पाकिस्तान सीमा के पास जैसलमेर के रेगिस्तान में भारत की थल, वायु और नौसेना ने एक समर्पित संयुक्त युद्धाभ्यास किया जिसे ऑपरेशन त्रिशूल का नाम दिया गया है। रेगिस्तान की धूल-धुंध, गरजते टैंकों और आसमान में गूँजते फाइटर जेट्स के बीच यह अभ्यास वास्तविक युद्ध-स्थिति के करीब का अनुभव था।
ये मरु ज्वाला नामक 12-दिवसीय युद्धाभ्यास ऑपरेशन त्रिशूल का प्रमुख हिस्सा है और यह हाल में हुए ऑपरेशन सिंदूर के छह माह बाद आयोजित देश के सबसे बड़े संयुक्त अभ्यासों में से एक बताया जा रहा है।

मैदान से लेकर आकाश तक
मरुस्थल में तैनात टैंकों की चाल, सधी हुई ज़मीन-से-हवा के समन्वय और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणालियों ने दिखाया कि भारतीय सशस्त्र बल किसी भी क्षेत्रीय चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं। अभ्यास का उद्देश्य सीमित समय में, किसी भी भू-भाग में और किसी भी स्थिति में तीनों सेनाओं के समन्वित संचालन की क्षमता को परखना था। इस अभ्यास की सक्रियता ने स्पष्ट किया कि तकनीकी तैयारी के साथ-साथ युद्धक क्षमता और प्रतिक्रिया के शॉट-टू-शॉट समन्वय पर भी जोर दिया गया है।
T-90 टैंक और अन्य बख्तरबंद क्षमताएँ
अभ्यास में प्रमुख भूमि-घटक के रूप में T-90 टैंक दिखाई दिए, जिनकी बेहतर गतिशीलता और रक्षात्मक उपायों ने चलती-फिरती परिस्थितियों में प्रभाव दिखाया। इन बख्तरबंद वाहनों की क्षमता और अनुकूलनशीलता ने रेतीले और उबड़-खाबड़ इलाके में भी तेज़ी से संचालन करने की छवि पेश की। साथ ही, होवित्जर गन और अन्य आर्टिलरी यूनिट्स द्वारा दिया गया समर्थन भी संचालन के पैमानों और अग्नि-समन्वय का परीक्षण कर रहा था।
पहली बार अपाचे का मैदान में समावेश
ऑपरेशन त्रिशूल में एक विशेष आकर्षण अमेरिकी निर्मित AH-64E अपाचे अटैक हेलीकॉप्टरों का पहला व्यवस्थित समावेश रहा। इन हेलीकॉप्टरों ने जमीन पर तैनात टैंकों और सेनानियों को एयर कवर उपलब्ध कराया और रात-दिन दोनों में लक्ष्यों की पहचान व निशाना साधने के अभ्यास किए गए। अपाचे प्लेटफ़ॉर्म पर लक्षित-खोज एवं मौसम- एवं रात्री-समर्थ संसाधनों के समावेश ने हवाई समर्थन और निचले ऊँचाई पर हमला क्षमताओं का सफल परीक्षण दिखाया। इन एयरक्राफ्टों का प्रशिक्षण फिलहाल आर्मी एविएशन ट्रेनिंग स्कूल में चल रहा है और अनुमान है कि इन्हें पश्चिमी सीमाओं पर आवश्यक तैनाती के लिए तैयार किया जा रहा है।
रणनीतिक संदेश और सीमांत सतर्कता
दिल्चस्प बात यह है कि यह युद्धाभ्यास सीमावर्ती क्षेत्रों में होने के कारण रणनीतिक संदेश भी देता है — यह न केवल सशक्त व्यवहारिक तैयारी का संकेत है, बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में त्वरित और समन्वित जवाब देने की क्षमता का भी प्रदर्शन है। अभ्यास के दौरान सीमा-क्षेत्रों पर हाई अलर्ट के माहौल और दोनों तरफ के सतर्कता स्तर ने स्पष्ट कर दिया कि समुचित तैयारी और मूव-ऑन-डिमांड क्षमताएँ कितनी महत्वपूर्ण हैं।
