मौलाना महमूद मदनी और उनके चाचा मौलाना अरशद मदनी के हालिया बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। बिहार चुनाव के नतीजों के बाद इन बयान को असदुद्दीन ओवैसी के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव से जोड़ा जा रहा है। सवाल उठता है कि यह मुस्लिम नेतृत्व की चिंता है या मुस्लिम समुदाय में अपनी छवि सुधारने की कोशिश।
मौलाना महमूद मदनी ने भोपाल में कहा कि “जहां ज़ुल्म होगा, वहां जिहाद होगा,” और यह भी बताया कि इस्लाम के पवित्र विचार को गलत तरीके से हिंसा में बदल दिया गया है। वहीं मौलाना अरशद मदनी ने अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर हुई कार्रवाई को शिक्षा पर हमला नहीं, बल्कि मुस्लिम संस्थानों को डराने की राजनीति बताया।

मुस्लिम राजनीति में बदलाव :
देश में मुस्लिम आबादी लगभग 15% है। आज़ादी के बाद मुस्लिम नेतृत्व या तो उलेमाओं और मुस्लिम संगठनों के हाथ में रहा, लेकिन नरेंद्र मोदी की राजनीति के बाद असदुद्दीन ओवैसी ने मुस्लिम नेतृत्व का नया चेहरा बनकर उभरना शुरू किया। ओवैसी ने हैदराबाद से निकलकर महाराष्ट्र और उत्तर भारत के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पैठ बनाई। बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने सीमांचल में पांच सीटें जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की।
ओवैसी की बढ़ती लोकप्रियता ने मौलाना महमूद और अरशद मदनी को चिंतित कर दिया है। मदनी परिवार ने अब आक्रामक तेवर अपनाकर मुस्लिम समुदाय में अपनी छवि सुधारने की कोशिश शुरू कर दी है।
ओवैसी बनाम मदनी :

मौलाना महमूद मदनी ने AIMIM चीफ ओवैसी की राजनीति को बांटने वाली बताया और कहा कि उनकी राजनीति से मुस्लिमों को नुकसान हो रहा है। वहीं ओवैसी समर्थक इसे गलत मानते हैं और उनका कहना है कि मुस्लिमों के लिए खुलकर बोलने वाला आज कोई नहीं है।
मुस्लिम नेतृत्व की नई तस्वीर :
विशेषज्ञों का मानना है कि अब मुस्लिम राजनीति उलेमाओं के नियंत्रण से बाहर निकलकर नए चेहरे ओवैसी के नेतृत्व में आकार ले रही है। मदनी परिवार ने हालिया समय में सरकार समर्थक रुख अपनाया था, लेकिन अब उन्होंने आक्रामक बयान देकर मुस्लिम समुदाय में अपनी सियासी छवि सुधारने की कोशिश की है।
इस तरह मौलाना महमूद और अरशद मदनी की नई रणनीति मुस्लिम राजनीति में अपने पुराने प्रभाव को बनाए रखने और ओवैसी के बढ़ते ग्राफ का मुकाबला करने के इर्द-गिर्द केंद्रित नजर आ रही है।
