MP: 2 करोड़ की MD ड्रग्स मामला – आरोपियों को कोर्ट ने बरी किया
भोपाल/इंदौर: MP में एक साल पहले पुलिस द्वारा 2 करोड़ रुपये मूल्य की कथित एमडी ड्रग्स के साथ दो आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने का मामला अब अदालत में पूरी तरह स्पष्ट हो गया है। हाल ही में कोर्ट ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया है। जांच में यह बात सामने आई कि जिसे पुलिस ने ड्रग्स कहा था, वह वास्तव में यूरिया निकला। यह मामला मध्यप्रदेश की न्यायिक प्रणाली और पुलिस की जांच प्रक्रियाओं की सटीकता पर कई सवाल खड़े करता है।
एक साल पहले गिरफ्तार किए गए आरोपी
Indore के तेजाजी नगर थाना क्षेत्र में एक साल पहले पुलिस ने दो आरोपियों को कथित रूप से 2 करोड़ की MD ड्रग्स के साथ पकड़ा था। आरोपियों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए थे, लेकिन उनके साथ जुड़े पुलिसकर्मियों और स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, उन्हें एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सबस्टेंस) एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था।
गिरफ्तारी के समय पुलिस ने आरोपियों की पूछताछ की और उनके सहयोगी पुलिसकर्मियों को भी आरोपी बनाया गया। इस प्रक्रिया में आरक्षक लखन गुप्ता और एक अन्य पुलिसकर्मी को भी आरोपी के तौर पर नामजद किया गया। गिरफ्तारी के समय, सभी आरोपियों को जेल भेज दिया गया और वे लगभग 11 महीने जेल में रहे, जबकि आरक्षक लखन गुप्ता को केवल 15 दिन जेल में रहना पड़ा।
फोरेंसिक जांच में ड्रग्स नहीं, यूरिया निकला
पुलिस ने जब्त MD ड्रग्स को भोपाल स्थित सेंट्रल फोरेंसिक लैब में जांच के लिए भेजा। जांच रिपोर्ट के अनुसार, जो पदार्थ पुलिस ने ड्रग्स कहा था, वह संपूर्ण रूप से यूरिया निकला। इसके बाद आरोपियों के वकीलों ने इस जांच पर आपत्ति जताई और पुलिस को हैदराबाद की सेन्ट्रल लैब से जांच करवाने के लिए मजबूर किया गया।
हैदराबाद की लैब द्वारा जांच किए जाने पर भी यही निष्कर्ष सामने आया कि जब्त किया गया पदार्थ ड्रग्स नहीं बल्कि यूरिया था। इसके बाद अदालत ने आरोपियों को पूरी तरह बरी कर दिया।
पुलिस कार्रवाई में गंभीर चूक
इस पूरे मामले में यह बात सामने आई कि जब आरोपियों को पकड़ा गया था, तब पुलिस टीम टेस्टिंग किट से लैस नहीं थी। डीसीपी कृष्ण लालचंदानी ने बताया कि गिरफ्तारी के समय पुलिसकर्मियों ने ड्रग्स की पहचान केवल खुशबू और स्वाद के आधार पर की थी। इस प्रकार की जांच पूरी तरह असंगत और गलत मानी जा सकती है।
डीसीपी ने यह भी स्वीकार किया कि कई बार ड्रग्स तस्कर अपने खरीदारों से धोखाधड़ी करते हैं और ड्रग्स की जगह यूरिया या अन्य पदार्थ सप्लाई करते हैं। इस मामले में भी इसी तरह की स्थिति उत्पन्न हुई थी। जब जांच में एमडी ड्रग्स के स्थान पर पोटेशियम नाइट्रेट और यूरिया पाया गया, तो पुलिस ने अदालत में प्रतिवेदन पेश कर आरोपियों की बरी की सिफारिश की।
वकीलों का आरोप: डीसीपी पर दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई
अधिवक्ताओं ने तत्कालीन डीसीपी आईपीएस विनोद मीणा पर आरोप लगाया कि उन्होंने दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया। उनका कहना था कि गिरफ्तारी और मामले को पंजीबद्ध करना पूरी तरह से बिना उचित जांच और टेस्टिंग के किया गया।
वकीलों ने कोर्ट में यह भी बताया कि गिरफ्तारी के समय कोई वैध वैज्ञानिक परीक्षण नहीं किया गया था, जिससे आरोपियों के खिलाफ मामला झूठा साबित हुआ। अदालत ने वकीलों की दलीलों को मान्यता दी और आरोपियों को पूरी तरह बरी कर दिया।
आरोपियों की बरी और न्याय प्रणाली
कोर्ट के फैसले के बाद, एक साल तक जेल में रहने वाले दोनों आरोपियों को राहत मिली। उनके परिवार और वकील अब इस फैसले को न्याय की जीत के रूप में देख रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस प्रमाण नहीं था और पकड़े गए पदार्थ की जांच में भी ड्रग्स का कोई सुराग नहीं मिला।
यह मामला पुलिस की जांच प्रक्रिया और फोरेंसिक जांच के महत्व को उजागर करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बिना प्रमाण और वैज्ञानिक परीक्षण के किसी को भी जेल भेजना गंभीर अन्याय का मामला बन सकता है।
डीसीपी का स्पष्टीकरण
इस पूरे घटनाक्रम के बाद वर्तमान डीसीपी कृष्ण लालचंदानी ने मीडिया को बताया कि गिरफ्तारी के समय पुलिस ने सख्त कार्रवाई की थी। उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिसकर्मियों के पास टेस्टिंग किट नहीं थी, जिसके कारण उन्होंने सिर्फ खुशबू और स्वाद के आधार पर कार्रवाई की।
डीसीपी ने यह भी बताया कि अब पुलिस ने मामलों में जांच प्रक्रिया को और अधिक वैज्ञानिक और प्रमाणिक बनाने के लिए कदम उठाए हैं। आने वाले समय में ऐसे मामलों में फोरेंसिक लैब जांच को अनिवार्य किया जाएगा।
निष्कर्ष
यह मामला MP में MD ड्रग्स से जुड़े झूठे आरोपों का एक गंभीर उदाहरण है। इसमें पुलिस की जांच प्रक्रिया, टेस्टिंग की कमी और अधिकारी की संभावित गलत कार्रवाई सामने आई। अदालत ने दोषियों को बरी कर दिया, जिससे यह साबित होता है कि न्याय प्रणाली ने समय रहते सही फैसला दिया।
इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि ड्रग्स तस्करी और धोखाधड़ी के मामले में नागरिकों को सावधान रहना चाहिए। वहीं, पुलिस और फोरेंसिक विभाग को भी सही उपकरण और वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग करना आवश्यक है।
यह घटना मध्यप्रदेश में कानून और न्याय के महत्व को उजागर करती है और यह संदेश देती है कि सच्चाई और प्रमाणिक जांच के बिना किसी पर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।
