MP High Court: खाते में ठगी की रकम आना ही अपराध में संलिप्तता का प्रमाण नहीं, 78 वर्षीय पूर्व IFS अधिकारी को अग्रिम जमानत
26.11 लाख रुपये की कथित बीमा ठगी से जुड़ा मामला; हाई कोर्ट ने उम्र, पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होने और बैंकिंग-इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की प्रकृति को ध्यान में रखकर दी राहत
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ठगी से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के बैंक खाते में कथित रूप से ठगी से प्राप्त रकम जमा हो जाना मात्र इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं है कि खाताधारक अपराध में जानबूझकर शामिल था। कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों पर विचार करते हुए 78 वर्षीय सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी एवं पूर्व सैनिक को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।
मामला कर्नाटक निवासी गोविंदप्पा जयरामैया बनाम मध्य प्रदेश राज्य से संबंधित है। न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की अदालत ने अग्रिम जमानत की अर्जी पर सुनवाई करते हुए आरोपी की उम्र, सेवा पृष्ठभूमि, पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होने और मामले में मुख्य रूप से बैंकिंग एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य होने जैसे पहलुओं पर विचार किया।
बीमा की रकम दिलाने के नाम पर 26.11 लाख की ठगी का आरोप
अभियोजन के अनुसार शिकायतकर्ता को बीमा से संबंधित रकम दिलाने का झांसा दिया गया था। इसी दौरान अलग-अलग लेनदेन के माध्यम से शिकायतकर्ता से करीब 26 लाख 11 हजार रुपये की कथित ठगी की गई।
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने विभिन्न बैंक खातों में हुए लेनदेन की जानकारी जुटाई। जांच में सामने आया कि 6 जुलाई से 26 दिसंबर 2023 के बीच शिकायतकर्ता के बैंक खाते से आरोपी के बैंक खाते में कुल 15 लाख 15 हजार रुपये ट्रांसफर किए गए थे।
पुलिस ने आरोपी के खाते में आई इस राशि को प्रथमदृष्टया कथित अपराध से प्राप्त रकम माना। इसके आधार पर आरोपी की भूमिका को लेकर जांच आगे बढ़ाई गई।
खाते में आए थे 15.15 लाख रुपये
जांच एजेंसी के लिए इस मामले में एक महत्वपूर्ण आधार आरोपी के बैंक खाते में पहुंचे 15.15 लाख रुपये थे। अभियोजन ने इस बैंकिंग ट्रांजैक्शन को मामले से जोड़ते हुए आरोपी की कथित भूमिका की जांच की।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने कोर्ट के सामने तर्क दिया कि केवल बैंक खाते में राशि पहुंचने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि खाताधारक ने जानबूझकर ठगी की साजिश में हिस्सा लिया था। आरोपी की ओर से बैंक खाते के इस्तेमाल को लेकर अलग परिस्थितियां बताई गईं।
बचाव पक्ष ने बताया कैसे साझा हुई बैंक खाते की जानकारी
आरोपी की ओर से हाई कोर्ट में बताया गया कि वह स्वयं एक अज्ञात व्यक्ति के झांसे में आ गया था। उस व्यक्ति ने उसे बीमा की रकम दिलाने का भरोसा दिया था। इसी विश्वास में उसने अपने बैंक खाते और डेबिट कार्ड से संबंधित जानकारी साझा कर दी थी।
बचाव पक्ष का दावा था कि इसके बाद आरोपी के खाते में कब रकम आई और उससे आगे किस प्रकार लेनदेन किया गया, इसकी उसे जानकारी नहीं थी। आरोपी ने अपने खाते में संदिग्ध रकम पहुंचने के पीछे यही स्पष्टीकरण अदालत के समक्ष रखा।
कोर्ट ने अग्रिम जमानत पर विचार करते समय इस स्पष्टीकरण को भी रिकॉर्ड पर उपलब्ध परिस्थितियों के साथ देखा।
सिर्फ खाते में रकम आना जानबूझकर संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि किसी बैंक खाते में कथित ठगी की रकम जमा होने का तथ्य अपने आप में खाताधारक की अपराध में जानबूझकर संलिप्तता स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
अदालत ने पाया कि आरोपी ने उसके बैंक खाते में रकम जमा होने के संबंध में अपना स्पष्टीकरण दिया है। ऐसे में आरोपी की भूमिका का निर्धारण जांच में उपलब्ध बैंकिंग रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन और अन्य साक्ष्यों के आधार पर किया जा सकता है।
कोर्ट की यह टिप्पणी इस मामले की विशिष्ट परिस्थितियों और अग्रिम जमानत पर विचार के संदर्भ में सामने आई है।
बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड मामले के प्रमुख साक्ष्य
हाई कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि मामले में प्रमुख साक्ष्य बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन से संबंधित हैं। इनकी जांच दस्तावेजों, बैंक रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों के माध्यम से की जा सकती है।
ऐसी स्थिति में आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करना क्यों अनिवार्य है, इसका ठोस आधार अदालत के सामने नहीं आया। कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर माना कि मामले से संबंधित महत्वपूर्ण वित्तीय लेनदेन का रिकॉर्ड दस्तावेजी रूप में मौजूद है और उसकी जांच की जा सकती है।
78 साल की उम्र और सेवा पृष्ठभूमि पर भी कोर्ट ने किया विचार
अग्रिम जमानत पर फैसला करते समय हाई कोर्ट ने आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों पर भी गौर किया। आरोपी की उम्र करीब 78 वर्ष है। वह सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी होने के साथ पूर्व सैनिक भी है।
इसके अलावा अदालत के समक्ष ऐसा कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं बताया गया, जिससे यह संकेत मिले कि आरोपी पहले भी इस तरह के किसी अपराध में शामिल रहा हो।
इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए हाई कोर्ट ने माना कि अग्रिम जमानत दिए जाने का आधार बनता है।
हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता का ठोस आधार नहीं मिला
अदालत के सामने अहम सवाल यह भी था कि जांच के लिए आरोपी की हिरासत आवश्यक है या नहीं। उपलब्ध तथ्यों और मामले में मौजूद दस्तावेजी तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को देखते हुए कोर्ट को हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता का कोई ठोस आधार नजर नहीं आया।
अदालत ने बैंक खाते में पैसे पहुंचने, आरोपी द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण, बैंकिंग रिकॉर्ड की उपलब्धता और आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अग्रिम जमानत की अर्जी मंजूर कर ली।
हाई कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत
सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 78 वर्षीय सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी एवं पूर्व सैनिक को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।
यह आदेश इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी खाते में संदिग्ध या कथित ठगी की रकम पहुंचना अपने आप में खाताधारक की जानबूझकर आपराधिक संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। आरोपी की वास्तविक भूमिका तय करने के लिए परिस्थितियों, उसकी जानकारी और मंशा के साथ उपलब्ध बैंकिंग एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का समग्र परीक्षण आवश्यक है।
हालांकि, यह राहत अग्रिम जमानत के स्तर पर मामले में उपलब्ध तथ्यों और आरोपी की विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर दी गई है। मामले में अंतिम रूप से आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।
