MP छात्रसंघ चुनाव को लेकर कॉलेजों में हलचल, आदेश का इंतजार; छात्र संगठनों ने शुरू की तैयारियां
MP जबलपुर हाईकोर्ट के आदेश के बाद मध्य प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव का रास्ता साफ होने की उम्मीद बढ़ गई है। सितंबर में सरकारी और निजी कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव कराए जाने की संभावना है। हालांकि, प्रदेश सरकार की ओर से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को अभी तक औपचारिक निर्देश जारी नहीं किए गए हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा संस्थान शासन के आदेश का इंतजार कर रहे हैं।
यदि इस वर्ष छात्रसंघ चुनाव होते हैं, तो करीब 12 साल बाद एक बार फिर कॉलेज परिसरों में चुनावी माहौल देखने को मिलेगा। चुनाव की तारीख, प्रक्रिया, मतदान व्यवस्था और अन्य नियमों को लेकर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
12 साल बाद फिर दिख सकता है चुनावी माहौल
MP में आखिरी बार वर्ष 2016-17 में छात्रसंघ चुनाव हुए थे। इससे पहले छात्र राजनीति में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह की चुनावी व्यवस्थाएं लागू रही हैं।
वर्ष 1987 में पूर्ण प्रत्यक्ष प्रणाली के तहत छात्रसंघ चुनाव हुए थे। इसके अगले वर्ष यानी 1988 में हिंसा, तोड़फोड़ और विवाद की घटनाओं के बाद प्रत्यक्ष चुनावों पर रोक लगा दी गई थी। इसके बाद 1988 से 2003 तक अप्रत्यक्ष प्रणाली के माध्यम से छात्रसंघ पदाधिकारियों का चुनाव होता रहा। इसमें कक्षा प्रतिनिधियों के जरिए छात्रसंघ के पदाधिकारियों का चयन किया जाता था।
2016-17 में हुए थे आखिरी चुनाव
MP में लंबे अंतराल के बाद वर्ष 2016-17 में छात्रसंघ चुनाव कराए गए थे। इसके बाद दोबारा चुनाव नहीं हो सके। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद छात्र संगठनों में एक बार फिर सक्रियता बढ़ गई है।
कॉलेजों में नए विद्यार्थियों से संपर्क करने के साथ ही संगठन अपनी सदस्य संख्या बढ़ाने और संभावित प्रत्याशियों को तैयार करने में जुट गए हैं। चुनाव को लेकर औपचारिक घोषणा भले अभी नहीं हुई हो, लेकिन छात्र संगठनों ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं।
नए विद्यार्थियों पर छात्र संगठनों की नजर
शैक्षणिक सत्र 2026-27 में कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले नए विद्यार्थियों से छात्र संगठन लगातार संपर्क कर रहे हैं। संगठन नए छात्रों को अपने साथ जोड़ने के लिए सदस्यता अभियान चला रहे हैं।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने भी कॉलेज परिसरों में सदस्यता अभियान तेज करने की तैयारी शुरू कर दी है। संगठन की ओर से 13 अगस्त से कॉलेजों में कैंप लगाए जाएंगे। यह सदस्यता अभियान 30 अगस्त तक चलाने की योजना है।
वहीं, NSUI भी नए विद्यार्थियों के बीच पहुंच बढ़ाने और उन्हें संगठन से जोड़ने के लिए अभियान चला रहा है। दोनों प्रमुख छात्र संगठनों की बढ़ती गतिविधियों के कारण कॉलेज परिसरों में धीरे-धीरे चुनावी माहौल बनने लगा है।
चुनाव की तारीख और प्रक्रिया अभी स्पष्ट नहीं
MP छात्रसंघ चुनाव को लेकर सबसे बड़ी स्थिति यह है कि सरकार की ओर से अभी तक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को विस्तृत दिशा-निर्देश नहीं मिले हैं। चुनाव कब होंगे, नामांकन की प्रक्रिया क्या होगी, मतदान किस तरीके से कराया जाएगा और परिणाम की घोषणा कैसे होगी, इन मुद्दों पर संस्थानों को आधिकारिक आदेश का इंतजार है।
कॉलेज प्रशासन भी शासन के निर्देशों के आधार पर आगे की तैयारी करने की स्थिति में है। चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद ही परिसर स्तर पर औपचारिक गतिविधियां शुरू हो सकेंगी।
नए छात्र संगठन भी मैदान में उतर सकते हैं
इस बार छात्रसंघ चुनाव में मुकाबला पहले की तुलना में अधिक दिलचस्प होने की संभावना है। ABVP और NSUI जैसे पारंपरिक छात्र संगठनों के अलावा कुछ नए संगठन भी चुनावी मैदान में उतर सकते हैं।
करणी सेना और जयस की छात्र विंग से जुड़े कार्यकर्ता भी विद्यार्थियों के बीच अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। ऐसे में चुनाव होने पर कॉलेज परिसरों में बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है।
नए संगठनों के सक्रिय होने से छात्र राजनीति में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है। सभी संगठन विद्यार्थियों के मुद्दों और स्थानीय कॉलेज समस्याओं को आधार बनाकर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
इंदौर के कॉलेज रहे हैं छात्र राजनीति के केंद्र
इंदौर में छात्र राजनीति का पुराना इतिहास रहा है। जीएसीसी, क्रिश्चियन कॉलेज, गुजराती कॉलेज और होलकर साइंस कॉलेज लंबे समय से छात्र राजनीति के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
1970 और 1990 के दशक में इन कॉलेज परिसरों की राजनीति ने कई नेताओं को राजनीतिक मंच उपलब्ध कराया। छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाले कई नेताओं ने आगे चलकर सक्रिय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
छात्र राजनीति से निकले कई बड़े नेता
इंदौर के कॉलेजों से निकलकर कई छात्र नेताओं ने प्रदेश की राजनीति में अपनी पहचान बनाई। तुलसी सिलावट, सुरेश मिंडा, पंकज संघवी, सज्जन सिंह वर्मा, विक्रम वर्मा, अश्विनी जोशी, महेंद्र हार्डिया, गोपीकृष्ण नेमा, विपिन वानखेड़े, गौरव रणदिवे और जीतू पटवारी जैसे नेताओं ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआती पारी छात्र राजनीति से शुरू की थी।
इस वजह से छात्रसंघ चुनावों को केवल कॉलेज स्तर का चुनाव नहीं माना जाता। छात्र राजनीति को भविष्य की सक्रिय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में भी देखा जाता रहा है।
कॉलेज परिसरों में बढ़ने लगी राजनीतिक गतिविधियां
फिलहाल छात्रसंघ चुनाव की आधिकारिक तारीख का इंतजार है, लेकिन छात्र संगठनों की गतिविधियों से कॉलेज परिसरों में हलचल बढ़ने लगी है। सदस्यता अभियान, नए विद्यार्थियों से संपर्क और संगठन विस्तार पर जोर दिया जा रहा है।
यदि सितंबर में चुनाव कराए जाते हैं, तो आने वाले दिनों में छात्र संगठनों की सक्रियता और बढ़ सकती है। संभावित प्रत्याशी भी विद्यार्थियों के बीच अपनी पहचान बनाने और समर्थन जुटाने में लग सकते हैं।
आदेश के बाद तस्वीर होगी साफ
विश्वविद्यालय और कॉलेज प्रशासन फिलहाल शासन के औपचारिक आदेश का इंतजार कर रहा है। चुनाव की तारीख और प्रक्रिया को लेकर निर्देश मिलने के बाद ही तैयारियों को अंतिम रूप दिया जाएगा।
दूसरी ओर, छात्र संगठनों ने चुनाव की संभावनाओं को देखते हुए अपनी तैयारी शुरू कर दी है। करीब 12 साल बाद यदि कॉलेज परिसरों में प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव होते हैं, तो इससे प्रदेश की छात्र राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हो सकती है। इंदौर जैसे छात्र राजनीति के पुराने केंद्र में इस बार मुकाबला और भी रोचक होने की संभावना है।
