MP Governor Appointment Case: राज्यपाल नियुक्ति मामले में हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला
मध्य प्रदेश में नए राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर दायर जनहित याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने अपनी सुनवाई पूरी कर ली है। मंगलवार को हुई इस महत्वपूर्ण सुनवाई के बाद अदालत ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जो आने वाले दिनों में सुनाए जाने की संभावना है। यह मामला संवैधानिक व्यवस्था और राज्यपाल पद की अनिवार्यता से जुड़ा हुआ है, जिसे लेकर कानूनी हलकों में भी खासी दिलचस्पी बनी हुई है।
डिवीजन बेंच ने सुनी दोनों पक्षों की दलीलें
इस मामले की सुनवाई जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच के समक्ष हुई। मंगलवार को कोर्ट ने याचिकाकर्ता और प्रतिवादी दोनों पक्षों की दलीलें ध्यानपूर्वक सुनीं। लंबी सुनवाई के बाद बेंच ने अपना निर्णय सुरक्षित रखने का फैसला किया, जिसका मतलब है कि अदालत अब सभी तथ्यों और कानूनी बिंदुओं पर विचार करने के बाद अपना फैसला सुनाएगी। कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह मामला संविधान के महत्वपूर्ण प्रावधानों की व्याख्या से जुड़ा होने के कारण अदालत ने इसे गंभीरता से लिया है।
राज्यपाल मंगुभाई पटेल का कार्यकाल जुलाई में हुआ पूरा
इस पूरे विवाद की जड़ में मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल का कार्यकाल समाप्त होना है। मंगुभाई पटेल का पांच साल का तय कार्यकाल जुलाई 2026 में पूरा हो चुका है। संविधान के अनुसार, किसी भी राज्य के राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। कार्यकाल पूरा होने के बावजूद मध्य प्रदेश में अब तक नए राज्यपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है, जिसे लेकर सवाल उठने लगे थे। इसी मुद्दे को आधार बनाकर जबलपुर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई, जिसमें राज्य में संवैधानिक पद की रिक्तता को लेकर चिंता जताई गई।
कौन हैं याचिकाकर्ता और क्या है उनकी मांग
यह जनहित याचिका जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. एबी खान की ओर से दाखिल की गई है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 153 का हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार प्रत्येक राज्य में राज्यपाल का पद होना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चूंकि राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित है और मंगुभाई पटेल का यह कार्यकाल पहले ही पूरा हो चुका है, इसलिए राज्य में जल्द से जल्द नए राज्यपाल की नियुक्ति होनी चाहिए, ताकि संवैधानिक व्यवस्था में किसी तरह की बाधा न आए।
अधिवक्ताओं ने कोर्ट में रखा पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में अधिवक्ता अजय रायजादा और अभिमन्यु सिंह ने पक्ष रखा। उन्होंने अपनी दलीलों में कहा कि राज्यपाल का निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी नई नियुक्ति में हो रही देरी संवैधानिक दृष्टि से गंभीर विषय है। उनका तर्क था कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था को निर्बाध रूप से बनाए रखने के लिए या तो शीघ्र नई नियुक्ति की जाए या फिर कोई वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, जिससे संवैधानिक शून्यता की स्थिति उत्पन्न न हो। अधिवक्ताओं ने अदालत से आग्रह किया कि इस मामले में जल्द से जल्द उचित दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
केंद्र सरकार का पक्ष: अनुच्छेद 156 का हवाला
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से भी अदालत में पक्ष रखा गया। इस दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल और डिप्टी सॉलिसिटर जनरल अदालत में मौजूद रहे। केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों ने अदालत को अवगत कराया कि संविधान के अनुच्छेद 156 के तहत यह प्रावधान है कि नए राज्यपाल की नियुक्ति होने तक वर्तमान राज्यपाल अपने पद पर बने रह सकते हैं। इस दलील के जरिए केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि भले ही मंगुभाई पटेल का तय कार्यकाल समाप्त हो चुका हो, लेकिन इससे राज्य में कोई संवैधानिक संकट या शून्यता की स्थिति उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि मौजूदा राज्यपाल नई नियुक्ति तक कार्यवाहक के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकते हैं।
किन-किन को बनाया गया है पक्षकार
इस याचिका में मामले से जुड़े महत्वपूर्ण पक्षों को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका में राष्ट्रपति सचिवालय, केंद्रीय विधि मंत्रालय और मध्य प्रदेश राज्यपाल सचिवालय को पक्षकार के रूप में शामिल किया गया है। याचिकाकर्ता की मांग है कि इन सभी संबंधित संस्थाओं के माध्यम से राज्यपाल नियुक्ति की प्रक्रिया को शीघ्र पूरा किया जाए, ताकि प्रदेश में संवैधानिक पद लंबे समय तक रिक्त न रहे।
अब आगे क्या होगा
दोनों पक्षों — याचिकाकर्ता और केंद्र सरकार — की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अदालत इस संवैधानिक सवाल पर क्या रुख अपनाती है। अगर अदालत याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमत होती है, तो केंद्र सरकार पर मध्य प्रदेश में जल्द नए राज्यपाल की नियुक्ति का दबाव बढ़ सकता है। वहीं, अगर अदालत केंद्र सरकार के अनुच्छेद 156 वाले तर्क को स्वीकार करती है, तो मौजूदा व्यवस्था यथावत बनी रह सकती है।
क्यों अहम है यह मामला
यह मामला सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर देश के अन्य राज्यों में भी राज्यपाल नियुक्ति से जुड़ी प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है। संविधान के अनुच्छेद 153 और 156 की व्याख्या को लेकर अदालत का यह फैसला एक नजीर के तौर पर देखा जा सकता है, खासकर उन मामलों में जहां राज्यपाल का तय कार्यकाल पूरा होने के बाद भी नई नियुक्ति में विलंब होता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला संवैधानिक पदों की समयबद्ध नियुक्ति को लेकर भविष्य में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।
फिलहाल पूरे प्रदेश में इस मामले पर अदालत के फैसले का इंतजार किया जा रहा है, और यह देखना दिलचस्प होगा कि हाईकोर्ट इस संवैधानिक प्रश्न पर आने वाले दिनों में क्या दिशा-निर्देश जारी करता है।
