मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने केशलोच कर दिया आत्मसंयम और त्याग का संदेश
मुरैना (मनोज जैन नायक) : नगर के बड़े जैन मंदिर में वर्षायोग कर रहे आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज के प्रभावक शिष्य मुनिश्री 108 उपशांत सागरजी महाराज ने मंगलवार को केशलोच कर त्याग, संयम और कठोर साधना का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। प्रातःकाल मंदिर परिसर में हुए इस आध्यात्मिक प्रसंग को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। इस दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा।
मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने स्वयं अपने हाथों से सिर, दाढ़ी और मूंछों के बालों का केशलोच किया। दिगंबर जैन परंपरा में केशलोच को साधु जीवन की महत्वपूर्ण साधनाओं में शामिल माना जाता है। मुनिराज नियमित अंतराल पर इस साधना के माध्यम से शरीर के प्रति मोह और सांसारिक सुख-सुविधाओं से विरक्ति का अभ्यास करते हैं।
जैन दर्शन के अनुसार केशलोच केवल बालों का त्याग नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सहनशीलता, तप और वैराग्य की भावना को मजबूत करने का माध्यम है। शारीरिक पीड़ा को समभाव से सहन करते हुए मुनिश्री ने साधना पूरी की।
इस अवसर पर मौजूद श्रद्धालुओं ने मुनिश्री की संयम साधना के दर्शन किए और इसे अपने जीवन के लिए प्रेरणादायी बताया। मुनिश्री की साधना ने यह संदेश दिया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मसंयम, त्याग और देह के प्रति मोह को कम कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना भी सच्ची धर्मसाधना का हिस्सा है।
मुनिश्री ने स्वयं हाथों से किया केशलोच
बड़े जैन मंदिर में मंगलवार सुबह दिगंबर जैन मुनियों की कठोर साधना और आत्मसंयम का प्रतीक केशलोच देखने को मिला। मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने स्वयं अपने हाथों से सिर, दाढ़ी और मूंछों के बालों का केशलोच किया।
दिगंबर जैन परंपरा में केशलोच एक महत्वपूर्ण साधना मानी जाती है। इसमें मुनिराज अपने बालों को किसी उपकरण से काटने के बजाय हाथों से उखाड़कर त्याग करते हैं। दिगंबर जैन साधु-संत और साध्वियां सामान्यतः दो से तीन माह के अंतराल में इस साधना को करते हैं।

देह के प्रति मोह त्यागने का प्रतीक
जैन दर्शन में केशलोच को केवल शरीर के बालों का त्याग नहीं माना जाता। यह देह के प्रति ममत्व, सुख-सुविधाओं और परिग्रह से विरक्ति का प्रतीक है।
मुनियों के लिए यह साधना आत्मसंयम, सहनशीलता और वैराग्य की भावना को मजबूत करने वाली मानी जाती है। केशलोच के दौरान होने वाली शारीरिक पीड़ा को समभाव से सहन करना भी इस साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने शांत और सहज भाव से इस साधना को पूरा किया। उनकी साधना ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संयम और आत्मनियंत्रण का संदेश दिया।
श्रद्धालुओं में दिखा भक्ति और श्रद्धा का भाव
केशलोच के दौरान बड़े जैन मंदिर परिसर में श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मुनिश्री की साधना के दर्शन किए और इसे अपने लिए प्रेरणादायी अवसर बताया।
श्रद्धालुओं ने मुनिश्री की कठिन साधना और संयम को नजदीक से देखा। इस दौरान मंदिर परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहा और लोगों ने मुनिराज के प्रति श्रद्धा व्यक्त की।
पूजा-पाठ से आगे आत्मसंयम का संदेश
मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज की यह साधना श्रावकों के लिए भी प्रेरणा का विषय रही। केशलोच के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि धर्म केवल पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है।
जैन दर्शन में आत्मा की ओर बढ़ने के लिए देह और सांसारिक सुख-सुविधाओं के प्रति मोह को कम करना महत्वपूर्ण माना गया है। संयम, त्याग, तप और वैराग्य के माध्यम से आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी जाती है।

त्याग और तप का जीवंत उदाहरण
मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज का केशलोच दिगंबर जैन साधना में त्याग, तप, संयम और वीतरागता की भावना का जीवंत उदाहरण रहा। इस साधना ने उपस्थित लोगों को यह संदेश दिया कि आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए धैर्य और आत्मसंयम का विशेष महत्व है।
मुरैना के बड़े जैन मंदिर में हुए इस धार्मिक प्रसंग ने श्रद्धालुओं को जैन मुनियों की कठोर साधना और जीवनशैली को समझने का अवसर दिया। मुनिश्री की साधना से मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर नजर आए और उन्होंने इसे आत्मचिंतन तथा आध्यात्मिक प्रेरणा का अवसर माना।
