Nagda में अंजनशलाका प्रतिष्ठा महोत्सव: श्रद्धालुओं ने झूम कर मनाई खुशियाँ
दिनांक 06.02.2026 को Nagda स्थित सिद्धाचलपुरम् जिनालय में नौ दिवसीय अंजनशलाका महोत्सव का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। यह महोत्सव जैन समाज के लिए अत्यंत पावन और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवसर पर आचार्य नयचन्द्रसागरसूरीश्वरजी मसा सहित मुनिमंडल और साध्वीमंडल की उपस्थिति में जिन प्रतिमाओं का प्रतिष्ठा विधान संपन्न हुआ। साथ ही लाभार्थी परिवार को आचार्यश्री द्वारा मानद उपाधि भी प्रदान की गई, जिससे महोत्सव की भव्यता और भी बढ़ गई।
प्रतिष्ठा की विधिवत शुरुआत
प्रतिष्ठा का प्रारंभ सुबह 8:45 बजे माणक थम्भ और तोरण क्रिया से हुआ। इस अवसर पर लाभार्थी परिवार ने मूर्तिपूजक जैन श्रीसंघ के सहयोग से नवकारशी का आयोजन किया। इसके बाद सुबह 9 बजे आचार्यश्री ने जिनालय में प्रवेश कर प्रतिष्ठा का मूल मंत्र उच्चारित किया। जैसे ही मंत्र बोला गया, लाभार्थी परिवार ने मंदिर में कंकु के छापे लगाए और उपस्थित श्रद्धालुओं ने झूम कर इस पावन अवसर की खुशियाँ मनाईं।
श्रद्धालुओं की भागीदारी
प्रतिष्ठा के समय जिनालय के शिखर पर खड़े श्रद्धालुओं ने थाली का वादन किया और ध्वजा फहराई। मंदिर परिसर में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं की आंखों में उल्लास और हर्ष स्पष्ट दिखाई दे रहा था। चेन्नई से आए विधिकारक सत्यविजय और प्रसन्नविजय ने प्रतिष्ठा का विधान संपन्न कराया। प्रतिष्ठा के पश्चात आचार्यश्री ने सामूहिक चैत्यवंदन और बृहद शांति पाठ करवाया, जिससे पूरे परिसर में पवित्र वातावरण का अनुभव हुआ।
धर्मसभा का आयोजन
सुबह 10:30 बजे धर्मसभा की शुरूआत आचार्यश्री के मंगलाचरण से हुई। सामूहिक गुरूवंदन प्रस्तुति श्रीसंघ के पूर्व अध्यक्ष सुनील वागरेचा ने दी। लाभार्थी परिवार ने चांदी की गिन्नी और केशर से गुरूपूजन कर आचार्यश्री को ग्रंथ वैहराया। धर्मसभा का स्वागत उद्बोधन श्रीसंघ अध्यक्ष मनीष सालेचा व्होरा ने किया। इसके पश्चात आचार्यश्री और मुनिमंडल ने श्रद्धालुओं को संबोधित किया और धर्म, आचार और साधना की महत्वपूर्ण बातें साझा कीं।
विशेष उपाधियों का प्रदान
धर्मसभा के दौरान संघ के पदाधिकारियों ने आचार्यश्री को शिल्प विधान विशारद की उपाधि और लाभार्थी परिवार के संघवी यशंवत वागरेचा को संघ गौरव की मानद उपाधि प्रदान की। इस अवसर पर महामहिम राज्यपाल थावरचन्द्र गेहलोद और केप्टन आयुष वागरेचा भी उपस्थित रहे और उन्होंने धर्मसभा को संबोधित किया। सभा में संगीतकार आयुष बोहरा ने भजन और धार्मिक संगीत प्रस्तुत कर माहौल को और अधिक पावन बनाया। संचालन का कार्य श्रीसंघ मीडिया डॉ. विपिन वागरेचा ने किया, जबकि आभार श्रीसंघ हर्षित नागदा ने माना।
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लाभार्थी परिवार की भूमिका
प्रतिष्ठा और धर्मसभा के आयोजन में लाभार्थी परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने आचार्यश्री के स्वागत, पूजा और महोत्सव के प्रबंध की पूरी व्यवस्था की। साथ ही मंदिर परिसर में सुविधाओं का ध्यान रखा और सभी उपस्थित श्रद्धालुओं को भव्य धार्मिक अनुभव प्रदान किया। लाभार्थी परिवार ने सकल जैन श्रीसंघ के स्वामीवात्सयल का आयोजन भी संपन्न कराया, जिससे सभी श्रद्धालुओं को अत्यंत आनंद और भक्ति की अनुभूति हुई।
रतलाम में साध्वीश्री का आगामी चातुर्मास
धर्मसभा के दौरान रतलाम श्रीसंघ अध्यक्ष ने आगामी चातुर्मास आराधना हेतु हेमप्रज्ञाश्रीजी मसा आदि साध्वीवृन्द की विंनती की। आचार्यश्री ने इसे स्वीकार करते हुए रतलाम में साध्वीश्री की आज्ञा प्रदान की। साध्वीश्री का आगामी चातुर्मास धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और जैन धर्म अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का स्रोत बनेगा।
महापूजन और महाआरती
दोपहर 2 बजे बृहद शांति स्नात्र महापूजन का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से पूजा में भाग लिया और धार्मिक विधियों का पालन किया। शाम 8 बजे कृतज्ञता उत्सव का आयोजन हुआ, जिसमें लाभार्थी परिवार ने श्रीसंघ प्रमुख एवं शासन सेवकों का सम्मान किया।
रात 9 बजे कुमारपाल महाराजा द्वारा महाआरती उतारी गई। महाआरती के समय दिपक के प्रकाश से जिनालय भव्य रूप से जगमगाया। यह नजारा न केवल श्रद्धालुओं के लिए अद्भुत था, बल्कि धार्मिक आस्था और भक्ति की गहन अनुभूति भी कराता था।

द्वार उद्घाटन और समापन
महोत्सव के पहले दिन का समापन इस भव्य धार्मिक आयोजन के साथ हुआ। अगले दिन द्वार उद्घाटन का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसे लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह और उमंग की भावना स्पष्ट दिखाई दी।
निष्कर्ष
Nagda में आयोजित यह अंजनशलाका प्रतिष्ठा महोत्सव न केवल जैन धर्म के अनुयायियों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए आध्यात्मिक आनंद और धार्मिक प्रेरणा का स्त्रोत बना। आचार्यश्री के मार्गदर्शन, श्रद्धालुओं की भागीदारी और लाभार्थी परिवार के सहयोग से यह आयोजन अत्यंत सफल और भव्य रूप से संपन्न हुआ।
इस महोत्सव ने धार्मिक आस्था, अनुशासन और श्रद्धा के माध्यम से जैन समाज के बीच एकता और सामूहिक भक्ति की भावना को प्रबल किया। यह आयोजन आने वाले वर्षों के लिए भी जैन धर्म के अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा और धार्मिक गतिविधियों को और अधिक प्रभावी बनाएगा।

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