MP में दूध की कीमतों पर बड़ा सवाल: ग्वालियर में महंगा, भोपाल-इंदौर में सस्ता क्यों?
MP में दूध की कीमतों को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। MP के कई बड़े शहरों में जहां उपभोक्ताओं को दूध 68 रुपये प्रति लीटर की दर से मिल रहा है, वहीं ग्वालियर-चंबल अंचल में यही दूध 70 रुपये प्रति लीटर में बेचा जा रहा है। हाल ही में ग्वालियर दुग्ध संघ द्वारा सांची दूध की कीमत में दो रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी किए जाने के बाद यह मुद्दा और भी गंभीर हो गया है। अब ग्वालियर-चंबल अंचल के उपभोक्ताओं को सांची दूध के लिए पहले के मुकाबले अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। इस फैसले के बाद उपभोक्ताओं के बीच नाराजगी बढ़ती जा रही है और लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब प्रदेश के अन्य शहरों में दूध सस्ता मिल रहा है, तो ग्वालियर-चंबल के लोगों से ज्यादा पैसे क्यों वसूले जा रहे हैं।
MP के शहरों में अलग-अलग कीमतें, सवालों के घेरे में नीति
जानकारी के मुताबिक, MP की राजधानी भोपाल, आर्थिक राजधानी इंदौर, धार्मिक नगरी उज्जैन और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में सांची दूध की कीमत अब भी 68 रुपये प्रति लीटर बनी हुई है। वहीं, ग्वालियर और पूरे चंबल अंचल में यही दूध 70 रुपये प्रति लीटर में उपलब्ध है। यह स्थिति सिर्फ सांची दूध तक ही सीमित नहीं है। अमूल, मदर डेयरी, पारस और डिलाइट इंडिया जैसी नामी-गिरामी निजी डेयरी कंपनियां भी MP के अधिकांश शहरों में दूध 68 रुपये प्रति लीटर की दर से बेच रही हैं, लेकिन ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में आते ही उनकी कीमतें बढ़ जाती हैं। उपभोक्ताओं का आरोप है कि यह साफ तौर पर क्षेत्रीय भेदभाव है।
दुग्ध संघ का तर्क, लेकिन उपभोक्ता असंतुष्ट
MP के ग्वालियर दुग्ध संघ के प्रबंधन का कहना है कि सांची दूध की कीमत बढ़ाने का फैसला बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। संघ के अनुसार, सांची दूध अन्य निजी कंपनियों के मुकाबले सस्ता था, जिससे बाजार में यह संदेश जा रहा था कि कम कीमत का मतलब कम गुणवत्ता है। दुग्ध संघ का तर्क है कि निजी कंपनियां ग्राहकों को यह कहकर गुमराह कर रही थीं कि सांची दूध सस्ता है, इसलिए उसकी गुणवत्ता भी कम होगी। इसी वजह से बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के निर्देश पर सांची दूध की कीमतें बढ़ाकर अन्य कंपनियों के बराबर की गई हैं। हालांकि, यह तर्क उपभोक्ताओं को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पा रहा है। लोगों का कहना है कि कीमतें बढ़ाने की बजाय गुणवत्ता और भरोसे को मजबूत किया जाना चाहिए था। उपभोक्ताओं के अनुसार, दूध की गुणवत्ता कीमत से नहीं, बल्कि ब्रांड की विश्वसनीयता और उत्पादन प्रक्रिया से तय होती है।
सबसे ज्यादा दूध उत्पादन, फिर भी सबसे महंगा
इस पूरे विवाद में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि MP में सबसे अधिक दूध उत्पादन ग्वालियर-चंबल अंचल में ही होता है। इस क्षेत्र के किसान बड़ी मात्रा में दूध का उत्पादन करते हैं, जो न केवल MP के अन्य हिस्सों में, बल्कि बाहर के राज्यों तक भी सप्लाई किया जाता है। इसके बावजूद, स्थानीय किसानों से दूध कम कीमत पर खरीदा जा रहा है और उसी दूध को स्थानीय उपभोक्ताओं को महंगे दामों पर बेचा जा रहा है। आम लोगों का कहना है कि जहां उत्पादन अधिक होता है, वहां दूध सस्ता मिलना चाहिए, लेकिन ग्वालियर-चंबल में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है।
किसानों और उपभोक्ताओं दोनों में असंतोष
एक तरफ जहां किसान लंबे समय से दूध के बेहतर दाम की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को महंगे दामों पर दूध खरीदना पड़ रहा है। इससे साफ है कि कीमतों का असली बोझ आम जनता पर ही डाला जा रहा है। किसानों का कहना है कि उन्हें दूध का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है, जबकि कंपनियां उसी दूध को शहरों में महंगे दामों पर बेचकर मुनाफा कमा रही हैं। इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
दिल्ली-एनसीआर जैसी कीमतें, लेकिन सुविधाएं नहीं
जानकारों का कहना है कि MP ग्वालियर-चंबल अंचल में दूध की कीमतें लगभग दिल्ली-एनसीआर के बराबर तय कर दी गई हैं, जबकि यहां की आर्थिक स्थिति, प्रति व्यक्ति आय और जीवन-यापन की लागत एनसीआर से काफी कम है। ऐसे में स्थानीय लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
नीति और निगरानी की जरूरत
कुल मिलाकर,MP के ग्वालियर-चंबल अंचल के लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या बड़ी डेयरी कंपनियां और दुग्ध संघ सिर्फ मुनाफे के लिए क्षेत्रीय असमानता को बढ़ावा दे रहे हैं, या फिर यह प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है। विशेषज्ञों का मानना है कि दूध जैसी आवश्यक वस्तु की कीमतों में एकरूपता और पारदर्शिता जरूरी है। अगर समय रहते इस मुद्दे पर ठोस नीति और सख्त निगरानी नहीं की गई, तो उपभोक्ताओं की नाराजगी और बढ़ सकती है।
