RSS प्रमुख मोहन भागवत का बयान: “हिंदू समाज में एकता की कमी थी, इसी कारण हुई संघ की स्थापना”
तेलंगाना दौरे पर मोहन भागवत का बड़ा संबोधन
RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के सरसंघचालक मोहन भागवत हाल ही में तेलंगाना के निजामाबाद पहुंचे, जहां उन्होंने संघ की स्थापना, हिंदू समाज की स्थिति और उसके उद्देश्य को लेकर महत्वपूर्ण बातें कहीं। इस दौरान उन्होंने संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों और दृष्टिकोण को विस्तार से समझाया।
हेडगेवार का उद्देश्य: समाज को एकजुट करना
मोहन भागवत ने कहा कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना हिंदू समाज को एकजुट करने के उद्देश्य से की थी। उनका मानना था कि समाज में एकता की कमी बार-बार देश की गुलामी और कमजोरी का कारण बनी। हेडगेवार का विचार था कि यदि समाज संगठित और मजबूत होगा, तो किसी भी बाहरी चुनौती का प्रभाव कम किया जा सकेगा।
उन्होंने बताया कि संघ की स्थापना किसी के खिलाफ नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य समाज को संगठित और जागरूक बनाना था। यह प्रयास किसी विरोध या टकराव के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और आत्मबल बढ़ाने के लिए शुरू किया गया था।
हिंदू समाज में विविधता के बीच एकता की कमी पर जोर
RSS संघ प्रमुख ने कहा कि हिंदू समाज में अलग-अलग विचार, परंपराएं और आस्थाएं मौजूद हैं, और इन सभी का सम्मान किया जाता है। लेकिन इसके बावजूद समाज में एकता की कमी एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है। उन्होंने कहा कि विविधता को स्वीकार करना हिंदुत्व की विशेषता है, लेकिन इसी विविधता के बीच सामंजस्य और संगठन की आवश्यकता भी है।
मोहन भागवत के अनुसार, समाज में मौजूद यह आंतरिक कमजोरी लंबे समय तक बाहरी दबावों का कारण बनती रही है। इसलिए आवश्यक है कि समाज अपने भीतर की एकता को मजबूत करे।
हिंदुत्व का अर्थ: सह-अस्तित्व और सम्मान
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने हिंदुत्व की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि इसका अर्थ केवल एक विचारधारा नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान है। हिंदुत्व का मतलब है कि हर व्यक्ति अपने मार्ग पर चलते हुए दूसरों की परंपराओं और मान्यताओं का सम्मान करे।
उन्होंने कहा कि संघ की प्रार्थना और शाखाओं की गतिविधियाँ इसी भावना को आगे बढ़ाने का कार्य करती हैं, जहां अनुशासन, सेवा और राष्ट्र निर्माण की भावना विकसित की जाती है।
RSS संघ का कार्य स्वयंसेवकों की मेहनत पर आधारित
मोहन भागवत ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा कार्य स्वयंसेवकों की निःस्वार्थ मेहनत पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन का संचालन किसी बाहरी कृपा या समर्थन पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह स्वयंसेवकों के समर्पण और अनुशासन से चलता है।
उन्होंने यह भी कहा कि संघ के काम में कभी भी किसी प्रकार की बाधा केवल बाहरी कारणों से नहीं आई, बल्कि संगठन की आंतरिक मजबूती और कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता के कारण यह निरंतर आगे बढ़ता रहा है।
RSS संघ स्थापना के पीछे ऐतिहासिक कारण
मोहन भागवत ने बताया कि जब देश ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब केवल राजनीतिक या सशस्त्र विरोध पर्याप्त नहीं माना गया। हेडगेवार ने महसूस किया कि असली समस्या समाज की आंतरिक कमजोरी और बिखराव में भी है।
उनका मानना था कि यदि समाज अंदर से मजबूत नहीं होगा, तो बाहरी चुनौतियों से लड़ना कठिन होगा। इसलिए संघ की स्थापना का उद्देश्य समाज को संगठित करना, आत्मविश्वास बढ़ाना और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करना था।
समाज में एकता की आवश्यकता पर जोर
RSS संघ प्रमुख ने कहा कि आज भी समाज में एकता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। उन्होंने यह संकेत दिया कि केवल बाहरी चुनौतियों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज को अपने भीतर की एकता और समरसता को भी मजबूत करना होगा।
उनके अनुसार, यदि समाज संगठित और एकजुट रहेगा, तो वह किसी भी प्रकार की चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना कर सकेगा। यही विचार संघ की स्थापना के मूल उद्देश्य से जुड़ा हुआ है।
निष्कर्ष: संगठन और एकता पर आधारित संदेश
मोहन भागवत के इस संबोधन में मुख्य रूप से यही संदेश सामने आया कि संघ की स्थापना किसी विरोध के लिए नहीं, बल्कि समाज को एकजुट और मजबूत बनाने के उद्देश्य से की गई थी। उन्होंने हिंदू समाज में एकता, विविधता के सम्मान और सामंजस्य की आवश्यकता पर जोर दिया।
उनका यह बयान सामाजिक और संगठनात्मक एकता की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जो वर्तमान समय में भी प्रासंगिक माना जा सकता है।
