दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन इंदौर में
इंदौर। श्री दिगंबर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट और कुंदकुंद ज्ञानपीठ के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 20 और 21 दिसंबर को किया जा रहा है। इस आयोजन को लेकर गुरुवार को आयोजित प्रेस वार्ता में आयोजन की रूपरेखा और कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी दी गई। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि यह संगोष्ठी प्राकृत वांग्यमय और सिरि भूवलय के परिप्रेक्ष्य में आयोजित की जा रही है।
आयोजन के उद्देश्य
श्री दिगंबर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल ने प्रेस वार्ता में बताया कि इस दो दिवसीय संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर विचार-विमर्श करना है। इस आयोजन में देशभर के विद्वान प्रोफेसर, कुलगुरु और प्रख्यात शोधकर्ता भाग लेंगे, जो प्राकृत वांग्यमय और सिरि भूवलय के महत्व को समझने और साझा करने में योगदान देंगे।
कासलीवाल ने कहा कि यह संगोष्ठी केवल शैक्षणिक चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्द्धन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आयोजन में भाग लेने वाले विद्वान विभिन्न यूनिवर्सिटी और शोध संस्थानों से आएंगे और अपने अनुभव और शोध निष्कर्ष साझा करेंगे।
संगोष्ठी का कार्यक्रम और सत्र
संगोष्ठी का शुभारंभ शनिवार, 20 दिसंबर को सुबह 9 बजे उद्घाटन समारोह के साथ किया जाएगा। पहले दिन तीन सत्र आयोजित किए जाएंगे। इन सत्रों में प्राकृत विद्या के विभिन्न आयाम, प्राचीन पांडुलिपियों की ऐतिहासिकता और सिरि भूवलय के अध्ययन पर विद्वानों द्वारा विचार विमर्श किया जाएगा। प्रत्येक सत्र में विशेषज्ञ अपनी विवेचनाएं प्रस्तुत करेंगे और प्राकृत साहित्य एवं ज्ञान परंपरा के ऐतिहासिक महत्व पर गहन चर्चा करेंगे।
दूसरे दिन, रविवार, 21 दिसंबर को सुबह 9 बजे से सत्रों का संचालन होगा। दूसरे दिन के सत्रों में प्राकृत वांग्यमय का संस्कृति संरक्षण और संवर्द्धन में योगदान, सिरि भूवलय के अद्वितीय पहलू और ज्ञान परंपरा में इसके महत्व पर चर्चा की जाएगी। इसके अतिरिक्त आयोजन के समापन में पुरस्कार और सम्मान समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसमें विद्वानों और योगदानकर्ताओं को सम्मानित किया जाएगा।
मुख्य अतिथि और विशिष्ट सहभागिता
इस दो दिवसीय संगोष्ठी में अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज के सानिध्य में कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। उन्होंने इस आयोजन में उपस्थित होने और मार्गदर्शन देने की पुष्टि की है। इसके अलावा देशभर के 40 से अधिक विद्वान अतिथि इस आयोजन में भाग लेंगे। इनमें विभिन्न विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और ज्ञानपीठों के प्रमुख विद्वान शामिल हैं।
अमित कासलीवाल ने बताया कि प्रत्येक सत्र में विद्वानों को पर्याप्त समय दिया जाएगा ताकि वे सिरि भूवलय और प्राकृत वांग्यमय पर अपने शोध निष्कर्ष साझा कर सकें। उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी विद्वानों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए ज्ञान का अद्वितीय स्रोत साबित होगी।
प्रेस वार्ता और मीडिया सहभागिता
इस आयोजन के संबंध में प्रेस वार्ता में ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, एडमिनिस्ट्रेटर डॉ. अरविंद कुमार जैन, श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन और संजय पापड़ीवाल सहित बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी उपस्थित रहे। प्रेस वार्ता में उन्होंने आयोजन के महत्व, सत्रों की रूपरेखा और विद्वानों की सहभागिता के बारे में विस्तृत जानकारी दी।
राजेश जैन दद्दू ने बताया कि संगोष्ठी के दौरान आयोजित चर्चाओं और विमर्शों का उद्देश्य केवल शैक्षणिक ज्ञान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को युवाओं और शोधकर्ताओं तक पहुँचाने का प्रयास भी किया जाएगा।

संगोष्ठी का महत्व और संभावित योगदान
अमित कासलीवाल ने कहा कि प्राकृत वांग्यमय और सिरि भूवलय भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इनका अध्ययन न केवल ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि आधुनिक समाज और शिक्षाव्यवस्था में भी इसका योगदान अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि संगोष्ठी में भाग लेने वाले विद्वान अपने अनुभवों और शोध निष्कर्षों के माध्यम से नई पीढ़ी को प्रेरित करेंगे और भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में मदद करेंगे।
संगोष्ठी के दौरान विद्वान अतिथि विभिन्न कार्यशालाओं, सत्रों और विमर्शों के माध्यम से प्राकृत वांग्यमय और सिरि भूवलय के अध्ययन के आधुनिक दृष्टिकोण और तकनीकों पर भी प्रकाश डालेंगे। यह आयोजन शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक होने के साथ-साथ उन्हें प्रेरित करने वाला भी साबित होगा।
भविष्य की योजनाएं
अमित कासलीवाल ने बताया कि इस प्रकार की राष्ट्रीय संगोष्ठी आगे भी नियमित अंतराल पर आयोजित की जाएगी। इसका उद्देश्य केवल प्राचीन ज्ञान परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान के आधुनिक अध्ययन और शोध को बढ़ावा देना भी है। उन्होंने कहा कि इस आयोजन में भाग लेने वाले विद्वान और विशेषज्ञ अपने अनुभवों और शोध निष्कर्षों के माध्यम से भविष्य में और अधिक व्यापक और गहन अध्ययन के मार्ग खोलेंगे।
सारांश
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 20 और 21 दिसंबर को इंदौर में आयोजित की जाएगी। इसका मुख्य उद्देश्य प्राकृत वांग्यमय और सिरि भूवलय के विविध आयामों पर चर्चा करना और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्द्धन में योगदान देना है। आयोजन में देशभर से 40 से अधिक विद्वान शामिल होंगे और अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज के सानिध्य में विभिन्न सत्र और पुरस्कार समारोह आयोजित किए जाएंगे। यह संगोष्ठी विद्वानों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत साबित होगी।
मुख्य विवरण:
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आयोजन: दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
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तिथि: 20-21 दिसंबर
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स्थान: इंदौर
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मुख्य अतिथि: पूज्यसागर जी महाराज
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विद्वान: देशभर से 40+
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विषय: प्राकृत वांग्यमय एवं सिरि भूवलय, भारतीय ज्ञान परंपरा
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समापन: पुरस्कार एवं सम्मान समारोह
