MTH अस्पताल की पीजी छात्रा को प्रताड़ित करने के मामले में दो सीनियर छात्राएं निलंबित
एसजीआरसी की जांच रिपोर्ट के बाद डीन कार्यालय की कार्रवाई, 7 दिन तक अस्पताल के सभी कार्यों से रखा गया दूर
इंदौर। MTH अस्पताल की पीजी छात्रा डॉ. सिम्मी यादव को प्रताड़ित किए जाने के मामले में आखिरकार डीन कार्यालय की ओर से कार्रवाई हुई है। दो आरोपी सीनियर छात्राओं को 7 दिन के लिए अस्पताल से संबंधित सभी कार्यों से निलंबित कर दिया गया है। मामला सामने आने के बाद से मेडिकल कॉलेज परिसर में इसकी चर्चा थी और कार्रवाई को लेकर सवाल भी उठ रहे थे।
एसजीआरसी की रिपोर्ट के बाद हुआ निलंबन
यह कार्रवाई स्टूडेंट ग्रिवेंस रिड्रेसल कमेटी (एसजीआरसी) की जांच रिपोर्ट के आधार पर की गई है। रिपोर्ट के बाद स्त्री रोग विभाग की पीजी रेसिडेंट डॉ. निकिता गुरवानी और डॉ. श्वेता रघुवंशी को निलंबित किया गया है।
निलंबन की अवधि में दोनों को क्लीनिकल, अकादमिक और विभागीय जिम्मेदारियों से मुक्त रखा जाएगा। यानी इस दौरान वे न तो मरीजों से जुड़े कार्यों में शामिल होंगी, न पढ़ाई से जुड़ी गतिविधियों में और न ही विभाग की किसी अन्य जिम्मेदारी में। डीन कार्यालय से यह आदेश 6 अक्टूबर को जारी किया गया, जो तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है।
प्रताड़ना से टूट गई थी छात्रा
बताया गया है कि सीनियर छात्राओं की प्रताड़ना से परेशान होकर पीजी प्रथम वर्ष की छात्रा डॉ. सिम्मी यादव ने जान देने की कोशिश की थी। उनकी हालत बिगड़ने पर साथी चिकित्सक उन्हें एमवाय अस्पताल ले गए। वहां दो दिन तक आईसीयू में भर्ती रहने के बाद उन्हें छुट्टी दी गई।
इस घटना ने मेडिकल कॉलेजों में पीजी छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव और सीनियर-जूनियर के रिश्तों को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। चिकित्सा शिक्षा में लंबी ड्यूटी और कड़े कार्य-वातावरण के बीच जूनियर डॉक्टरों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं।
एनएमसी की एंटी रैगिंग कमेटी तक पहुंची शिकायत
प्रताड़ना की शिकायत नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) की एंटी रैगिंग कमेटी को भी की गई थी। शिकायत के बाद एमजीएम प्रशासन हरकत में आया और पूरे मामले की जांच बिठाई गई। उसी जांच के नतीजे के रूप में एसजीआरसी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके बाद डीन कार्यालय ने निलंबन का आदेश जारी किया।
कार्रवाई पर उठ सकते हैं सवाल
निलंबन की अवधि केवल 7 दिन की है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह कार्रवाई मामले की गंभीरता के अनुरूप है। रिपोर्ट में आगे और कार्रवाई की सिफारिश है या नहीं, इस बारे में फिलहाल कोई जानकारी सामने नहीं आई है। पीड़ित छात्रा और उनके साथियों की प्रतिक्रिया भी अभी उपलब्ध नहीं है।
एंटी रैगिंग नियमों के तहत शिक्षण संस्थानों से अपेक्षा की जाती है कि वे शिकायत मिलने पर निष्पक्ष जांच करें और छात्रों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराएं। ऐसे मामलों में पीड़ित की काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी उतनी ही जरूरी मानी जाती है।
आगे क्या
अब निगाहें इस पर रहेंगी कि निलंबन की अवधि पूरी होने के बाद प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है और क्या एनएमसी की एंटी रैगिंग कमेटी इस मामले में कोई अलग कार्रवाई करती है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन के लिए यह भी चुनौती है कि भविष्य में ऐसी शिकायतों का समय पर निपटारा हो, ताकि किसी छात्र को इतना बड़ा कदम उठाने की नौबत न आए।
