धर्मसभा में सत्कर्म, संयम, सेवा और सद्भावना से पुण्य संचय का दिया संदेश
Nagda जंक्शन, 26 अगस्त 2026। श्री स्थानकवासी जैन चातुर्मास समिति, नागदा के चातुर्मास आयोजन के तहत आयोजित धर्मसभा में पूज्य महासती सरोज श्रीजी म.सा. ने श्रद्धालुओं को पुण्य, पुरुषार्थ और सत्कर्म के महत्व पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया।
महासती सरोज श्रीजी ने कहा कि पाप और पुण्य एक-दूसरे के विपरीत हैं। मनुष्य वर्तमान में जिस स्थिति में जीवन व्यतीत कर रहा है, उसमें उसके पूर्व के पुण्य कर्मों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि पुण्य का उदय प्रबल हो तो कई ऐसी वस्तुएं और परिस्थितियां भी सहज रूप से प्राप्त हो जाती हैं, जिन्हें प्राप्त करना सामान्य परिस्थितियों में कठिन दिखाई देता है।
पुरुषार्थ के साथ पुण्य का उदय भी महत्वपूर्ण
धर्मसभा में उन्होंने कहा कि संसार में असंख्य ऐसी वस्तुएं हैं, जिन्हें पाने की इच्छा हर व्यक्ति के मन में होती है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी हर इच्छा को पूरा नहीं कर पाता। मनुष्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करता है, लेकिन जीवन में केवल पुरुषार्थ ही पर्याप्त नहीं होता। पुण्य का उदय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि पुण्य का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य केवल भाग्य के भरोसे बैठ जाए और कर्म करना छोड़ दे। पुरुषार्थ करते हुए अच्छे कर्म करना ही जीवन का सही मार्ग है।
सत्कर्म और सेवा से होता है पुण्य का संचय
महासती सरोज श्रीजी ने कहा कि सत्कर्म, संयम, सेवा, दया और सद्भावना जैसे गुणों से पुण्य का संचय होता है। इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए और परिणाम की चिंता किए बिना निरंतर अच्छे कार्य करते रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब पुण्य का संयोग मिलता है तो कई बार असंभव दिखाई देने वाली राह भी सरल हो जाती है। इसलिए व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी निराश नहीं होना चाहिए और अपने सद्कर्मों को निरंतर जारी रखना चाहिए।
तृष्णा का नहीं होता कोई अंत
धर्मसभा में महासती ने मनुष्य की इच्छाओं और तृष्णा पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तृष्णा का कोई अंत नहीं है। मनुष्य की इच्छाएं लगातार बढ़ती रहती हैं। एक इच्छा पूरी होने के बाद दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है और व्यक्ति लगातार अधिक पाने की दौड़ में लगा रहता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को समझाया कि जीवन में केवल भौतिक उपलब्धियों को लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए। आत्मिक शांति और सदाचार को भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना चाहिए।
मन को नियंत्रित रखना जरूरी
महासती सरोज श्रीजी ने कहा कि मनुष्य का मन बहुत विचित्र होता है। एक पल में मन की स्थिति बदल सकती है। मनुष्य के विचार और भावनाएं पल-पल बदलते रहते हैं। ऐसे में व्यक्ति को अपने मन को संयमित रखने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म और सदाचार का मार्ग मन को स्थिरता प्रदान करता है। जीवन में ऐसे मार्ग का चयन करना चाहिए, जिससे स्वयं के साथ-साथ अन्य जीवों की भी रक्षा और कल्याण हो।
जीवों की रक्षा वाला मार्ग अपनाने का आह्वान
महासती सरोज श्रीजी ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि हमेशा उस मार्ग पर चलना चाहिए, जिस मार्ग पर जीवों की रक्षा होती हो। दया, करुणा, संयम और अहिंसा को जीवन में अपनाने से व्यक्ति के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने प्रत्येक कार्य और विचार के प्रति सजग रहना चाहिए, क्योंकि उसके कर्म ही उसके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं।
धर्मसभा में समाजजनों की सहभागिता
धर्मसभा में जयेश राठौर, उमेश संघवी, रजनीश भटेवरा, सुरेंद्र पितलिया, आत्माराम राठौर, दिनेश ओरा, रखबचंद पितलिया, राजेंद्र कांठेड़, जवाहर ओरा, अनिल पावेचा, आकाश वोरा सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
इस दौरान प्रिया नवादा वाले के दो उपवास भी चल रहे हैं। धार्मिक आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं ने साध्वी भगवंतों के प्रवचन का लाभ लिया और धर्म आराधना में सहभागिता की।
अतिथि सत्कार और संचालन
धर्मसभा में अतिथि सत्कार एवं कार्यक्रम का संचालन दिलीप पार्थ कांठेड़ ने किया। कार्यक्रम के अंत में संघ अध्यक्ष सतीश जैन सांवैर वाला ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।
श्री स्थानकवासी जैन चातुर्मास समिति, नागदा की ओर से आयोजित चातुर्मास कार्यक्रमों के माध्यम से श्रद्धालुओं को नियमित रूप से धर्म, संयम, अहिंसा और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जा रही है।
उक्त जानकारी: श्री स्थानकवासी जैन चातुर्मास समिति, नागदा वर्ष 2026
अध्यक्ष: दिलीप कांठेड़ | मीडिया प्रभारी: नितिन बुडावनवाला
नागदा से जीवनलाल जैन की रिपोर्ट।
