MP High Court: अनुकंपा नियुक्ति विरासत में मिलने वाला अधिकार नहीं, ग्वालियर खंडपीठ का अहम फैसला
ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति विरासत में मिलने वाला अधिकार नहीं है। यह नियुक्ति संबंधित सरकारी विभाग की नीति, निर्धारित पात्रता और नियमों के अनुसार ही दी जा सकती है। न्यायालय ने उत्तराधिकार न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें मृत पुलिस कर्मचारी की मां या बहन को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार दिए जाने की बात कही गई थी।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अमित सेठ ने की। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तराधिकार या प्रोबेट संबंधी कार्यवाही के माध्यम से किसी व्यक्ति को सरकारी नौकरी पाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। अनुकंपा नियुक्ति का दावा संबंधित विभाग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला मृत पुलिस कर्मचारी हरिशंकर की वसीयत और उसके आधार पर शुरू हुई न्यायिक कार्यवाही से जुड़ा है। हरिशंकर ने 9 जुलाई 2007 को वसीयत तैयार की थी। उनकी मृत्यु के बाद उनकी मां और बहन ने वसीयत के आधार पर प्रोबेट प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था।
इस कार्यवाही के दौरान संबंधित पक्षों के बीच समझौता हुआ। इसी समझौते के आधार पर उत्तराधिकार न्यायालय ने 23 अप्रैल 2010 को आदेश पारित किया। आदेश में संपत्ति से जुड़े मामलों के साथ मृत कर्मचारी की मां या बहन को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार दिए जाने की बात भी शामिल थी।
बाद में राज्य सरकार ने आदेश के उस हिस्से को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार निर्धारित किया गया था। राज्य की ओर से उठाए गए इस मामले पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने नियुक्ति से संबंधित आदेश की वैधता पर फैसला सुनाया।
अनुकंपा नियुक्ति विरासत या संपत्ति नहीं: हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति को संपत्ति की तरह विरासत में प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह न तो उत्तराधिकार में मिलने वाला अधिकार है और न ही ऐसा ऋण या प्रतिभूति, जिसके संबंध में प्रोबेट या उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किया जा सके।
न्यायालय के अनुसार, अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य निर्धारित सरकारी नीति के तहत पात्र व्यक्ति को राहत प्रदान करना है। इसलिए किसी उत्तराधिकार न्यायालय के आदेश या पारिवारिक समझौते के आधार पर नियुक्ति का अधिकार तय नहीं किया जा सकता।
इस मामले में उत्तराधिकार न्यायालय ने अपने आदेश के माध्यम से मृत कर्मचारी की मां या बहन को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार दिया था। हाई कोर्ट ने इस हिस्से को कानून के अनुरूप नहीं माना और इसे निरस्त कर दिया।
सरकारी नीति के तहत दावा करने का विकल्प बरकरार
हालांकि, हाई कोर्ट ने मृत कर्मचारी की मां और बहन के लिए संबंधित विभाग में दावा प्रस्तुत करने का विकल्प समाप्त नहीं किया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वे लागू सरकारी नीति के अनुसार सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपना दावा पेश कर सकती हैं।
इसका अर्थ है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्रता का निर्धारण संबंधित विभाग के नियमों और निर्धारित शर्तों के आधार पर किया जाएगा। केवल वसीयत, पारिवारिक समझौते या उत्तराधिकार न्यायालय के आदेश के आधार पर नियुक्ति का अधिकार प्राप्त नहीं किया जा सकता।
सरकारी नियुक्तियों के लिए महत्वपूर्ण स्पष्टता
ग्वालियर खंडपीठ का यह फैसला अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया की सीमा को स्पष्ट करता है। न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े विवादों का निपटारा करने वाली कार्यवाही के माध्यम से सरकारी नौकरी का अधिकार निर्धारित नहीं किया जा सकता।
अनुकंपा नियुक्ति के इच्छुक आवेदकों को संबंधित विभाग की नीति, पात्रता और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। इस मामले में हाई कोर्ट ने उत्तराधिकार न्यायालय के आदेश का संबंधित हिस्सा निरस्त करते हुए स्पष्ट कर दिया कि नियुक्ति का दावा सक्षम सरकारी प्राधिकारी के समक्ष लागू नियमों के अनुसार ही किया जा सकता है।
