Mhow फीस में सिर्फ एक पौधा, 250 युवाओं को बनाया आर्मी अफसर: महू के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल की अनोखी पाठशाला, SSB की मुफ्त तैयारी
Mhow आमतौर पर शिक्षक दिवस पर गुरु की तस्वीर सामने आते ही स्कूल, ब्लैकबोर्ड और किताबों से जुड़ी यादें ताजा हो जाती हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के महू में एक ऐसी अनोखी पाठशाला है, जहां न कोई एडमिशन फॉर्म भरना पड़ता है और न ही किसी तरह की फीस देनी होती है। यहां युवाओं को सेना में अधिकारी बनने की तैयारी कराई जाती है और इस अनूठी पहल के पीछे हैं 81 वर्षीय रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल माधव गोविंद दातार।
सेना से वर्ष 2006 में रिटायर होने के बाद दातार ने अपने अनुभव को युवाओं के भविष्य के लिए इस्तेमाल करने का फैसला किया। वर्ष 2009 से उन्होंने युवाओं को SSB इंटरव्यू की मुफ्त तैयारी कराना शुरू किया। करीब 17 वर्षों से जारी इस प्रयास में उनके मार्गदर्शन से लगभग 250 युवा सेना के अधिकारी बन चुके हैं।
दातार के लिए यह काम सिर्फ कोचिंग या प्रशिक्षण नहीं, बल्कि युवाओं को सही दिशा देने का एक मिशन है। उनके पास देश के अलग-अलग हिस्सों से युवा SSB की तैयारी और अपने व्यक्तित्व को बेहतर बनाने के लिए पहुंचते हैं।
फीस नहीं, सफलता पर एक पौधा
दातार ने जब युवाओं को प्रशिक्षण देना शुरू किया तो उन्होंने पहले ही तय कर लिया था कि इसके बदले किसी से पैसे नहीं लिए जाएंगे। उनका मानना था कि उन्हें जीवन में भगवान ने पर्याप्त दिया है और युवाओं से फीस लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।
शुरुआत में जब कोई शिष्य चयनित होता था तो वह खुशी में दातार के लिए मिठाई और लड्डू लेकर आता था। धीरे-धीरे मिठाइयों की संख्या बढ़ने लगी। इसके बाद दातार ने अपने शिष्यों से कहा कि अब मिठाई लाने की जरूरत नहीं है, बल्कि सफलता के बाद एक पौधा लेकर आना।
तब से यह परंपरा बन गई। SSB में सफल होने वाले युवा अपने माता-पिता के साथ दातार से मिलने पहुंचते हैं और उन्हें एक पौधा भेंट करते हैं। दातार इन पौधों को अपने घर के गार्डन में लगाते हैं। उनके लिए ये पौधे केवल पेड़-पौधे नहीं, बल्कि उनके शिष्यों की सफलता और उनसे जुड़े रिश्ते की निशानी हैं।
SSB में रटे हुए जवाब नहीं आते काम
दातार की ट्रेनिंग सिर्फ SSB इंटरव्यू के संभावित सवालों के जवाब याद कराने तक सीमित नहीं है। उनका जोर इस बात पर रहता है कि युवा खुद को समझे, अपनी सोच विकसित करे और परिस्थितियों के अनुसार स्वाभाविक निर्णय लेना सीखे।
उनका मानना है कि SSB में कुछ घंटों के लिए बनावटी व्यक्तित्व दिखाना आसान नहीं होता। उम्मीदवार की बातचीत, व्यवहार, बॉडी लैंग्वेज और प्रतिक्रिया के जरिए उसके वास्तविक व्यक्तित्व का काफी हद तक पता चल जाता है।
जब किसी उम्मीदवार से पूछा जाता है कि वह सेना में अधिकारी क्यों बनना चाहता है, तो दातार किसी एक तय जवाब को सही नहीं मानते। कोई युवा देश सेवा को वजह बताता है, कोई एडवेंचर को, कोई सेना की प्रतिष्ठा को तो कोई नौकरी और भविष्य की सुरक्षा को कारण मानता है।
दातार के लिए महत्वपूर्ण यह है कि उम्मीदवार का जवाब ईमानदार और स्वाभाविक हो। वे युवाओं को बनावटी जवाब देने के बजाय अपनी वास्तविक सोच सामने रखने की सलाह देते हैं।
किताबों से ज्यादा सोचने की ट्रेनिंग
दातार की पाठशाला में किताबों और नोट्स से ज्यादा महत्व सोचने की क्षमता को दिया जाता है। उनका मानना है कि जिंदगी में हर समस्या का एक जैसा समाधान नहीं होता। इसलिए युवा को किसी भी परिस्थिति में शांत रहकर सोचने और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।
SSB की तैयारी के दौरान उम्मीदवारों की लीडरशिप, आत्मविश्वास, व्यवहार, अनुशासन, निर्णय लेने की क्षमता और व्यक्तित्व विकास पर ध्यान दिया जाता है। ग्रुप डिस्कशन और चयन प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों को समझाने के साथ युवाओं को वास्तविक परिस्थितियों के लिए तैयार किया जाता है।
Mhow का माहौल भी बनता है प्रेरणा
Mhow लंबे समय से सैन्य गतिविधियों से जुड़ा क्षेत्र रहा है। यहां सेना की मौजूदगी युवाओं के लिए अपने आप में प्रेरणा का कारण बनती है। सड़क पर वर्दी पहने किसी अधिकारी को देखकर कई युवाओं के मन में सेना में जाने का सपना पैदा होता है।
दातार की पाठशाला इसी सपने को सही दिशा देने का काम करती है। देश के अलग-अलग राज्यों से युवा यहां पहुंचते हैं और SSB की तैयारी करते हैं। उनके लिए दातार का अनुभव एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन साबित होता है।
एक चयन से बदल सकती है पूरे परिवार की तस्वीर
दातार बताते हैं कि सेना में अधिकारी के रूप में चयन सिर्फ एक युवा की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि कई बार पूरे परिवार की स्थिति बदल जाती है। साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाला कोई युवा जब अधिकारी बनता है तो उसके परिवार की आर्थिक स्थिति के साथ सामाजिक सम्मान में भी बदलाव आता है।
इसके अलावा परिवार के छोटे भाई-बहनों के सामने भी नए अवसर और करियर की संभावनाएं खुलती हैं। यही वजह है कि दातार युवाओं को सिर्फ परीक्षा और इंटरव्यू पास करने के लिए नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और बेहतर नेतृत्वकर्ता बनने के लिए तैयार करते हैं।
चयन के बाद भी नहीं टूटता गुरु-शिष्य का रिश्ता
दातार और उनके शिष्यों का रिश्ता चयन के साथ खत्म नहीं होता। वर्ष 2009-10 के आसपास उनसे प्रशिक्षण लेने वाले कई युवा आज सेना में वरिष्ठ अधिकारी बन चुके हैं। जब वे किसी सीनियर कोर्स या अन्य काम के सिलसिले में महू आते हैं तो अपने पुराने गुरु से मिलने का समय जरूर निकालते हैं।
इन मुलाकातों में पुरानी यादें ताजा होती हैं और दातार को अपने शिष्यों की प्रगति देखकर खुशी मिलती है। उनके लिए यही उनकी वर्षों की मेहनत का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
अनुभव को युवाओं के नाम किया
वर्ष 2006 में सेना से रिटायर होने के बाद दातार के सामने कई अन्य करियर विकल्प मौजूद थे। लेकिन उन्होंने अपनी सैन्य सेवा से मिले अनुभव और ज्ञान को युवाओं के मार्गदर्शन में लगाने का फैसला किया।
करीब 17 वर्षों से वे बिना फीस लिए युवाओं को SSB की तैयारी करा रहे हैं। उनके मार्गदर्शन से अब तक करीब 250 युवा सेना अधिकारी बन चुके हैं। उनकी इस अनोखी पहल में फीस के नाम पर लिया जाने वाला एक पौधा आज उनके गार्डन में सैकड़ों सपनों और सफलताओं की कहानी कहता है।
दातार की पाठशाला यह संदेश देती है कि किसी युवा के भविष्य को दिशा देने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। सही अनुभव, ईमानदार मार्गदर्शन और समाज के लिए कुछ करने की इच्छा भी किसी की जिंदगी बदल सकती है।
