जैन मुनियों की पवित्र पिच्छी को लेकर दिए गए कथित बयान का मामला अदालत पहुंचा। राजेश जैन दद्दू के अनुसार पुणे कोर्ट ने मेनका गांधी को समन जारी किया है। याचिकाकर्ताओं ने सिर्फ 1 रुपये की सांकेतिक क्षतिपूर्ति मांगी है।
मेनका गांधी पिच्छी विवाद में बड़ा मोड़: पुणे कोर्ट का समन, 30 दिन में मांगा जवाब
रिपोर्टर: राजेश जैन दद्दू
पुणे/इंदौर।
मेनका गांधी पिच्छी विवाद में एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। श्रमण संस्कृति के दिगंबर जैन संतों की पवित्र मयूर पंखी पिच्छी को लेकर की गई कथित टिप्पणी के मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू के अनुसार, पुणे के न्यायालय ने मामले में मेनका गांधी को समन जारी कर 30 दिनों के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
मेनका गांधी पिच्छी विवाद क्या है?
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि विवाद की शुरुआत मेनका गांधी के एक कथित बयान के बाद हुई। उनके अनुसार, मेनका गांधी ने पिच्छी के निर्माण और मोरों को लेकर एक दावा किया था, जिसका जैन समाज ने कड़ा विरोध किया।मामला अब अदालत तक पहुंच गया है। दद्दू के मुताबिक, पुणे के माननीय न्यायालय ने शिकायत पर संज्ञान लेते हुए मेनका गांधी को समन जारी किया है और 30 दिनों के भीतर अपना जवाब प्रस्तुत करने को कहा है।
किस बयान को लेकर जैन समाज में नाराजगी?
राजेश जैन दद्दू के अनुसार, कुछ समय पूर्व मेनका गांधी ने एक बयान में आरोप लगाया था कि देश में जैन मुनियों की पिच्छियों के निर्माण के लिए लगभग 15 लाख मोरों की हत्या की गई है।इस कथित बयान को लेकर भारतवर्षीय सकल जैन समाज में भारी आक्रोश देखने को मिला। जैन समाज ने इस दावे को तथ्यहीन बताते हुए स्पष्ट किया कि दिगंबर जैन मुनियों द्वारा उपयोग की जाने वाली पिच्छी तैयार करने के लिए किसी मोर की हत्या नहीं की जाती।
जैन समाज ने बताया कैसे बनाई जाती है पिच्छी
जैन समाज का कहना है कि मोर प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत अपने पंख छोड़ते हैं। इन्हीं स्वाभाविक रूप से झड़े हुए मयूर पंखों को एकत्रित करके पिच्छी बनाई जाती है।दिगंबर जैन परंपरा में पिच्छी का विशेष धार्मिक महत्व है। मुनिराज इसका उपयोग चलते, उठते और बैठते समय सूक्ष्म जीवों की रक्षा के लिए करते हैं। जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोच्च सिद्धांतों में माना जाता है और समाज का कहना है कि पिच्छी भी इसी अहिंसक जीवन पद्धति का प्रतीक है।इसी कारण मेनका गांधी पिच्छी विवाद से जुड़ी टिप्पणी को लेकर जैन समाज ने आपत्ति दर्ज कराई और इसे संतों की गरिमा तथा धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय बताया।
इंदौर से भी भेजा गया था मेनका गांधी को लीगल नोटिस
दद्दू ने बताया कि इस मामले में सबसे पहले राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ, इंदौर के मयंक जैन द्वारा मेनका गांधी को कानूनी नोटिस भेजा गया था।
नोटिस के माध्यम से कथित बयान को वापस लेने और सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगने की मांग की गई थी। संघ का कहना है कि नोटिस के बावजूद बयान वापस नहीं लिया गया और माफी नहीं मांगी गई, जिसके बाद मामला कानूनी प्रक्रिया की ओर बढ़ा।
पुणे में अन्ना पाटिल और स्नेहा पांडे ने दायर की याचिका
दद्दू के अनुसार, पुणे में शिकायतकर्ता अन्ना पाटिल और स्नेहा पांडे ने एडवोकेट जितुरकर के माध्यम से याचिका दायर की। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत द्वारा मेनका गांधी को समन जारी किए जाने की जानकारी दी गई है।मामले में अब अदालत के समक्ष संबंधित पक्ष द्वारा जवाब प्रस्तुत किए जाने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया होगी।
सिर्फ 1 रुपये की सांकेतिक क्षतिपूर्ति की मांग
इस मामले की खास बात यह है कि याचिकाकर्ताओं ने मानहानि के बदले मेनका गांधी से केवल 1 रुपये की सांकेतिक क्षतिपूर्ति की मांग की है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस मांग का उद्देश्य किसी प्रकार का आर्थिक लाभ प्राप्त करना नहीं है। उनका उद्देश्य जैन संतों की गरिमा, अहिंसा धर्म और धार्मिक आस्था की रक्षा के लिए अपनी बात कानूनी एवं संवैधानिक तरीके से रखना है।
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने देशभर के जैन समाज से की अपील
भारतवर्षीय राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने देशभर की जैन संस्थाओं से धर्म, संस्कृति, तीर्थों और संतों की रक्षा के लिए संवैधानिक एवं कानूनी तरीके से एकजुट होकर आवाज उठाने की अपील की है।
संघ से जुड़े लोगों का कहना है कि धार्मिक परंपराओं और संतों से संबंधित विषयों पर तथ्यपरक जानकारी सामने आनी चाहिए, ताकि समाज में किसी तरह की गलतफहमी पैदा न हो।
राजेश जैन दद्दू ने कहा कि जैन समाज अहिंसा के सिद्धांत पर चलता है और पिच्छी भी जीवों की रक्षा तथा अहिंसा की भावना से जुड़ी हुई है। उन्होंने समाज से धर्म और श्रमण संस्कृति की रक्षा के लिए एकजुट रहने का आह्वान किया।
जय हो श्रमण संस्कृति।
