मुनि आदित्यसागरजी का संदेश इंदौर में श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा बना। छत्रपति नगर जिनालय में प्रवचन देते हुए मुनिश्री ने धर्म, स्वास्थ्य, संयम, सूर्योदय पूर्व जागरण और तनावमुक्त जीवन का महत्व बताया।
राजेश जैन दद्दू
इंदौर
मुनि आदित्यसागरजी का संदेश: पैसा कमाना जरूरी है लेकिन धर्म करना उससे भी ज्यादा जरूरी है
मुनि आदित्यसागरजी का संदेश
इंदौर। तीर्थ स्वरूप दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में तीन दिवसीय प्रवास पर पधारे श्रमण संस्कृति के महामहिम पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के कुल गौरव श्रुत संवेगी महाश्रमण आदित्य सागर जी महाराज ने आज अपनी मंगल देशना में धर्म, संयम, स्वास्थ्य और जीवन के वास्तविक उद्देश्य पर अत्यंत प्रेरणादायक विचार व्यक्त किए।मुनिश्री ने कहा कि आज का मनुष्य धन कमाने की धुन में 60 से 70 वर्ष तक लगा रहता है, लेकिन उसे यह समझना चाहिए कि पैसा कमाना जरूरी है लेकिन धर्म करना उससे भी ज्यादा जरूरी है।उन्होंने कहा कि जीवन केवल भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए नहीं मिला, बल्कि आत्मकल्याण और धर्म साधना के लिए भी मिला है। धर्म के बिना जीवन अधूरा है और केवल धन से कभी भी स्थायी सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता।
धर्म और जीवन पर विशेष प्रवचन
मुनि आदित्यसागरजी का संदेश श्रद्धालुओं के लिए गहरी प्रेरणा बन गया। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि जो व्यक्ति भोगों में आसक्ति कम करता है और समर्पण, विश्वास तथा श्रद्धा के साथ भगवान की भक्ति करता है, वह निरोगी रहकर लंबा और सार्थक जीवन जीता है।मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान समय में अधिकांश बीमारियों का कारण तनाव, चिंता और भोग-विलास की प्रवृत्ति है। मनुष्य जितना अधिक संग्रह और भोगों की ओर भागता है, उतना ही मानसिक रूप से अशांत होता जाता है।उन्होंने कहा कि धर्म व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है। धर्म के माध्यम से मनुष्य संयम, शांति और आत्मिक आनंद प्राप्त करता है।
निरोगी जीवन का सूत्र
मुनि आदित्यसागरजी का संदेश स्वास्थ्य को लेकर भी रहा विशेष
मुनिश्री ने निरोगी और सार्थक जीवन जीने के कई महत्वपूर्ण सूत्र बताए। उन्होंने कहा कि —
- जो व्यक्ति सूर्योदय से पूर्व उठता है
- सूर्यास्त से पूर्व भोजन ग्रहण करता है
- खानपान में भक्ष-अभक्ष का ध्यान रखता है
- भोजन के बाद सौ कदम चलता है
- वज्रासन में बैठता है
- व्यसन मुक्त जीवन जीता है
- तनाव से दूर रहता है
उसका जीवन वास्तव में सार्थक जीवन होता है।उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और जैन परंपरा में जीवन को व्यवस्थित और अनुशासित रखने के जो नियम बताए गए हैं, वे आज भी पूर्णतः वैज्ञानिक और स्वास्थ्यवर्धक हैं।
भोग-विलास और तनाव पर कही बड़ी बात
मुनि आदित्यसागरजी का संदेश केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी भी रहा। उन्होंने कहा कि भोग वृत्ति और संकलेषता रोग उत्पन्न करती है।आज का मनुष्य सुविधा और दिखावे के पीछे भाग रहा है, जिसके कारण उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। धर्म से दूरी और भौतिकता की अधिकता व्यक्ति को तनावग्रस्त बना रही है।मुनिश्री ने कहा कि यदि मनुष्य अपने जीवन में संयम, सदाचार और धर्म को स्थान दे तो वह मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रह सकता है।
छत्रपति नगर जिनालय में हुआ भव्य आयोजन
तीर्थ स्वरूप दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में आयोजित इस धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।प्रवचन के पूर्व मुनिश्री के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर डॉ. जैनेंद्र जैन ने प्रकाश डाला।धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस अवसर पर —
- मुनि श्री अप्रमित सागर जी
- मुनि श्री सहज सागर जी
- क्षुल्लक श्री श्रेयस सागर जी महाराज
भी उपस्थित थे।
कार्यक्रम की शुरुआत मंगलाचरण से हुई
प्रारंभ में मंगलाचरण श्रीमती सोनाली बगड़िया ने किया।आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के चित्र का अनावरण एवं चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन जिनालय ट्रस्ट अध्यक्ष भूपेंद्र जैन, संरक्षक प्रकाशचंद जैन, ट्रस्टी निलेश जैन, उज्ज्वल जैन एवं रमेशचंद्र जैन ने किया।
मुनिश्री का पाद प्रक्षालन
मुनि श्री का पाद प्रक्षालन —
- सुलभ
- आकांक्षा
- माही
- आरोही छाबड़ा
ने किया।
मुनि संघ को शास्त्र भेंट श्री शैलेंद्र, अभिषेक एवं अतिशय सोनी परिवार द्वारा किए गए।
समाजजनों ने लिया आशीर्वाद
मुनि श्री के समक्ष —
- श्री हंसमुख गांधी
- वीरेंद्र जैन देवरी
- आलोक जैन
- अतुल जैन
- अजय जैन रेनबो
- अरविंद
- अखिलेश सोधिया
आदि ने श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।धर्मसभा का संचालन ट्रस्ट के महामंत्री विपुल बांझल ने किया।
धर्ममय जीवन क्यों जरूरी
मुनि आदित्यसागरजी का संदेश आज के आधुनिक समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। तेजी से बदलती जीवनशैली, तनाव, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता के दौर में धर्म और संयम का महत्व और अधिक बढ़ गया है।धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की एक श्रेष्ठ पद्धति है। धर्म व्यक्ति को आत्मिक शांति, सकारात्मक सोच और मानसिक संतुलन प्रदान करता है।
निष्कर्ष
मुनि आदित्यसागरजी का संदेश श्रद्धालुओं के लिए जीवन को सही दिशा देने वाला रहा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि धन आवश्यक है, लेकिन धर्म उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।यदि मनुष्य धर्म, संयम, स्वास्थ्य और सदाचार को अपनाए तो उसका जीवन सुखी, शांत और सफल बन सकता है।
