MP में बढ़ता मानव–वन्यजीव संघर्ष: बाघों के हमलों से 5 वर्षों में 380 मौतें, 2026 में भी जारी संकट
वन्यजीव हमलों में बढ़ोतरी बनी गंभीर चिंता
भोपाल। MP में बाघों और अन्य वन्यजीवों के बढ़ते हमले गंभीर चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। सरकार और वन विभाग द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद मानव–वन्यजीव संघर्ष की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं देखा गया है। राज्य के टाइगर रिजर्व क्षेत्रों सहित कई जिलों में लगातार हो रही घटनाओं ने ग्रामीण और वन क्षेत्रों में दहशत का माहौल बना दिया है।
आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में प्रदेश में बाघों के हमलों में 380 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं वर्ष 2026 के पहले पांच महीनों में ही कान्हा, बांधवगढ़, पेंच और अन्य टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में बाघ और तेंदुओं के हमलों से 21 लोगों की जान जा चुकी है।
जल संकट और भीषण गर्मी से बढ़ रहा टकराव
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस वर्ष अत्यधिक गर्मी और जल संकट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। पूर्व मुख्य वन्यप्राणी अभिरक्षक जेएस चौहान के मुताबिक, जंगलों और आसपास के क्षेत्रों में कई प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं, जिसके कारण बाघ और अन्य वन्यजीव पानी की तलाश में जंगल से बाहर ग्रामीण इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं।
उन्होंने बताया कि बाघों को पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। जब जंगलों में जल उपलब्धता कम हो जाती है, तो वे अपनी निर्धारित टेरिटरी छोड़कर अन्य क्षेत्रों में चले जाते हैं, जिससे न केवल उनके बीच आपसी संघर्ष बढ़ता है बल्कि मानव बस्तियों के साथ टकराव की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं।
गांवों के पास पहुंच रहे वन्यजीव
जंगलों में पानी की कमी के कारण वन्यजीव अब लगातार गांवों और खेतों के आसपास दिखाई दे रहे हैं। इससे ग्रामीणों में भय का माहौल बन गया है। कई स्थानों पर बाघों और तेंदुओं के देखे जाने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे दैनिक जीवन और कृषि कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति अस्थायी नहीं बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन का परिणाम है, जो समय पर सही उपाय न किए जाने के कारण और गंभीर रूप ले रही है।
कृत्रिम जल स्रोतों की कमी बनी बड़ी समस्या
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में पर्याप्त कृत्रिम जल स्रोत विकसित नहीं किए जा सके हैं। यदि समय रहते जल प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था की जाती, तो वन्यजीवों को पानी की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों की ओर नहीं जाना पड़ता।
विशेषज्ञों के अनुसार, जल संरक्षण और वन्य क्षेत्रों में छोटे-छोटे जलाशयों का निर्माण इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता था, लेकिन इस दिशा में प्रयास अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाए।
आपसी संघर्ष भी बढ़ा रहा खतरा
बाघों के बीच आपसी टेरिटरी संघर्ष भी इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। जल संकट के कारण जब बाघ अपनी निर्धारित सीमा छोड़कर अन्य क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं, तो वहां पहले से मौजूद बाघों से उनका संघर्ष होता है। यह आक्रामक व्यवहार कई बार इंसानों के लिए भी खतरनाक साबित हो रहा है।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बदलते मौसम और घटते प्राकृतिक संसाधनों के कारण वन्यजीवों का व्यवहार भी प्रभावित हो रहा है।
पुनर्वास योजनाएं धीमी, गांव अब भी संरक्षित क्षेत्रों में
मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए संरक्षित क्षेत्रों के भीतर बसे गांवों के पुनर्वास की योजना भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है। पिछले पांच वर्षों में केवल 32 गांवों का ही पुनर्वास किया गया है, जबकि अभी भी कई गांव टाइगर रिजर्व और संरक्षित वन क्षेत्रों के भीतर बसे हुए हैं।
इन गांवों की उपस्थिति भी संघर्ष की घटनाओं का एक बड़ा कारण मानी जा रही है, क्योंकि मानव गतिविधियां वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में हस्तक्षेप करती हैं।
पिछले वर्षों में लगातार बढ़ती घटनाएं
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 में अकेले बाघों के हमलों में 71 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद वन विभाग ने सुरक्षा और जागरूकता से जुड़े दिशा-निर्देश जारी किए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में बड़ा सुधार नहीं देखा गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दिशा-निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए ठोस संरचनात्मक और पर्यावरणीय सुधार जरूरी हैं।
राज्य आपदा घोषित करने की दिशा में कदम
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मानव–वन्यजीव संघर्ष को राज्य आपदा घोषित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही है। इसके साथ ही राज्य स्तरीय टास्क फोर्स और वन मुख्यालय में कमांड एंड कंट्रोल रूम स्थापित करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई है।
सरकार का मानना है कि इन कदमों से वन्यजीवों की बेहतर निगरानी संभव होगी और संघर्ष की घटनाओं पर तेजी से नियंत्रण पाया जा सकेगा।
विशेषज्ञों की राय: दीर्घकालिक समाधान जरूरी
पर्यावरण और वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या का समाधान केवल तात्कालिक उपायों से नहीं होगा। इसके लिए दीर्घकालिक जल प्रबंधन, वन क्षेत्र संरक्षण, मानव बस्तियों का पुनर्वास और तकनीकी निगरानी प्रणाली की आवश्यकता है।
उनका मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में मानव–वन्यजीव संघर्ष और अधिक गंभीर रूप ले सकता है।
निष्कर्ष: संतुलन की चुनौती
मध्य प्रदेश में बढ़ता मानव–वन्यजीव संघर्ष यह संकेत देता है कि विकास, पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है। जहां एक ओर वन्यजीव संरक्षण के प्रयास जारी हैं, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों की कमी और मानव हस्तक्षेप इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सरकार, वन विभाग और स्थानीय समुदायों को मिलकर समन्वित और प्रभावी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है, ताकि मानव जीवन और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
