सम्यग्दर्शन आत्मा की दिशा बदलने वाला तत्व, धर्म आराधना से मोक्षमार्ग प्रशस्त: आचार्य उदारसागर
मुरैना के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा, आचार्य उदारसागर और मुनि उपशांतसागर ने श्रद्धालुओं को धर्म, संयम और आत्मचिंतन का संदेश दिया
मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने सम्यग्दर्शन को आत्मा की दिशा बदलने वाला महत्वपूर्ण तत्व बताया। उन्होंने कहा कि संसार में रहते हुए प्रत्येक जीव को निरंतर धर्म की आराधना करते रहना चाहिए। धर्म आराधना में सम्यग्दर्शन की भूमिका मूलभूत है और शील, दान, तप तथा पूजा जैसे धार्मिक कार्य सम्यक्त्वपूर्वक किए जाने पर मोक्षमार्ग में सहायक बनते हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए निरंतर पुरुषार्थ करना चाहिए। उनके अनुसार सम्यग्दर्शन से आत्मा की दिशा संसार से हटकर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होती है।
सम्यग्दर्शन के लिए निरंतर पुरुषार्थ जरूरी
आचार्य उदारसागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में सम्यग्दर्शन प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास करना चाहिए। उन्होंने धर्म, संयम और आत्मचिंतन को जीवन में अपनाने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन आत्मा को संसार के दुखों से निकालकर मोक्ष की दिशा में ले जाने वाला महत्वपूर्ण कारण है। व्यक्ति को अपने विचारों, भावों और कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए तथा धार्मिक आचरण को सही दृष्टि और भावना के साथ अपनाना चाहिए।
आयु कर्म और राजा श्रेणिक का प्रसंग
धर्मसभा में आचार्यश्री ने आयु कर्म के संबंध में राजा श्रेणिक का प्रसंग सुनाया। उन्होंने जीवों को मुख्य रूप से बद्धायुष्क और अबद्धायुष्क दो प्रकार का बताते हुए कर्म बंध की सूक्ष्म प्रक्रिया को समझाया।
आचार्यश्री ने बताया कि राजा श्रेणिक द्वारा यशोधर मुनि के गले में सर्प डालने की घटना के संदर्भ में उनके द्वारा आयु कर्म का बंध किया गया था। बाद में पश्चाताप होने पर उनकी कर्म स्थिति में परिवर्तन का प्रसंग बताया गया।
उन्होंने इस कथा के माध्यम से श्रद्धालुओं को समझाया कि क्रोध, अहंकार और प्रमाद में किए गए कार्यों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। व्यक्ति को प्रत्येक कार्य और उसके पीछे के भाव के प्रति सावधान रहना चाहिए। पश्चाताप और आत्मचिंतन को भी उन्होंने आत्मशुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
गणेश प्रसाद वर्णी का प्रसंग सुनाया
आचार्यश्री ने गणेश प्रसाद वर्णी जी से जुड़ा प्रसंग भी धर्मसभा में सुनाया। उन्होंने बताया कि एक अवसर पर वर्णी जी चूलगिरी में दर्शन के लिए गए थे। वहां धर्मशाला में भोजन बना रहे एक पंडित के बर्तनों का स्पर्श हो जाने पर पंडित नाराज हो गए।
इस प्रसंग के माध्यम से आचार्यश्री ने बाहरी शुद्धता के साथ भावों की शुद्धता के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि क्रोध और कषाय की स्थिति में व्यक्ति जाने-अनजाने ऐसे कर्मों का बंध कर सकता है, जिनका परिणाम भविष्य में भोगना पड़ सकता है।
आचार्यश्री ने आयु कर्म के बंध और उससे जुड़े सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को जीवन के प्रत्येक क्षण में सजग रहना चाहिए। धर्म, संयम, सम्यग्दर्शन और आत्मचिंतन के माध्यम से भावों को निर्मल बनाने का प्रयास निरंतर जारी रहना चाहिए।

श्रद्धा के साथ पुरुषार्थ भी जरूरी: मुनि उपशांतसागर
धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य मुनि श्री 108 उपशांतसागर महाराज ने कहा कि जीवन में सफलता के लिए जिनेन्द्र भगवान के प्रति दृढ़ श्रद्धा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भगवान और साधु-संतों के प्रति सच्ची श्रद्धा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकती है।
मुनिश्री ने कहा कि श्रद्धा केवल मंदिर में दर्शन करने तक सीमित नहीं है। भगवान की वीतराग वाणी और साधु-संतों के प्रति विश्वास को जीवन में धारण करना ही सच्ची श्रद्धा का स्वरूप है। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रद्धा के साथ पुरुषार्थ और धर्माचरण भी आवश्यक है।
उन्होंने साधु-संतों के प्रति श्रद्धा से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि आस्था व्यक्ति के जीवन में पुण्य का निमित्त बन सकती है। दृढ़ विश्वास व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के साथ आत्मविश्वास भी प्रदान करता है।
धर्माचरण और आत्मचिंतन का संदेश
धर्मसभा में संतों के प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को जिनेन्द्र भगवान के प्रति दृढ़ श्रद्धा रखने, साधु-संतों का सम्मान करने, सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करने और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश दिया गया।
संतों ने धर्माचरण, संयम और भावों की शुद्धता को जीवन में अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने प्रत्येक कर्म और विचार के प्रति सजग रहना चाहिए। धर्मसभा का मुख्य संदेश यही रहा कि बाहरी धार्मिक क्रियाओं के साथ सही दृष्टि, श्रद्धा, संयम और निर्मल भाव भी आवश्यक हैं।
