बेसहारा पशुओं से किसान और राहगीर परेशान, खेतों में घुसकर सोयाबीन की फसल कर रहे चौपट
पड़ाना क्षेत्र में सड़कों पर घूम रहे पशुओं से हादसों का खतरा, रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर किसान; गौशालाओं और पशु आश्रय की व्यवस्था पर उठे सवाल
क्षेत्र में गौवंश को गौशालाओं और पशु आश्रय स्थलों तक पहुंचाने के लिए किए गए प्रबंध अपेक्षित रूप से कारगर दिखाई नहीं दे रहे हैं। स्थिति यह है कि दिन के साथ रात में भी पशु सड़कों और खेतों में बेरोकटोक घूमते दिखाई देते हैं।
सड़कों पर पशुओं के झुंड से दुर्घटना का खतरा
पड़ाना और आसपास के मार्गों पर बेसहारा पशुओं की मौजूदगी वाहन चालकों के लिए बड़ी समस्या बन गई है। कई बार पशु अचानक सड़क के बीच आ जाते हैं, जिससे वाहन चालकों को अचानक ब्रेक लगाने या वाहन की दिशा बदलने की स्थिति बनती है।
रात के समय समस्या और गंभीर हो जाती है। कम रोशनी में सड़क पर बैठे या घूमते पशु वाहन चालकों को दूर से दिखाई नहीं देते, जिससे दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस समस्या का स्थायी समाधान किया जाना आवश्यक है।
किसानों की सोयाबीन फसल को नुकसान
बेसहारा पशुओं से सबसे अधिक परेशान क्षेत्र के किसान हैं। किसानों के अनुसार गोवंश और अन्य पशु झुंड बनाकर खेतों में प्रवेश कर जाते हैं और खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं।
वर्तमान में खेतों में लगी सोयाबीन की फसल इन पशुओं से विशेष रूप से प्रभावित हो रही है। किसान कई महीनों तक मेहनत और आर्थिक निवेश कर फसल तैयार करते हैं, लेकिन पशुओं का झुंड खेत में पहुंचने पर कुछ ही समय में फसल के बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचा देता है।
रातभर खेतों की रखवाली करने की मजबूरी
क्षेत्र के कई गांवों में हालात ऐसे हैं कि किसानों को दिन के साथ रात में भी खेतों की निगरानी करनी पड़ रही है। फसल को बेसहारा पशुओं से बचाने के लिए किसान रातभर खेतों में मौजूद रहते हैं।
इसके बावजूद फसल को पूरी तरह सुरक्षित रख पाना मुश्किल हो रहा है। किसान बताते हैं कि एक खेत से पशुओं को भगाने पर वे दूसरे खेत में पहुंच जाते हैं। इससे आसपास के लगभग सभी किसानों को लगातार निगरानी करनी पड़ती है।
मेड़ और तार फेंसिंग भी नहीं रोक पा रही पशुओं को
किसान राजेश परमार, महेश खाती और बाबूलाल गुर्जर सहित अन्य किसानों का कहना है कि सोयाबीन की फसल को बेसहारा पशुओं से सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है।
किसानों के अनुसार फसल बचाने के लिए खेतों के आसपास मेड़ और तार फेंसिंग जैसे इंतजाम किए गए हैं, लेकिन कई बार पशु मेड़ पार कर या फेंसिंग के बीच से खेतों में प्रवेश कर जाते हैं। कुछ स्थानों पर फेंसिंग भी क्षतिग्रस्त हो जाती है।
इससे किसानों को फसल के नुकसान के साथ सुरक्षा व्यवस्था पर भी अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़ रही है।
पशु आश्रय व्यवस्था के प्रभाव पर किसानों ने उठाए सवाल
किसान विकास जाट, रघु परमार और कैलाश गुर्जर ने बताया कि शासन की ओर से गोवंश संरक्षण और पशु आश्रय स्थलों की व्यवस्था की गई है, लेकिन क्षेत्र में बड़ी संख्या में पशुओं के खुले घूमने के कारण इन व्यवस्थाओं का पर्याप्त प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है।
किसानों का कहना है कि यदि बेसहारा गोवंश को व्यवस्थित तरीके से नजदीकी गौशालाओं या निर्धारित पशु आश्रय स्थलों तक पहुंचाया जाए तो किसानों और वाहन चालकों दोनों को राहत मिल सकती है।
किसानों ने की स्थायी समाधान की मांग
क्षेत्र के किसानों और स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से बेसहारा पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान करने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल समय-समय पर पशुओं को सड़क से हटाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके लिए उचित आश्रय, चारे-पानी और नियमित निगरानी की व्यवस्था भी जरूरी है।
किसानों ने मांग की है कि प्रशासन और संबंधित विभाग क्षेत्र का निरीक्षण कर सड़कों और खेतों में घूम रहे बेसहारा पशुओं को सुरक्षित रूप से गौशालाओं अथवा पशु आश्रय स्थलों तक पहुंचाने की व्यवस्था करें।
किसानों का कहना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो खड़ी फसलों को और नुकसान हो सकता है। साथ ही सड़कों पर घूमते पशुओं के कारण दुर्घटनाओं का खतरा भी लगातार बना रहेगा।
