‘PAREIDOLIA’ में पांच स्त्रियों के पांच संसार एक मंच पर आए
दिल्ली में संसप्तक की रंगमंचीय श्रृंखला प्रस्तुत; पांच एकल रचनाओं के जरिए स्मृति, भय, पहचान और सामाजिक धारणाओं को देखने का प्रयास
नई दिल्ली। रंगमंच समूह संसप्तक ने 19 सितंबर को चित्तरंजन पार्क स्थित बांगिया समाज ऑडिटोरियम में ‘PAREIDOLIA’ नाम से एक रंगमंचीय श्रृंखला प्रस्तुत की। श्री तोरित मित्र की पांच एकल रचनाओं पर आधारित इस प्रस्तुति में पांच स्त्री पात्र अलग-अलग अनुभवों और भावनात्मक संसारों के साथ मंच पर आए। श्रृंखला का केंद्रीय विचार यह था कि मनुष्य जो देखता है, उसका अर्थ किस तरह बनाता है और उस अर्थ पर उसके अपने अनुभवों का कितना असर होता है।
‘Pareidolia’ उस मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति को कहते हैं जिसमें कोई व्यक्ति अस्पष्ट आकृति या अनुभव में एक परिचित रूप पहचान लेता है। प्रस्तुति ने इसी विचार को रंगमंच की भाषा में ढाला। मंच पर उपस्थित पात्र, प्रकाश, ध्वनि और रिक्त स्थान दर्शकों को दृश्य का अर्थ खोजने के लिए आमंत्रित करते हैं। इस तरह पांच कहानियां केवल पात्रों के अनुभव सामने नहीं रखतीं, बल्कि दर्शक की दृष्टि को भी प्रस्तुति का हिस्सा बनाती हैं।
पांच रचनाएं, पांच एकल प्रस्तुतियां
श्रृंखला में ‘दुहिता’ की एकल प्रस्तुति कौशिकी देब ने दी। ‘मात्रीघात’ में पारोमा भट्टाचार्य, ‘ओमिशा’ में अनिंदिता सेठ, ‘डाईसेक्शन’ में प्रीति गुप्ता और ‘बाघ ओ ओधॅरॅनजॅनी’ में श्रीमयी दासगुप्ता मंच पर आईं। गौतम पाल ने मेटाफर की भूमिका निभाई।
पांच अलग-अलग कलाकारों की एकल प्रस्तुतियों ने श्रृंखला को पांच खंडों में बांटा, लेकिन देखने और अर्थ गढ़ने का विचार उन्हें एक सूत्र में जोड़ता रहा। प्रत्येक स्त्री पात्र का अपना संसार है। प्रस्तुति के विवरण के अनुसार, इन संसारों में स्मृति, मृत्यु, भय, पहचान और सामाजिक धारणाओं से जुड़े प्रश्न सामने आते हैं।
सीमित साधनों से बना मंचीय संसार
‘PAREIDOLIA’ के मंच पर बड़े बदलावों या विस्तृत सज्जा की जगह प्रकाश, शरीर, ध्वनि, छाया, वस्तुओं और खाली स्थान का उपयोग किया गया। एक ही मंच अलग-अलग दृश्यों में अपना अर्थ बदलता दिखाई दिया। कभी रोशनी ने दर्शक का ध्यान किसी पात्र पर केंद्रित किया, तो कभी ध्वनि और छाया ने उसी स्थान का भाव बदल दिया।
इस मंचीय शैली में दर्शक को हर दृश्य तैयार रूप में नहीं मिलता। उसे कलाकार की गतिविधि और मंच पर मौजूद संकेतों के आधार पर अपनी समझ बनानी होती है। प्रस्तुति की मूल अवधारणा भी इसी प्रक्रिया से जुड़ी है—एक ही चीज को देखने वाले अलग-अलग लोग उसमें अलग अर्थ पहचान सकते हैं।
निर्देशन और तकनीकी टीम का योगदान
इन प्रस्तुतियों का निर्देशन सरनेंदु चाकी और अंजन बोस ने किया। मंच सज्जा अंजन बोस ने तैयार की। ध्वनि और संगीत सृजन की जिम्मेदारी श्रीमयी दासगुप्ता ने संभाली, जबकि प्रकाश सृजन सरनेंदु चाकी ने किया। ध्वनि संचालन सिद्धार्थ सिकदर ने किया।
एकल अभिनय पर आधारित प्रस्तुति में कलाकार के साथ प्रकाश और ध्वनि का तालमेल विशेष भूमिका निभाता है। ‘PAREIDOLIA’ में तकनीकी साधनों का उपयोग पात्रों के आसपास अलग-अलग वातावरण बनाने के लिए किया गया। इसी के जरिए एक ही मंच पर पांच अलग संसार सामने लाने का प्रयास हुआ।
दर्शक की दृष्टि पर भी उठे सवाल
रंगमंचीय श्रृंखला दर्शकों के सामने यह प्रश्न रखती है कि वे किसी पात्र को किस आधार पर समझते हैं। क्या वे केवल मंच पर दिखाई गई बात देखते हैं, या अपने अनुभव और पहले से बनी धारणाएं भी उस पात्र की छवि तैयार करती हैं? प्रस्तुति इसी अंतर को महसूस करने का अवसर देती है।
पांच स्त्री पात्रों की कहानियों के माध्यम से ‘PAREIDOLIA’ ने पहचान और सामाजिक नजरिए पर विचार करने की जगह बनाई। पात्र मंच पर अपना अनुभव लेकर आते हैं, लेकिन दर्शक उस अनुभव से जो अर्थ ग्रहण करता है, वह उसके अपने दृष्टिकोण से भी प्रभावित हो सकता है। यही विचार इस रंगमंचीय प्रयोग को एक साझा सूत्र देता है।
दिल्ली में हुई यह प्रस्तुति पांच एकल रचनाओं, कलाकारों के अभिनय और सीमित मंचीय साधनों के मेल से तैयार की गई। संसप्तक की इस श्रृंखला ने पांच स्त्री संसारों को सामने रखने के साथ यह भी पूछा कि देखने और समझने के बीच मनुष्य अपना अर्थ कैसे रचता है।
