पर्यूषण पर्व में संयम को सच्चे जैनी की पहचान बताते हुए मुनि पुंगव सुधासागर महाराज ने इंदौर के दलाल बाग में धर्मसभा को संबोधित किया। पढ़ें उनके प्रमुख प्रेरक संदेश।
पर्यूषण पर्व में संयम ही सच्चे जैनी की पहचान: मुनि पुंगव सुधासागर महाराज
सुधामयी अमृतवाणी: सच्चा जैनी वही, जो पर्व के दिनों में कमाने का निषेध और खान-पान सीमित करे
रिपोर्टर — राजेश जैन दद्दू, इंदौर
इंदौर। पर्यूषण पर्व में संयम को सच्चे जैन धर्म की पहचान बताते हुए श्रमण संस्कृति के महाश्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने शनिवार को सकल दिगंबर जैन समाज धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में दलाल बाग में आयोजित धर्मसभा में कहा कि सच्चा जैनी वही है, जो पर्यूषण आदि जैन धर्म के पर्व के दिनों में कमाने का निषेध रखता है और खाना-पीना संयमित व सीमित करता है। इन दिनों धर्म, ध्यान, पूजा, दान, व्रत और उपवास आदि अधिक करना चाहिए।
पर्यूषण पर्व में संयम के साथ व्यापार से भी रखें अवकाश
मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार मजदूर अमावस्या की कमाई नहीं खाता, क्योंकि वह उस दिन अवकाश रखता है, उसी प्रकार जैनों को भी अपने पर्व के दिनों में अपने व्यापार का अवकाश रखना चाहिए। पर्यूषण पर्व में संयम केवल खान-पान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जीवन के प्रत्येक व्यवहार में धर्म और आत्मचिंतन को प्राथमिकता देनी चाहिए।
उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि जब भी अपने वालों यानी मित्रों, रिश्तेदारों और ससुराल आदि के यहां जाएं और यदि वहां खा-पीकर आएं तो कुछ देकर जरूर आएं। जाते समय या तो कुछ लेकर जाएं या फिर आते समय कुछ देकर आएं, क्योंकि मुफ्त का माल खाना दरिद्रता की निशानी है।
अध्यात्म व्यक्ति को समर्थ बनाने की कुंजी
मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि दुनिया में जितने भी परम मित्र हैं, वे सब बैंक के लोन के समान हैं। जो साधु भिक्षा से भोजन नहीं करता, वह साधु नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि अध्यात्म व्यक्ति को समर्थ बनाने की कुंजी है। पुण्यवान ही पुण्य का फल भोगता है और पुण्यवान ही हर तरह से शक्ति संपन्न होता है।
मुनिश्री ने जैन धर्म के महत्वपूर्ण सूत्र ‘अप्प दीपो भव’ का उल्लेख करते हुए कहा कि तुम स्वयं दीपक हो, तुम स्वयं सुखी हो जाओ, निरावलंबी हो जाओ। तुम स्वयं में पूर्ण हो, परावलंबी नहीं। पर के आलंबन में शक्ति कमजोर हो जाती है।
विफलता हमारा भ्रम और सफलता हमारा स्वभाव
मुनिश्री ने कहा कि विफलता हमारा भ्रम है और सफलता हमारा स्वभाव है। जिस प्रकार जल का स्वभाव शीतल होने के बावजूद जल को गर्म करने पर उसकी शीतलता का मूल स्वभाव नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव को भी कोई बदल या नष्ट नहीं कर सकता।
उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मबल, आत्मचिंतन और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यक्ति को स्वयं की शक्ति पहचाननी चाहिए। धर्म का उद्देश्य व्यक्ति को परावलंबी बनाना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर मौजूद शक्ति का बोध कराना है।
देश-प्रदेश से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालु
धर्मसभा में देश-प्रदेश के विभिन्न स्थानों से आए सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित थे। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस अवसर पर हूमड़ दिगंबर जैन समाज इंदौर के सभी वरिष्ठ सदस्यों एवं पदाधिकारियों ने मुनिश्री को श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
धर्मसभा में मयंक जैन, विपिन गांधी, अशोक डोषी, विनोद डोषी, आनंद गोधा, नवीन गोधा, भूपेंद्र जैन, अरविंद सोधिया, अखिलेश सोधिया, स्वदेश जैन, कमल जैन चेलेंजर, हर्ष जैन, आकाश (कोयला), हंसमुख गांधी, सपना गोधा, सोनाली बागड़िया और रानी डोषी सहित बड़ी संख्या में समाज श्रेष्ठी एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभा का संचालन अर्पित वाणी ने किया।
मुनिश्री के प्रवचन में पर्यूषण पर्व में संयम, त्याग, आत्मनिर्भरता, पुण्य और अध्यात्म के महत्व पर विशेष जोर दिया गया। श्रद्धालुओं ने मुनिश्री की अमृतवाणी को आत्मसात करते हुए पर्व के दिनों में अधिक से अधिक धर्म, ध्यान, पूजा, दान, व्रत और उपवास करने की प्रेरणा प्राप्त की।
