Middle East में तनाव घटने से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, क्या सस्ते होंगे पेट्रोल-डीजल?
ग्लोबल ऊर्जा बाजार में शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट ऐसे समय में देखने को मिली है जब पश्चिम एशिया यानी Middle East में लंबे समय से जारी तनाव और संघर्ष के कम होने की उम्मीदें बढ़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई इस नरमी ने निवेशकों को राहत दी है, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या इसका फायदा आम लोगों को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी के रूप में मिलेगा या नहीं।
ब्रेंट और WTI क्रूड में गिरावट दर्ज
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स गिरकर 97.99 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी लगभग 2 प्रतिशत की गिरावट के साथ 92.91 डॉलर प्रति बैरल के इंट्रा-डे लो तक पहुंच गया।
यह गिरावट इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पिछले कारोबारी सत्र में ब्रेंट क्रूड में करीब 5 प्रतिशत की तेज बढ़त दर्ज हुई थी और यह 99 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया था। लगातार उतार-चढ़ाव के बीच बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।
Middle East में तनाव कम होने की उम्मीद बनी मुख्य वजह
कच्चे तेल की कीमतों में आई इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक तनाव में संभावित कमी को माना जा रहा है। इजरायल, लेबनान और ईरान से जुड़े हालात में धीरे-धीरे नरमी के संकेत मिल रहे हैं।
लंबे समय से इस क्षेत्र में संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी। इसी वजह से तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा था। अब जैसे ही शांति की उम्मीदें बढ़ी हैं, निवेशकों की चिंता कम हुई है और इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है।
डोनाल्ड ट्रंप के बयान का बाजार पर असर
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोशल मीडिया पोस्ट ने भी बाजार की धारणा को प्रभावित किया है। उन्होंने अपने प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिनों के युद्धविराम की जानकारी दी और क्षेत्र में शांति की उम्मीद जताई।
इसके अलावा उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका और ईरान एक महत्वपूर्ण समझौते के काफी करीब पहुंच रहे हैं। इन बयानों के बाद वैश्विक बाजार में सकारात्मक माहौल बना और जोखिम प्रीमियम में कमी आई, जिसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा।
ईरान से जुड़े संकेतों ने भी बदली धारणा
ईरान की ओर से भी कुछ नरमी के संकेत मिले हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने की दिशा में लंबे समय तक आगे बढ़ने की बात कही है। इस तरह के संकेतों ने वैश्विक निवेशकों के बीच तनाव की आशंका को कम किया है।
जब भी भू-राजनीतिक तनाव घटता है, तो सुरक्षित निवेश (safe haven) की मांग कम हो जाती है और इसका असर सोने और तेल जैसी कमोडिटी पर साफ दिखाई देता है। इसी वजह से कच्चे तेल की कीमतों में दबाव देखने को मिला है।
घरेलू बाजार पर भी दिखा असर
भारत में भी कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का असर देखने को मिला है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर कच्चे तेल की कीमतें लगभग 2.6 प्रतिशत गिरकर 8,625 रुपये प्रति बैरल पर आ गई हैं।
भारत एक आयात-निर्भर देश है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का बाहर से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला हर बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होता है।
क्या सस्ते होंगे पेट्रोल और डीजल?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस गिरावट का फायदा आम लोगों को मिलेगा या नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सीधा असर तुरंत पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर नहीं पड़ता।
पेट्रोल और डीजल के दाम कई कारकों पर निर्भर करते हैं, जैसे कि—
डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति
केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए टैक्स
तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति
और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिरता
इन सभी कारणों के चलते यह जरूरी नहीं है कि कच्चा तेल सस्ता होते ही पेट्रोल और डीजल भी तुरंत सस्ते हो जाएं।
वैश्विक बाजारों में मिला-जुला असर
तेल की कीमतों में गिरावट का असर सिर्फ ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक शेयर बाजारों पर भी देखा गया है।
अमेरिका में वॉल स्ट्रीट और नैस्डैक में हल्की बढ़त दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि निवेशकों का भरोसा थोड़ा मजबूत हुआ है। दूसरी ओर, एशियाई बाजारों में लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली क्योंकि वहां अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत में भी शुरुआती कारोबार में सुस्ती रही, हालांकि बाद में बाजार में हल्की रिकवरी देखने को मिली।
निष्कर्ष
मिडिल ईस्ट में तनाव कम होने की उम्मीदों ने कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट लाकर वैश्विक बाजार को राहत दी है। हालांकि पेट्रोल और डीजल के दाम सस्ते होंगे या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है और यह पूरी तरह से आने वाले दिनों की अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
