MP हाई कोर्ट का अहम फैसला: 15 साल की नौकरी का दावा फिर भी नहीं मिला स्थाई कर्मी का दर्जा, सीधी कॉलेज के 11 कर्मचारियों का आदेश निरस्त
हाई कोर्ट ने कहा—केवल लंबे समय तक काम करने से स्थाई कर्मचारी बनने का अधिकार नहीं, निर्धारित कट-ऑफ तिथि से निरंतर सेवा के दस्तावेजी प्रमाण जरूरी
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सीधी जिले के संजय गांधी स्मृति शासकीय महाविद्यालय में कार्यरत 11 कर्मचारियों के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट की युगलपीठ ने कर्मचारियों को स्थाई कर्मी का दर्जा देने संबंधी एकलपीठ के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी संस्थान में लंबे समय तक काम करने मात्र से कर्मचारी को स्वतः स्थाई कर्मी का दर्जा पाने का अधिकार नहीं मिल जाता। इसके लिए संबंधित सरकारी नीति में निर्धारित सभी शर्तों को पूरा करना और तय कट-ऑफ तिथि से लगातार सेवा का विश्वसनीय दस्तावेजी प्रमाण देना आवश्यक है।
मामले की सुनवाई प्रशासनिक न्यायाधीश आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा की युगलपीठ ने की। राज्य शासन की ओर से एकलपीठ के आदेश के खिलाफ रिट अपील प्रस्तुत की गई थी। युगलपीठ ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड और पक्षों के तर्कों पर विचार करने के बाद राज्य शासन की अपील स्वीकार कर ली।
11 कर्मचारियों ने किया था 15 साल से अधिक सेवा का दावा
मामला सीधी स्थित संजय गांधी स्मृति शासकीय महाविद्यालय के 11 कर्मचारियों से संबंधित है। कर्मचारियों का दावा था कि वे महाविद्यालय में 15 वर्ष से अधिक समय से सेवाएं दे रहे हैं। इसी आधार पर उन्होंने स्थाई कर्मी का दर्जा दिए जाने की मांग की थी।
कर्मचारियों ने अपनी मांग के समर्थन में मध्य प्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन विभाग की 7 अक्टूबर 2016 की नीति का हवाला दिया था। उनका कहना था कि लंबे समय से सेवा में होने के कारण वे इस नीति के तहत स्थाई कर्मी का दर्जा प्राप्त करने के पात्र हैं।
इस मामले में पहले हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने कर्मचारियों के पक्ष में आदेश पारित किया था। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग की ओर से उक्त आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट की युगलपीठ के समक्ष रिट अपील दायर की गई।
हाई कोर्ट ने मांगा निरंतर सेवा का ठोस प्रमाण
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कर्मचारियों की सेवा अवधि से संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण किया। अदालत के सामने प्रमुख प्रश्न यह था कि क्या संबंधित कर्मचारी सरकारी नीति के अनुसार निर्धारित तिथि से लगातार कार्यरत होने का पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत कर सके हैं।
युगलपीठ ने पाया कि कर्मचारियों की ओर से 16 मई 2007 से निरंतर सेवा किए जाने का ठोस दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका। रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार अक्टूबर 2010 के बाद के लेबर चार्ज बिल सामने आए थे।
अदालत ने माना कि केवल यह दावा कर देना कि कोई कर्मचारी लंबे समय से कार्यरत है, संबंधित नीति का लाभ प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। सेवा की निरंतरता का प्रमाण विश्वसनीय दस्तावेजों के माध्यम से स्थापित किया जाना जरूरी है।
कट-ऑफ तिथि से लगातार सेवा साबित करना जरूरी
हाई कोर्ट की युगलपीठ ने अपने फैसले में सरकारी नीति के तहत मिलने वाले लाभ और उसकी पात्रता को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को नीति का लाभ तभी मिल सकता है, जब वह उसमें निर्धारित पात्रता की सभी शर्तें पूरी करता हो।
यदि नीति में किसी विशेष कट-ऑफ तिथि से लगातार सेवा में बने रहने की शर्त निर्धारित है, तो कर्मचारी को उस तिथि से अपनी सेवा की निरंतरता साबित करनी होगी। इसके लिए केवल मौखिक दावा या लंबे समय तक कार्य करने का उल्लेख पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि संबंधित कर्मचारियों को निर्धारित कट-ऑफ तिथि से लगातार कार्यरत रहने के विश्वसनीय दस्तावेज पेश करने की आवश्यकता थी।
जनभागीदारी समिति की नियुक्ति पर भी कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
इस मामले में हाई कोर्ट ने महाविद्यालयों की जनभागीदारी समितियों के माध्यम से नियुक्त या सेवा में लिए जाने वाले कर्मचारियों की स्थिति को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की।
अदालत ने कहा कि केवल जनभागीदारी समिति द्वारा किसी व्यक्ति को काम पर रख लिए जाने से वह राज्य सरकार का नियमित कर्मचारी नहीं बन जाता। जनभागीदारी समिति को राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना नियमित सरकारी पद सृजित करने या सरकारी नियुक्ति करने का अधिकार नहीं है।
ऐसे में समिति द्वारा किसी व्यक्ति की सेवाएं लिए जाने को सीधे राज्य सरकार की नियमित नियुक्ति के समान नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी उन मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिनमें जनभागीदारी समिति के माध्यम से लंबे समय से कार्यरत कर्मचारी नियमित या स्थाई दर्जे की मांग करते हैं।
सिंगल बेंच का आदेश हुआ निरस्त
इस मामले में कर्मचारियों को पहले सिंगल बेंच से राहत मिली थी। एकलपीठ ने उनके पक्ष में आदेश दिया था, लेकिन उच्च शिक्षा विभाग ने इस निर्णय को चुनौती दी।
राज्य शासन की रिट अपील पर सुनवाई करते हुए युगलपीठ ने कर्मचारियों की सेवा से संबंधित रिकॉर्ड और सरकारी नीति की शर्तों का परीक्षण किया। इसके बाद एकलपीठ के उस आदेश को निरस्त कर दिया गया, जिसमें 11 कर्मचारियों को स्थाई कर्मी का दर्जा देने की राहत दी गई थी।
केवल लंबी नौकरी स्थाई दर्जे का आधार नहीं
हाई कोर्ट के इस फैसले का प्रमुख बिंदु कर्मचारियों की सेवा अवधि और उसके दस्तावेजी प्रमाण से जुड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी द्वारा 10, 15 या उससे अधिक वर्षों तक काम करने का दावा अपने आप में स्थाई कर्मी का दर्जा हासिल करने का पर्याप्त आधार नहीं बनता।
कर्मचारी को यह भी साबित करना होगा कि उसकी नियुक्ति और सेवा संबंधित नियमों तथा सरकारी नीति के अनुरूप रही है। यदि नीति में कट-ऑफ तिथि निर्धारित की गई है तो उस तारीख से लगातार सेवा का प्रमाण भी देना होगा।
सरकारी नीति की सभी शर्तें पूरी करना आवश्यक
हाई कोर्ट के निर्णय से यह भी स्पष्ट हुआ कि सरकारी नीति के तहत मिलने वाले लाभ का दावा केवल सेवा की अवधि के आधार पर नहीं किया जा सकता। संबंधित कर्मचारी को नीति में तय प्रत्येक आवश्यक पात्रता और शर्त को पूरा करना होगा।
सीधी के संजय गांधी स्मृति शासकीय महाविद्यालय के इन 11 कर्मचारियों के मामले में अदालत को निर्धारित अवधि से लगातार सेवा के पर्याप्त दस्तावेज नहीं मिले। इसी आधार पर युगलपीठ ने राज्य शासन की रिट अपील स्वीकार करते हुए एकलपीठ का पूर्व आदेश निरस्त कर दिया।
यह फैसला अस्थाई, दैनिक वेतनभोगी अथवा जनभागीदारी समिति के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों से जुड़े मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। हाई कोर्ट ने अपने निर्णय के जरिए यह स्पष्ट किया है कि स्थाई कर्मी का दर्जा प्राप्त करने के लिए लंबी सेवा के साथ-साथ सरकारी नीति के अनुरूप पात्रता और निरंतर सेवा के ठोस दस्तावेजी प्रमाण भी आवश्यक हैं।
