मध्यप्रदेश में TET परीक्षा को लेकर शिक्षक संगठनों का विरोध
मध्यप्रदेश में टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) को लेकर शिक्षकों में असंतोष और विरोध बढ़ गया है। शिक्षक संगठन यह मानते हैं कि पुराने नियुक्त शिक्षकों के लिए TET परीक्षा अनिवार्य करना अव्यवहारिक है। इससे न केवल उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा प्रभावित होगी, बल्कि आर्थिक और मानसिक रूप से भी उन्हें नुकसान हो सकता है।
मध्यप्रदेश अध्यापक-शिक्षक संयुक्त मोर्चा के अध्यक्ष हीरानंद नरवरिया के नेतृत्व में सभी शिक्षक 18 अप्रैल को भोपाल में मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा निकालेंगे। उनका मुख्य उद्देश्य यह है कि वर्तमान शिक्षकों को TET से पूरी तरह छूट दी जाए। इसके अलावा शिक्षक संगठन सरकार और सुप्रीम कोर्ट से यह भी मांग कर रहा है कि पुरानी नियुक्तियों को अब तक बनाए गए नियमों के तहत मान्यता दी जाए।
TET परीक्षा का इतिहास और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) का कानून वर्ष 2009 में बना और इसे 2011 में पूरी तरह लागू किया गया। हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2025 को अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट बनाम महाराष्ट्र के मामले में दिए गए फैसले को पूरे भारत में लागू कर दिया। इसके तहत सभी शिक्षकों के लिए TET परीक्षा अनिवार्य कर दी गई है।
हालांकि, शिक्षक संगठन का तर्क है कि 2009 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर यह नियम लागू नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि जब शिक्षक पहले से ही वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें परीक्षा देने के लिए मजबूर करना उनके लिए मानसिक और सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है।
DPI द्वारा अचानक आदेश और शिक्षकों की चिंता
2 मार्च 2026 को DPI भोपाल ने जिला शिक्षा अधिकारियों को आदेश जारी कर शिक्षकों की जानकारी मांगी। आदेश में जुलाई और अगस्त 2026 में परीक्षा प्रस्तावित की गई है। शिक्षकों का कहना है कि इस विषय में सरकार या शिक्षक संगठनों से कोई समुचित विचार-विमर्श नहीं किया गया।
शिक्षक संगठन ने बताया कि अचानक आदेश जारी करने से उन्हें तैयारी का पर्याप्त समय नहीं मिला है। कई शिक्षकों को अपनी वर्तमान जिम्मेदारियों के साथ परीक्षा की तैयारी करना कठिन होगा। इस स्थिति में वे मानसिक तनाव और पेशेवर असुरक्षा का सामना कर सकते हैं।
अन्य राज्यों का दृष्टिकोण और स्थगन
जम्मू-कश्मीर और उत्तर प्रदेश सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है, जिसके चलते वहां TET परीक्षा स्थगित है। शिक्षक संगठन का कहना है कि मध्यप्रदेश में भी पुराने शिक्षकों को इस नियम से छूट दी जानी चाहिए।
शिक्षक संगठन ने स्पष्ट किया कि मध्यप्रदेश में 1995 से लेकर विभिन्न समयों में नियुक्त शिक्षकों की नियुक्तियां सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार हुई हैं। इन शिक्षकों को अब TET देने के लिए बाध्य करना न केवल न्यायसंगत नहीं है, बल्कि उनके जीवन और परिवार के लिए गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर सकता है।
पुराने शिक्षकों के लिए TET देना अव्यवहारिक
25-30 वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षक कई वित्तीय और पारिवारिक जिम्मेदारियों में बंधे हैं। अधिकांश शिक्षक गृह ऋण, वाहन ऋण और पारिवारिक खर्चों में व्यस्त हैं। एक शिक्षक पर औसतन 5-6 सदस्यों का परिवार निर्भर है। यदि TET परीक्षा के कारण उनकी सेवा खतरे में आती है, तो उनके पूरे परिवार का जीवन संकट में पड़ सकता है।
शिक्षक संगठन ने बताया कि अधिकांश शिक्षक NPS (नई पेंशन योजना) के अंतर्गत हैं। अगर उन्हें सेवा से बर्खास्त किया गया, तो उन्हें अत्यंत न्यून पेंशन (1000–1200 रुपये) मिलेगी। इसके परिणामस्वरूप, शिक्षक और उनके परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो जाएंगे।
शिक्षकों द्वारा उठाए गए सवाल
शिक्षक संगठन ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं:
- 2018 में नई नियुक्ति नीति लागू हुई थी, तब TET अनिवार्य क्यों नहीं किया गया?
- 2011 से अब तक शिक्षकों को स्पष्ट निर्देश क्यों नहीं दिए गए?
- अन्य सरकारी सेवाओं जैसे IAS/IPS में चयन के बाद बार-बार परीक्षा क्यों नहीं ली जाती?
- क्यों वर्तमान नियम पुराने नियुक्त शिक्षकों को बिना किसी पूर्व सूचना और तैयारी के लागू किए जा रहे हैं?
इन सवालों से स्पष्ट होता है कि शिक्षक संगठन TET परीक्षा की वर्तमान नीति को असंगत और अव्यवहारिक मानता है।
मुख्य मांगें
मध्यप्रदेश अध्यापक-शिक्षक संयुक्त मोर्चा ने अपनी मांगें स्पष्ट रूप से रखीं हैं:
- वर्तमान शिक्षकों को TET परीक्षा से पूर्ण छूट दी जाए।
- प्रथम नियुक्ति तिथि से उनकी वरिष्ठता मान्य की जाए।
- पुरानी पेंशन योजना लागू की जाए।
- भारत सरकार द्वारा आवश्यक अध्यादेश लाया जाए।
- राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करे।
इन मांगों का उद्देश्य है कि पुराने नियुक्त शिक्षकों की सेवा और पेंशन सुरक्षित रहे और उन्हें मानसिक और वित्तीय रूप से सुरक्षा मिले।
सरकार और शिक्षक संगठनों के बीच संभावित समाधान
शिक्षक संगठन ने सरकार से आग्रह किया है कि वे शिक्षक संगठनों से चर्चा कर समुचित नीति बनाएं। इसके तहत पुराने शिक्षकों को TET परीक्षा से छूट, उनके वरिष्ठता अधिकारों की सुरक्षा और पुरानी पेंशन योजना का लाभ सुनिश्चित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षकों का अनुभव और सेवा अवधि शिक्षा व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुराने शिक्षकों की छंटनी या उनकी सेवा खतरे में डालना न केवल न्यायसंगत नहीं है, बल्कि शिक्षा प्रणाली के लिए भी हानिकारक है।
निष्कर्ष
मध्यप्रदेश में TET परीक्षा को लेकर चल रहा विरोध शिक्षकों की सेवा सुरक्षा, पेंशन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा है। 18 अप्रैल को भोपाल में आयोजित मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा इस मुद्दे को सरकार और आम जनता के ध्यान में लाएगी।
शिक्षक संगठन ने आश्वासन दिया है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखेंगे और पुरानी नियुक्तियों, पेंशन योजना और TET से छूट की दिशा में न्याय की लड़ाई जारी रखेंगे।
मध्यप्रदेश सरकार अब शिक्षक संगठनों और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के आधार पर TET नीति में आवश्यक सुधार और संशोधन करने पर विचार कर सकती है।
