अमेरिका ने ईरान को दी तेल प्रतिबंधों में छूट वापस ली, होर्मुज स्ट्रेट हमले के बाद ट्रंप प्रशासन का बड़ा फैसला
प्रस्तावना
अमेरिका ने मंगलवार को एक बड़ा और अहम फैसला लेते हुए ईरान को दी गई तेल प्रतिबंधों में छूट (Sanctions Waiver) को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया। यह छूट कुछ सप्ताह पहले दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत दी गई थी, जिसके कारण कई देशों को ईरान से ऊर्जा खरीदने पर अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना नहीं करना पड़ता था। लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में तीन वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के बाद अमेरिका ने अपना रुख पूरी तरह बदल लिया है।
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि ईरान ने युद्धविराम (Ceasefire) की भावना का उल्लंघन किया है और उसकी हालिया सैन्य गतिविधियां क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने न केवल छूट समाप्त की, बल्कि ईरान के खिलाफ नए हवाई हमले भी शुरू कर दिए।
क्या था अमेरिका और ईरान के बीच समझौता?
कुछ सप्ताह पहले अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत दोनों देशों ने तनाव कम करने और संघर्ष रोकने पर सहमति जताई थी। इस समझौते के बाद अमेरिका ने ईरान को 60 दिनों की विशेष छूट दी थी।
इस छूट के तहत कई देशों को ईरान से तेल और अन्य ऊर्जा उत्पाद खरीदने की अनुमति मिली थी। अमेरिका ने यह राहत इस उम्मीद के साथ दी थी कि ईरान समझौते की सभी शर्तों का पालन करेगा और क्षेत्र में किसी भी तरह की आक्रामक गतिविधियों से दूर रहेगा।
यह छूट जून के अंतिम सप्ताह में लागू हुई थी और 21 अगस्त तक प्रभावी रहने वाली थी। लेकिन निर्धारित अवधि पूरी होने से पहले ही अमेरिका ने इसे समाप्त कर दिया।
होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हमले के बाद बदला अमेरिकी रुख
अमेरिका के फैसले की सबसे बड़ी वजह होर्मुज स्ट्रेट में हुए हालिया हमले बताए जा रहे हैं।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट से गुजर रहे तीन वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया गया। इन हमलों के लिए अमेरिका ने सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की बड़ी मात्रा इसी रास्ते से होकर गुजरती है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है।
अमेरिका का कहना है कि इन हमलों ने न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार को खतरे में डाला बल्कि हाल ही में हुए युद्धविराम समझौते को भी कमजोर किया।
ट्रंप प्रशासन ने क्यों रद्द की छूट?
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने मंगलवार को आधिकारिक रूप से घोषणा की कि ईरान को दी गई प्रतिबंधों में छूट तत्काल प्रभाव से समाप्त की जा रही है।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ईरान ने समझौते के तहत मिलने वाले लाभों का दुरुपयोग किया है। अमेरिका के मुताबिक यदि कोई देश समझौते का सम्मान नहीं करता तो उसे आर्थिक राहत मिलने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया कि ईरान के हालिया कदमों ने यह साबित कर दिया है कि वह क्षेत्र में तनाव कम करने के बजाय उसे बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
अमेरिकी अधिकारी ने क्या कहा?
लाइसेंस रद्द करने की घोषणा करते हुए अमेरिकी अधिकारी ने कहा,
“जैसा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनका प्रशासन लगातार कहते रहे हैं, ईरान के साथ लागू समझौता पूरी तरह प्रदर्शन आधारित है। ईरान को केवल तभी लाभ मिलेगा जब वह अच्छा व्यवहार करेगा और समझौते की शर्तों का पालन करेगा।”
इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका अब भविष्य में भी ईरान को किसी प्रकार की आर्थिक राहत देने से पहले उसके व्यवहार का मूल्यांकन करेगा।
अमेरिका ने फिर शुरू किए हवाई हमले
प्रतिबंधों में छूट खत्म करने के साथ-साथ अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ फिर से सैन्य कार्रवाई भी शुरू कर दी।
अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के अनुसार, बंदर अब्बास सहित कई रणनीतिक स्थानों पर हवाई हमले किए गए। इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करना और हालिया समुद्री हमलों का जवाब देना बताया गया।
अमेरिका का दावा है कि यह कार्रवाई केवल सुरक्षा कारणों से की गई है और इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की रक्षा करना है।
सेंटकॉम ने ईरान की कार्रवाई को बताया खतरनाक
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने भी ईरान की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है।
सेंटकॉम ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि ईरान की ओर से की गई कार्रवाई “अनुचित”, “खतरनाक” और “युद्धविराम का स्पष्ट उल्लंघन” है।
बयान में कहा गया,
“ईरान की यह आक्रामकता क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है और यह युद्धविराम समझौते की भावना के बिल्कुल विपरीत है।”
सेंटकॉम के अनुसार, अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सेनाएं अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर आवश्यक कदम उठाती रहेंगी।
21 अगस्त तक लागू रहने वाली थी छूट
अमेरिका द्वारा दी गई यह विशेष छूट कुल 60 दिनों के लिए थी।
यदि ईरान समझौते की सभी शर्तों का पालन करता, तो यह राहत 21 अगस्त तक जारी रहती। इस अवधि में कई देशों को ईरानी ऊर्जा खरीदने की अनुमति थी और उन पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू नहीं होते।
लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हुए हमलों के बाद अमेरिका ने यह निष्कर्ष निकाला कि ईरान ने समझौते की भावना का पालन नहीं किया। इसी कारण निर्धारित समय से पहले ही छूट समाप्त कर दी गई।
भारत के लिए क्यों थी महत्वपूर्ण यह राहत?
ईरान को मिली यह छूट भारत जैसे देशों के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।
भारत पहले ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता था। अमेरिकी प्रतिबंध लागू होने के बाद भारत को ईरान से तेल खरीदना लगभग बंद करना पड़ा था।
हालिया छूट मिलने के बाद यह उम्मीद बढ़ी थी कि भारत फिर से सीमित स्तर पर ईरानी ऊर्जा खरीद सकेगा, जिससे तेल आयात के स्रोतों में विविधता आएगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
लेकिन अमेरिका के नए फैसले के बाद यह संभावना फिलहाल खत्म होती दिखाई दे रही है।
भारत आ रहा था ऊर्जा सामग्री से लदा जहाज
रिपोर्टों के अनुसार, जिन तीन जहाजों पर हमला हुआ उनमें एक कतरी जहाज “अल-रेकय्यात” भी शामिल था।
बताया जा रहा है कि यह जहाज ऊर्जा सामग्री लेकर भारत की ओर आ रहा था। हालांकि हमले के बाद उसकी यात्रा प्रभावित हुई और सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे घटनाक्रम पर नजर रखी।
यदि समुद्री मार्गों पर इस तरह के हमले लगातार जारी रहते हैं, तो भारत सहित कई एशियाई देशों की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है।
खाड़ी देशों से निकलने वाला अधिकांश कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी समुद्री रास्ते से होकर एशिया, यूरोप और अन्य देशों तक पहुंचती है।
भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया सहित कई बड़े ऊर्जा आयातक देश इस समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं।
ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव वैश्विक तेल कीमतों में तेजी, शिपिंग लागत में वृद्धि और ऊर्जा आपूर्ति में बाधा पैदा कर सकता है।
वैश्विक बाजार पर क्या पड़ सकता है असर?
अमेरिका द्वारा छूट वापस लेने और ईरान के खिलाफ नए सैन्य अभियान शुरू करने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है।
इसके अलावा शिपिंग कंपनियों के बीमा खर्च बढ़ सकते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार महंगा हो सकता है।
ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों को भी अतिरिक्त आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
क्या आगे और बढ़ सकता है तनाव?
अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही कई मुद्दों को लेकर मतभेद रहे हैं। हालिया घटनाओं के बाद दोनों देशों के संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण हो गए हैं।
यदि ईरान अमेरिका के आरोपों को खारिज करता है और जवाबी कार्रवाई करता है, तो मध्य पूर्व में सैन्य तनाव और बढ़ सकता है। दूसरी ओर, अमेरिका ने संकेत दिया है कि यदि ईरान अपनी गतिविधियों में बदलाव नहीं करता, तो उस पर और कड़े आर्थिक तथा सैन्य कदम उठाए जा सकते हैं।
निष्कर्ष
होर्मुज स्ट्रेट में वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए तेल प्रतिबंधों में दी गई 60 दिनों की छूट तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ईरान ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया और युद्धविराम का उल्लंघन किया है।
इस फैसले का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत सहित उन सभी देशों पर पड़ सकता है जो ऊर्जा आपूर्ति के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है या यह विवाद वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर और गहरा प्रभाव डालता है।
