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    Pahalgam आतंकी हमले के एक साल बाद भी नथानिएल परिवार को न मुआवजा मिला, न नौकरी, दर्द और बढ़ा।

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    Published On: 20 April 2026
    Pahalgam आतंकी हमले के एक साल बाद भी नथानिएल परिवार को न मुआवजा मिला, न नौकरी, दर्द और बढ़ा।

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    ‘पापा होते तो ऐसा नहीं होता’: Pahalgam हमले का एक साल, नथानिएल परिवार आज भी दर्द, इंतजार और अनदेखी के बीच जूझ रहा

    इंदौर के नथानिएल परिवार के लिए समय आगे बढ़ तो गया है, लेकिन जीवन वहीं अटका हुआ है। Pahalgam आतंकी हमले को एक साल पूरा हो चुका है, लेकिन इस परिवार के लिए यह एक साल किसी लंबे, थम चुके अंधेरे जैसा रहा है। 58 वर्षीय सुशील नथानिएल, जो अपने परिवार के साथ कश्मीर घूमने गए थे, उस यात्रा से कभी वापस नहीं लौट पाए। उनकी पत्नी जेनिफर और बेटा ऑस्टेन किसी तरह उस भयावह हमले से बच तो गए, लेकिन जो कुछ उन्होंने देखा और सहा, उसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।

    यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं है, बल्कि उस दर्द की है जो आतंकवाद, लापरवाही और व्यवस्था की अनदेखी के बाद वर्षों तक लोगों के जीवन में बना रहता है।

    खुशियों की यात्रा जो मातम में बदल गई

    सुशील नथानिएल अपने परिवार के साथ कश्मीर के पहलगाम घूमने गए थे। यह यात्रा उनके लिए एक लंबे समय बाद मिला पारिवारिक सुकून थी। पत्नी जेनिफर और बेटा ऑस्टेन के साथ वे बर्फीली वादियों में यादें संजोने निकले थे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह यात्रा उनकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित होगी।

    स्थानीय जानकारी और परिवार के अनुसार, उस दिन अचानक आतंकी हमला हुआ। गोलियों की आवाजों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। पर्यटक इधर-उधर भागने लगे, और चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

    इसी भगदड़ के बीच सुशील ने अपने परिवार को बचाने की कोशिश की। उन्होंने अपनी पत्नी को एक पेड़ के पीछे धकेला ताकि वे सुरक्षित रह सकें, लेकिन वे खुद गोलियों की चपेट में आ गए।

    पत्नी जेनिफर की दर्दनाक यादें

    जेनिफर नथानिएल आज भी उस दिन को याद करते हुए कांप उठती हैं। वे बताती हैं कि चारों ओर सिर्फ चीखें, गोलियों की आवाज और खौफ का माहौल था। ठंड इतनी थी कि शरीर जम रहा था, लेकिन उससे ज्यादा जम गया था उनका मन।

    वे कहती हैं कि जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो सामने का दृश्य उनकी जिंदगी का सबसे भयावह पल था। उनके पति पेड़ के सहारे बेजान पड़े थे। खून उनके शरीर से बह रहा था, और चारों तरफ सन्नाटा था।

    उस दिन के बाद जेनिफर मानसिक रूप से पूरी तरह टूट गईं। परिवार के अनुसार, वे कई बार चीजें भूल जाती हैं, बच्चों जैसा व्यवहार करने लगती हैं और लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठी रहती हैं। यह आघात उनके जीवन का स्थायी हिस्सा बन चुका है।

    बेटे ऑस्टेन पर टूटी जिम्मेदारियों की दीवार

    परिवार के बेटे ऑस्टेन नथानिएल (28) अब घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वे बताते हैं कि उनके पिता उनके जीवन का सबसे बड़ा सहारा थे। उनके जाने के बाद सब कुछ बदल गया।

    ऑस्टेन पहले विदेश जाकर स्पोर्ट्स मैनेजमेंट में एमबीए करना चाहते थे। उनका सपना था कि वे एक अंतरराष्ट्रीय करियर बनाएं, लेकिन अब वे घर की देखभाल और मां की मानसिक स्थिति को संभालने में व्यस्त हैं।

    वे कहते हैं,
    “मेरे पिता चले गए, और उनके साथ मेरे सारे सपने भी कहीं खो गए। अब मेरा पूरा जीवन सिर्फ जिम्मेदारी बनकर रह गया है।”

    “पापा होते तो ऐसा नहीं होता” — टूटे सपनों की आवाज

    ऑस्टेन बताते हैं कि लोग अक्सर उनसे कहते हैं कि अगर उनके पिता होते तो आज उनकी जिंदगी अलग होती। यह बात उन्हें अंदर तक तोड़ देती है।

    वे कहते हैं कि इसी डर और दर्द के कारण उन्होंने अब सामाजिक कार्यक्रमों में जाना भी बंद कर दिया है। लोग सवाल पूछते हैं, सहानुभूति कम और जजमेंट ज्यादा मिलता है।

    उनके अनुसार, परिवार अब पहले से ज्यादा असुरक्षित और मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करता है।

    सरकारी मदद की उम्मीदें जो अधूरी रह गईं

    नथानिएल परिवार का सबसे बड़ा दर्द सिर्फ निजी नहीं है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी है। परिवार का कहना है कि उन्हें अब तक न तो पर्याप्त मुआवजा मिला है और न ही किसी तरह की स्थायी सहायता।

    ऑस्टेन बताते हैं कि उन्हें अनुकंपा नियुक्ति (compassionate appointment) से भी वंचित कर दिया गया क्योंकि उनकी मां सरकारी नौकरी में कार्यरत हैं। यह निर्णय उनके लिए बहुत बड़ा झटका था।

    वे कहते हैं कि कई बार आश्वासन मिले, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस मदद नहीं मिली।

    अलग-अलग राज्यों की सहायता और मध्यप्रदेश की स्थिति

    परिवार का कहना है कि जहां कुछ राज्यों ने अपने नागरिकों को 50-50 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता दी, वहीं उनके मामले में केवल वादों तक ही बात सीमित रही।

    यह अंतर उनके दर्द को और गहरा करता है। वे सवाल उठाते हैं कि क्या पीड़ित परिवारों के साथ व्यवहार समान होना चाहिए या नहीं।

    मानसिक आघात की गहरी छाया

    जेनिफर की स्थिति अब केवल शारीरिक या मानसिक नहीं रही, बल्कि यह एक स्थायी आघात बन चुकी है। डॉक्टरों के अनुसार, वे पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसी स्थिति से गुजर रही हैं।

    वे अक्सर एक ही सवाल दोहराती हैं, और कई बार यह भी भूल जाती हैं कि उनके पति अब इस दुनिया में नहीं हैं।

    ऑस्टेन बताते हैं कि यह स्थिति पूरे परिवार को लगातार भावनात्मक रूप से कमजोर कर रही है।

    सामाजिक दूरी और बढ़ता अकेलापन

    हमले के बाद परिवार ने धीरे-धीरे समाज से दूरी बना ली है। पहले जहां वे सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहते थे, अब वहां जाना लगभग बंद कर दिया है।

    ऑस्टेन बताते हैं कि लोग अक्सर उन्हें याद दिलाते हैं कि वे “उस परिवार से हैं जिसने हमला झेला है।” यह पहचान उनके लिए एक बोझ बन गई है।

    न्याय और व्यवस्था पर सवाल

    एक साल बीत जाने के बाद भी नथानिएल परिवार के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उन्हें न्याय मिलेगा? क्या किसी भी स्तर पर उनकी सुनवाई होगी?

    वे कहते हैं कि उन्होंने कभी ज्यादा नहीं मांगा, बस सम्मान, सहायता और स्थिरता की उम्मीद की थी।

    एक साल बाद भी अधूरा सफर

    पहलगाम हमले को एक साल पूरा हो चुका है, लेकिन नथानिएल परिवार के लिए यह समय सिर्फ तारीखों का बदलाव है। उनका दर्द वहीं का वहीं है।

    सुशील नथानिएल की यादें आज भी उनके घर में मौजूद हैं—उनकी तस्वीरें, उनकी बातें और वह आखिरी यात्रा, जो कभी वापस नहीं लौटी।

    निष्कर्ष

    यह कहानी सिर्फ एक आतंकी हमले की नहीं है, बल्कि उस मानवीय त्रासदी की है जो हर स्तर पर किसी परिवार को तोड़ देती है। सुशील नथानिएल की मृत्यु ने उनके परिवार को सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी कमजोर कर दिया है।

    जेनिफर और ऑस्टेन आज भी उस एक दिन के साए में जी रहे हैं, जहां से उनकी जिंदगी कभी वापस सामान्य नहीं हो पाई।

    और सबसे बड़ा दर्द यह है कि समय आगे बढ़ गया, लेकिन उनका जीवन वहीं ठहरा रह गया—जहां “पापा होते तो ऐसा नहीं होता…” सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि एक अधूरी जिंदगी की कहानी बन चुका है।

    कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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