मोदी-पेजेश्कियान मुलाकात के बीच मार्को रुबियो का बड़ा बयान, बोले- ईरान को प्रतिबंधों से बचाने में कोई देश न करे मदद
Marco Rubio On Iran: अमेरिकी विदेश मंत्री ने ईरान के साथ आर्थिक संबंधों को लेकर देशों को चेताया, परमाणु कार्यक्रम और आतंकवाद के वित्तपोषण का उठाया मुद्दा
इंटरनेशनल डेस्क। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का बड़ा बयान सामने आया है। रुबियो ने उन देशों को चेतावनी दी है जो ईरान के साथ व्यापार कर रहे हैं या भविष्य में आर्थिक संबंध बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी देश को ऐसी व्यवस्था तैयार करने में ईरान की सहायता नहीं करनी चाहिए, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचकर पैसा कमा सके।
रुबियो का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच मुलाकात को लेकर चर्चा है। अमेरिका लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम, उसकी आर्थिक गतिविधियों और क्षेत्रीय संगठनों के साथ उसके संबंधों को लेकर सख्त रुख अपनाता रहा है।
ईरान को लेकर क्या बोले मार्को रुबियो?
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि कोई भी देश ईरान को ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाने में सहायता करे, जिसके माध्यम से तेहरान प्रतिबंधों के प्रभाव से बचते हुए राजस्व हासिल कर सके।
रुबियो के मुताबिक, अमेरिका की चिंता इस बात को लेकर है कि इस तरह अर्जित धन का इस्तेमाल ईरान कथित रूप से आतंकवादी संगठनों को समर्थन देने या अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में कर सकता है।
अमेरिका लंबे समय से ईरान पर आरोप लगाता रहा है कि वह मध्य पूर्व में विभिन्न सशस्त्र समूहों को आर्थिक और सैन्य सहायता उपलब्ध कराता है। ईरान इन आरोपों और अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिकी दावों का विरोध करता रहा है।
ईरान से कारोबार करने वाले देशों को संदेश
रुबियो के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उन देशों को लेकर है जो ईरान के साथ आर्थिक और व्यापारिक संबंध बनाए हुए हैं। अमेरिका की ओर से संकेत दिया गया है कि वह ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को प्रभावी बनाए रखने के लिए दूसरे देशों के आर्थिक व्यवहार पर भी नजर रख रहा है।
रुबियो ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ऐसी किसी व्यवस्था का समर्थन नहीं करेगा जो ईरान को प्रतिबंधों से बचने में मदद करे। उनके मुताबिक, प्रतिबंधों का उद्देश्य ईरान की उन आर्थिक गतिविधियों को सीमित करना है जिनसे उसके विवादित कार्यक्रमों या क्षेत्रीय गतिविधियों को वित्तीय सहायता मिलने की आशंका है।
इस बयान को ईरान के व्यापारिक साझेदार देशों के लिए एक कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
मोदी-पेजेश्कियान मुलाकात के बीच बयान की चर्चा
मार्को रुबियो का बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मुलाकात से जोड़कर भी देखा जा रहा है। भारत और ईरान के बीच लंबे समय से कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं।
दोनों देशों के संबंधों में ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क जैसे मुद्दों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विशेष रूप से ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अहम माना जाता है।
ऐसे में अमेरिका की ओर से ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों को लेकर दिया गया संदेश अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ईरान-अमेरिका के बीच लंबे समय से तनाव
अमेरिका और ईरान के रिश्ते दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम सबसे बड़े विवादों में शामिल है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश समय-समय पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता जाहिर करते रहे हैं।
वहीं ईरान का कहना रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। तेहरान परमाणु हथियार विकसित करने के आरोपों को खारिज करता रहा है।
इस विवाद के चलते अमेरिका ने ईरान पर विभिन्न आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों का असर ईरान के तेल निर्यात, बैंकिंग व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ा है।
आतंकवाद के वित्तपोषण का भी उठाया मुद्दा
मार्को रुबियो ने अपने बयान में केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि आतंकवाद के कथित वित्तपोषण का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि ईरान को ऐसी व्यवस्था उपलब्ध नहीं होनी चाहिए जिससे वह पैसा कमाकर उसका इस्तेमाल आतंकवाद को समर्थन देने के लिए कर सके।
अमेरिका ईरान पर मध्य पूर्व के विभिन्न सशस्त्र संगठनों को समर्थन देने का आरोप लगाता रहा है। हालांकि ईरान अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को लेकर अमेरिकी दृष्टिकोण से सहमत नहीं रहा है।
इसी मुद्दे के कारण दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सैन्य तनाव कई बार बढ़ चुका है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है पूरा घटनाक्रम?
भारत के अमेरिका और ईरान दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। अमेरिका भारत के प्रमुख रणनीतिक और आर्थिक साझेदारों में शामिल है, जबकि ईरान पश्चिम और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच के लिहाज से महत्वपूर्ण देश है।
चाबहार बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच उपलब्ध कराने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
यही वजह है कि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों और तेहरान के साथ व्यापार को लेकर होने वाला कोई भी बड़ा अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम भारत के लिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
पश्चिम एशिया की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर
ईरान को लेकर अमेरिका का सख्त रुख केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
ईरान दुनिया के प्रमुख तेल और गैस उत्पादक देशों में शामिल है। ऐसे में उसके ऊर्जा निर्यात पर प्रतिबंध या आर्थिक दबाव बढ़ने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति और कीमतों को लेकर भी चिंता बढ़ सकती है।
फिलहाल मार्को रुबियो के ताजा बयान ने साफ कर दिया है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी प्रतिबंध नीति को लेकर सख्त रुख बनाए रखना चाहता है। वहीं भारत जैसे देशों के लिए चुनौती अपने रणनीतिक हितों और विभिन्न वैश्विक साझेदारों के साथ संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी।
