मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण पर सियासी घमासान तेज, जीतू पटवारी का BJP पर बड़ा हमला
मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत OBC आरक्षण को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामले की सुनवाई के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और पीसीसी चीफ जीतू पटवारी ने भाजपा सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार OBC वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देना ही नहीं चाहती, इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अपने वकील तक नहीं भेजे गए। जीतू पटवारी ने यह आरोप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए लगाए, जिसके बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई। उन्होंने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार को घेरते हुए कहा कि भाजपा की मंशा शुरू से ही OBC आरक्षण को रोकने की रही है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और राजनीतिक बयानबाजी
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में मध्य प्रदेश के OBC आरक्षण से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। इस सुनवाई के साथ ही प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि सरकार जानबूझकर इस मामले को कमजोर कर रही है, ताकि OBC वर्ग को उसका संवैधानिक अधिकार न मिल सके। जीतू पटवारी ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान मोहन सरकार की ओर से कोई भी वकील उपस्थित नहीं हुआ, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार की नीयत OBC आरक्षण को लागू करने की नहीं है।
जीतू पटवारी का तीखा आरोप
पीसीसी चीफ जीतू पटवारी ने एक्स पर लिखा, भाजपा सरकार की नीयत OBC वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की है ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट में OBC आरक्षण को लेकर हुई सुनवाई में मोहन सरकार ने अपने वकील ही नहीं भेजे। इससे साफ है कि सरकार प्रदेश के ओबीसी समाज को उसका हक देना नहीं चाहती। उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस सरकार ने कमलनाथ के मुख्यमंत्री रहते हुए ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐतिहासिक फैसला लिया था, लेकिन भाजपा सरकार इसे लागू करने से लगातार बचती रही है।
OBC आरक्षण रोकने में खर्च किए करोड़ों
जीतू पटवारी ने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बीते 7 से 8 वर्षों में भाजपा ने OBC आरक्षण को रोकने के लिए जनता के करोड़ों रुपये खर्च किए। उन्होंने कहा कि सरकार ने महंगे वकील किए, उनके लिए चार्टर प्लेन तक की व्यवस्था की गई, लेकिन इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई में वकीलों का मौजूद न होना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। पटवारी ने लिखा, इतने सालों में भाजपा ने OBC आरक्षण रोकने के लिए जनता के कई करोड़ रुपये वकीलों पर खर्च किए, उनके आने-जाने के लिए चार्टर प्लेन तक दिए गए, लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट में उनके वकील नहीं पहुंचे। यह सरकार की नीयत को उजागर करता है।”
मुख्यमंत्री और शिवराज सिंह चौहान से माफी की मांग
अपने बयान में जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के साथ-साथ पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि पूरे मध्य प्रदेश की जनता देख रही है कि किस तरह OBC वर्ग के साथ अन्याय किया जा रहा है। पटवारी ने कहा कि मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री को ओबीसी समाज से हाथ जोड़कर माफी मांगनी चाहिए और कांग्रेस सरकार द्वारा दिया गया 27 प्रतिशत आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू करना चाहिए।
कमलनाथ भी उठा चुके हैं सवाल
यह पहला मौका नहीं है जब कांग्रेस ने OBC आरक्षण को लेकर भाजपा सरकार की नीयत पर सवाल उठाए हों। इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी सरकार पर गंभीर आरोप लगा चुके हैं। कमलनाथ ने कहा था कि OBC आरक्षण के मामले में सरकार जानबूझकर लापरवाही करती है। कमलनाथ का आरोप था कि कभी सरकार के वकील अदालत में नहीं पहुंचते, तो कभी जरूरी दस्तावेज समय पर पेश नहीं किए जाते। उन्होंने कहा था कि यह सब जानबूझकर किया जाता है, ताकि OBC वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण न मिल सक
OBC आरक्षण बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण लंबे समय से एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। कांग्रेस लगातार यह दावा करती रही है कि उसने सत्ता में रहते हुए ओबीसी वर्ग को उसका हक देने की कोशिश की, जबकि भाजपा सरकार ने इसे लागू नहीं होने दिया। वहीं भाजपा की ओर से यह कहा जाता रहा है कि मामला कानूनी अड़चनों में फंसा हुआ है और सरकार कानून के दायरे में रहकर ही फैसला कर सकती है। हालांकि कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह केवल बहाना है और सरकार की असली मंशा आरक्षण लागू करने की नहीं है।
आगामी राजनीति पर असर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि OBC आरक्षण का मुद्दा आने वाले समय में और बड़ा राजनीतिक रूप ले सकता है। राज्य की राजनीति में ओबीसी वर्ग की भूमिका अहम मानी जाती है और ऐसे में यह मुद्दा आगामी चुनावों में बड़ा असर डाल सकता है। जीतू पटवारी और कमलनाथ के बयानों के बाद साफ है कि कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर आक्रामक रणनीति अपनाने जा रही है, जबकि भाजपा के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की चुनौती खड़ी हो गई है।
