MP Promotion Reservation Case: प्रमोशन में आरक्षण मामले में हाईकोर्ट सख्त, सरकार को कर्मचारियों के साथ डेटा साझा करने का आदेश
MP में सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन में आरक्षण से जुड़े मामले में मंगलवार को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। एक्टिंग चीफ जस्टिस द्वारा गठित विशेष पीठ के सामने राज्य सरकार ने अपना जवाब प्रस्तुत किया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से कर्मचारियों के प्रमोशन से संबंधित क्वांटिफाएबल डेटा (मात्रात्मक आंकड़े) याचिकाकर्ताओं के साथ साझा करने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को पूरा डेटा उपलब्ध नहीं कराया जाएगा, तो वे उस पर अपनी आपत्ति और कानूनी पक्ष कैसे रख पाएंगे। न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने सरकार को सभी जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
सरकार ने दिया आंकड़ों के आधार पर प्रमोशन का तर्क
सुनवाई के दौरान मध्यप्रदेश सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए कहा गया कि प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण पिछड़ेपन और विभागों में प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़ों के आधार पर दिया जा रहा है। सरकार का कहना था कि प्रमोशन प्रक्रिया के लिए जरूरी अध्ययन और सर्वे के आधार पर निर्णय लिया गया है।
सरकार की ओर से प्रस्तुत जवाब पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मामले के सभी पहलुओं पर विचार किया और पाया कि संबंधित डेटा याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने डेटा साझा करने का दिया आदेश
MP हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस विनय सराफ और जस्टिस विवेक अग्रवाल शामिल हैं, ने आदेश दिया कि सरकार द्वारा तैयार किए गए अध्ययन और सर्वे से जुड़े सभी आंकड़े याचिकाकर्ताओं और अन्य संबंधित पक्षों के साथ साझा किए जाएं।
कोर्ट ने कहा कि यह डेटा कोई गोपनीय सरकारी जानकारी नहीं है, बल्कि प्रमोशन में आरक्षण के फैसले के आधार से जुड़ा महत्वपूर्ण रिकॉर्ड है। इसलिए इसे संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराना जरूरी है ताकि वे अपनी आपत्तियां और तर्क उचित तरीके से प्रस्तुत कर सकें।
सीलबंद लिफाफे में पेश किया गया था डेटा
सुनवाई के दौरान मध्यप्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि पहले के निर्देश के अनुसार सरकार ने डेटा सीलबंद लिफाफे में हाईकोर्ट के सामने प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा कि यह डेटा प्रतिवादियों के साथ साझा नहीं किया गया था।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट आदेश मौजूद नहीं है, जिसमें डेटा साझा करने से रोक लगाई गई हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल मौखिक आश्वासन के आधार पर डेटा को रोका नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी दस्तावेज को गोपनीय घोषित करने का कोई विशेष आदेश नहीं है, तब तक संबंधित पक्षों को उसे देखने का अधिकार है।
सरकार ने आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं किया
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुराने आदेशों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने बताया कि 16 अक्टूबर 2025 को राज्य सरकार को प्रमोशन में आरक्षण के लिए किए गए अध्ययन और सर्वे का पूरा डेटा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।
इसके बाद 28 अक्टूबर को सरकार ने कुछ आंकड़े सीलबंद लिफाफे में पेश किए थे और कहा था कि बाकी दस्तावेज बाद में जमा किए जाएंगे। हालांकि, बाद में शेष दस्तावेज रिकॉर्ड में पेश नहीं किए गए।
इस स्थिति पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार ने उसके निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया है। कोर्ट ने अब सरकार को सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
‘पूरा डेटा नहीं मिलेगा तो आपत्ति कैसे दर्ज होगी’
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को पूरा डेटा उपलब्ध नहीं कराया जाएगा तो वे उस पर अपनी आपत्तियां कैसे दर्ज करेंगे। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत हर पक्ष को संबंधित रिकॉर्ड देखने और अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि रूल-5 के तहत तैयार किए गए सभी अध्ययन और सर्वे रिपोर्ट से संबंधित डेटा अगले दिन तक प्रतिवादियों को उपलब्ध कराया जाए। साथ ही इसकी जानकारी कोर्ट को भी दी जाए।
17 जुलाई तक दर्ज करानी होंगी आपत्तियां
हाईकोर्ट ने डेटा मिलने के बाद याचिकाकर्ताओं और अन्य प्रतिवादियों को अपनी आपत्तियां दर्ज कराने के लिए समय भी दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि संबंधित पक्ष 17 जुलाई तक अपनी आपत्तियां प्रस्तुत कर सकते हैं।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि इस मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने के लिए रोजाना सुनवाई करने पर भी विचार किया जा रहा है।
अगली सुनवाई 21 जुलाई को
हालांकि, कुछ न्यायिक व्यस्तताओं और अधिवक्ताओं की उपलब्धता को देखते हुए मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे निर्धारित की गई है।
जस्टिस विनय सराफ की अन्य मामलों में व्यस्तता और सामान्य वर्ग की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए सुनवाई की अगली तारीख तय की गई।
कर्मचारियों की नजर हाईकोर्ट के फैसले पर
MP में प्रमोशन में आरक्षण का मामला लंबे समय से विवाद का विषय बना हुआ है। हजारों सरकारी कर्मचारी इस मामले से जुड़े हुए हैं और सभी की नजर हाईकोर्ट की सुनवाई पर है।
हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले डेटा और उस पर आने वाली आपत्तियों के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय होगी। आने वाली सुनवाई में यह साफ होगा कि प्रमोशन में आरक्षण को लेकर राज्य सरकार के फैसले पर कोर्ट क्या रुख अपनाता है।
