत आयोजित पूजन में जैन समाज के महिला, पुरुष और बालिकाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतिष्ठाचार्य पंडित डॉ. आनंद प्रकाश शास्त्री ने विधि-विधान से उत्तम आकिंचन्य धर्म की पूजा संपन्न कराई।
इस दौरान नवदेवता पूजा और पंचमेरु पूजा की गई। संगीतमय भक्ति एवं नृत्य के साथ श्रद्धालुओं ने अष्ट द्रव्य से भगवान जिनेंद्र की पूजा-अर्चना की और महाअर्घ्य समर्पित किया। मंदिर परिसर में पूरे आयोजन के दौरान भक्तिमय वातावरण बना रहा।
आचार्यश्री बोले- सुई के बराबर भी परिग्रह न होना आकिंचन्य
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज ने उत्तम आकिंचन्य धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आकिंचन्य का अर्थ है सुई के बराबर भी परिग्रह नहीं होना। मन, वचन और काय से अंतरंग एवं बाह्य परिग्रह का त्याग करना ही इस धर्म का मूल भाव है।
आचार्यश्री ने कहा कि पांच पापों, सप्त व्यसनों और 25 कषायों का त्याग किए बिना उत्तम आकिंचन्य धर्म की साधना पूर्ण रूप से संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि श्रावक भी अपनी क्षमता के अनुसार नियम और व्रत धारण करके आकिंचन्य धर्म का पालन कर सकता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन में धन, मकान, जमीन-जायदाद और आभूषण आदि के संग्रह की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए। आवश्यकता से अधिक संग्रह की प्रवृत्ति से बचना और त्याग की भावना विकसित करना आकिंचन्य धर्म की साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मुनिश्री बोले- परिग्रह छोड़कर निज स्वरूप में स्थित होना ही आकिंचन्य
मुनि श्री अनुमान सागर महाराज ने भी धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि परिग्रह का त्याग करके अपने निज स्वरूप में स्थित होना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म है। आकिंचन्य की भावना में ‘अपना’ कुछ भी नहीं रह जाता और व्यक्ति को यह पहचानने की आवश्यकता होती है कि वास्तव में उसका क्या है।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य अक्सर ‘मेरा-तेरा’ के भाव में उलझा रहता है। यही मोह और आसक्ति आगे चलकर दुख का कारण बनते हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में जो कुछ भी व्यक्ति को प्राप्त हुआ है, वह संयोगवश मिला है। इसलिए उसके प्रति कर्तव्य भाव रखना चाहिए, लेकिन अनावश्यक आसक्ति नहीं रखनी चाहिए।
उन्होंने लोगों को अपने कर्मों पर ध्यान देने की सीख देते हुए कहा कि कर्मों का परिणाम व्यक्ति को प्राप्त होता है। इसलिए जीवन में अपने आचरण और कर्मों के प्रति सजग रहना आवश्यक है।
तपस्वियों की शोभायात्रा और महापारणा 26 सितंबर को
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि पर्युषण महापर्व के दौरान 10 दिन का उपवास करने वाले महिला और पुरुष तपस्वियों की शोभायात्रा 26 सितंबर को निकाली जाएगी। आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज एवं मुनि श्री अनुमान सागर महाराज के सानिध्य में सुबह 7:30 बजे चंपाबाग मंदिर से शोभायात्रा प्रारंभ होगी।
तपस्वियों को बग्गी में बैठाकर बैंड-बाजों के साथ शोभायात्रा निकाली जाएगी। यात्रा दानाओली, महाराज बाड़ा, सराफा बाजार, गश्त का ताजिया और नई सड़क होते हुए चंपाबाग बगीची पहुंचेगी।
वहां 10 दिन, पांच दिन और तीन दिन का उपवास करने वाले सभी तपस्वियों का महापारणा कराया जाएगा। आयोजन को लेकर जैन समाज में उत्साह का माहौल है।
समाज के पदाधिकारियों ने किया आचार्यश्री का सम्मान
कार्यक्रम के दौरान आत्म साधना वर्षायोग समिति के पदाधिकारियों एवं समाज के सदस्यों ने आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज के चरणों में श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद लिया। समिति अध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र गंगवाल, महामंत्री निर्मल पाटनी, विकास गंगवाल, विनय कासलीवाल, पंकज छाबड़ा, संजय गोधा सहित अन्य समाजजन इस अवसर पर मौजूद रहे।
पर्युषण महापर्व के नौवें दिन आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने उत्तम आकिंचन्य धर्म के संदेश को आत्मसात करने का संकल्प लिया। मंदिर में पूजा, अभिषेक, शांतिधारा और धर्मसभा के साथ दिनभर धार्मिक वातावरण बना रहा।
