बिना ढोल-नगाड़ों के हुआ मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी का चातुर्मासिक मंगल प्रवेश, 1700 श्रद्धालु बने साक्षी
मोहनखेड़ा तीर्थ में सादगी, संयम और संत परंपरा का अनूठा संदेश; देशभर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने लिया धर्मलाभ
(रिपोर्ट: जीवनलाल जैन, नागदा)
मोहनखेड़ा (धार/रतलाम क्षेत्र)। धार्मिक आयोजनों में अक्सर भव्य शोभायात्राएं, बैंड-बाजे, ढोल-नगाड़ों और आकर्षक सजावट का दृश्य देखने को मिलता है, लेकिन मोहनखेड़ा तीर्थ पर आयोजित मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी महाराज साहब के चातुर्मासिक मंगल प्रवेश ने इस परंपरा से अलग एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया। यहां आयोजित मंगल प्रवेश पूरी तरह संत मर्यादा, सादगी और आध्यात्मिक गरिमा के अनुरूप संपन्न हुआ, जिसने उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं के मन में गहरी धार्मिक भावना और संयम का संदेश स्थापित किया।
त्रिस्तुतिक जैन परंपरा के आचार्यदेव श्री हेमेंद्र सुरीश्वर जी महाराज साहब के अंतेवासी शिष्यरत्न एवं आचार्यदेव श्री ऋषभचंद्र सुरीश्वर जी महाराज साहब के समुदायवर्ती शासन प्रभावक, सिद्धितप प्रेरक एवं प्रखर प्रवचनकार मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी महाराज साहब, मुनिराज श्री जिनभद्र विजय जी महाराज साहब आदि ठाणा का चातुर्मासिक मंगल प्रवेश सोमवार को मोहनखेड़ा तीर्थ में अत्यंत सादगी के साथ सम्पन्न हुआ।
बिना किसी आडंबर के हुआ मंगल प्रवेश मंगल प्रवेश यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें किसी प्रकार का बाहरी प्रदर्शन नहीं किया गया। न कहीं ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई दी और न ही बैंड-बाजों का शोर। पूरी यात्रा संत परंपरा की मर्यादा के अनुरूप शांत, अनुशासित और आध्यात्मिक वातावरण में सम्पन्न हुई।
श्रद्धालुओं ने हाथ जोड़कर, विनम्रता और श्रद्धा के साथ पूज्य मुनिराज श्री का स्वागत किया। पूरे मार्ग में केवल धर्ममय जयघोष गूंजते रहे, जिनसे वातावरण भक्तिरस में सराबोर हो गया। श्रद्धालुओं द्वारा लगाए गए जयघोष—
- “मालवा-रतलाम के नंदन, कोटि-कोटि वंदन”
- “जब तक सूरज-चाँद रहेगा, गुरु राजेंद्र-हेमेंद्र का नाम रहेगा”
ने पूरे परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
यात्रा में किसी प्रकार की भव्यता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि विनम्रता, अनुशासन और संत परंपरा के प्रति समर्पण का भाव प्रमुख रूप से दिखाई दिया।
देशभर से पहुंचे लगभग 1700 श्रद्धालु
मंगल प्रवेश के इस ऐतिहासिक अवसर पर मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल सहित देश के अनेक राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मोहनखेड़ा तीर्थ पहुंचे। आयोजकों के अनुसार लगभग 1700 श्रावक-श्राविकाओं ने इस मंगल प्रवेश के साक्षी बनकर धर्मलाभ प्राप्त किया।
श्रद्धालु केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रहे, बल्कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में समाजजन मोहनखेड़ा पहुंचे। इससे यह स्पष्ट हुआ कि मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी महाराज साहब के प्रति देशभर के जैन समाज में गहरी श्रद्धा और आस्था है।
वरिष्ठ मुनिराजों ने की अगवानी
मंगल प्रवेश के दौरान वरिष्ठ संतों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी महाराज साहब की अगवानी वरिष्ठ मुनिराज पियूषचंद्र विजय जी महाराज साहब, दिव्यचंद्र विजय जी महाराज साहब तथा पुष्पेंद्र विजय जी महाराज साहब ने की।
इसके बाद आयोजित धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनिराज श्री पियूषचंद्र विजय जी महाराज साहब ने मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी को अपना गुरु भ्राता बताते हुए उनके मर्यादित, अनुशासित और आडंबररहित मंगल प्रवेश की मुक्त कंठ से सराहना की।
उन्होंने कहा कि संत जीवन का वास्तविक स्वरूप बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि संयम, साधना और सादगी में निहित है। इसी संदेश को मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी ने अपने मंगल प्रवेश के माध्यम से समाज के सामने प्रस्तुत किया।
संत परंपरा की मर्यादा का हुआ अनुकरण
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व 23 जुलाई को परम पूज्य आचार्य भगवंत हितेशचंद्र सुरिश्वर जी महाराज साहब आदि ठाणा का चातुर्मासिक मंगल प्रवेश भी पूर्णतः सादगी और संत मर्यादा के साथ सम्पन्न हुआ था।
उसी अनुकरणीय परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी महाराज साहब ने भी अपने मंगल प्रवेश को किसी प्रकार के बाहरी प्रदर्शन से दूर रखते हुए केवल आध्यात्मिक गरिमा और संत जीवन की मर्यादा के अनुरूप सम्पन्न कराया।
इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि धार्मिक आयोजनों की वास्तविक भव्यता बाहरी सजावट या शोर-शराबे में नहीं, बल्कि श्रद्धा, अनुशासन, विनम्रता और आत्मिक भावनाओं में निहित होती है।
प्रथम चातुर्मासिक प्रवचन में दिए महत्वपूर्ण धार्मिक संदेश
मंगल प्रवेश के उपरांत आयोजित अपने प्रथम चातुर्मासिक प्रवचन में मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी महाराज साहब ने श्रद्धालुओं को चातुर्मास के महत्व से अवगत कराया और धर्ममय जीवन जीने के लिए अनेक महत्वपूर्ण नियमों का पालन करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास आत्मशुद्धि, संयम और तप का विशेष काल होता है। इस अवधि में प्रत्येक श्रद्धालु को अपनी क्षमता के अनुसार धार्मिक नियम अवश्य धारण करने चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से आग्रह किया कि—
- नवकारसी पच्चखान के बिना जल का उपयोग न करें।
- कंदमूल एवं लिलोत्री सब्जियों का पूर्ण त्याग करें।
- रात्रि भोजन का त्याग करें।
- छोटे-से-छोटे धार्मिक नियमों का भी पूर्ण सावधानी और जयणा पूर्वक पालन करें।
- संयम, तप, स्वाध्याय और सेवा को जीवन का हिस्सा बनाएं।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि स्वयं को भीतर से बदलने और आत्मिक उन्नति का अवसर है।
संयम, समभाव और विनम्रता का दिया संदेश
अपने प्रवचन में मुनिराज श्री ने स्पष्ट कहा कि जीवन में वास्तविक सुख बाहरी भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि आत्मसंयम और समभाव में निहित है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे केवल धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने तक सीमित न रहें, बल्कि धर्म को अपने व्यवहार और जीवनशैली का हिस्सा बनाएं।
उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति छोटे-छोटे धार्मिक नियमों का भी निष्ठा के साथ पालन करे तो समाज में सद्भाव, करुणा और नैतिक मूल्यों की स्थापना स्वतः हो सकती है।
देशभर के अनेक श्रीसंघों की रही उल्लेखनीय उपस्थिति
मंगल प्रवेश समारोह में देशभर के अनेक प्रमुख श्रीसंघों से श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इनमें मध्यप्रदेश के रतलाम, जावरा, नागदा, खाचरौद, आलोट, महिदपुर, थांदला, बड़नगर, इंदौर, उज्जैन, टांडा, बाग और कुक्षी सहित अनेक नगरों के श्रद्धालु शामिल रहे।
इसके अलावा मुंबई, हैदराबाद, विजयवाड़ा, चेन्नई, गुंटूर और राजामुंद्री से भी बड़ी संख्या में समाजजन पहुंचे।
राजस्थान के भीनमाल, आहोर, गुड़ा, बालोतरा, सायला और नाकोड़ा सहित विभिन्न श्रीसंघों के श्रद्धालुओं ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने मोहनखेड़ा तीर्थ को राष्ट्रीय स्तर के आध्यात्मिक संगम का स्वरूप प्रदान किया।
मोहनखेड़ा तीर्थ बना आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र
चातुर्मासिक मंगल प्रवेश के अवसर पर पूरा मोहनखेड़ा तीर्थ भक्तिभाव, अनुशासन और धार्मिक उल्लास से सराबोर दिखाई दिया। संतों के सान्निध्य में हजारों श्रद्धालुओं ने धर्मसभा में भाग लेकर प्रवचनों का श्रवण किया तथा आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया।
पूरे आयोजन में कहीं भी दिखावा या आडंबर नहीं था। श्रद्धा, सेवा, अनुशासन और संत परंपरा के प्रति सम्मान ही आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता बनकर सामने आया।
संत परंपरा की सादगी बनी प्रेरणा
आज के दौर में जब धार्मिक आयोजनों में भव्यता और प्रदर्शन को अधिक महत्व दिया जाने लगा है, ऐसे समय में मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी महाराज साहब का चातुर्मासिक मंगल प्रवेश समाज के लिए एक प्रेरणादायी उदाहरण बनकर सामने आया है।
बिना ढोल-नगाड़ों, बिना किसी बाहरी आडंबर और पूर्ण संत मर्यादा के साथ सम्पन्न हुआ यह आयोजन यह संदेश देता है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप विनम्रता, संयम, सादगी और आत्मिक साधना में निहित है। मोहनखेड़ा तीर्थ में आयोजित यह मंगल प्रवेश आने वाले समय में संत परंपरा की गरिमा और अनुशासन का एक अनुकरणीय उदाहरण माना जाएगा।
