संस्कृत केवल पूजा-पाठ नहीं, विज्ञान और व्यवहार की भाषा: भरत बैरागी
स्वराज वाणी संवाददाता : गौतम साल्वे ,जिला ब्यूरो चीफ मंडलेश्वर
संस्कृत सप्ताह समारोप समारोह में भाषा के व्यापक महत्व पर हुआ मंथन, नवीन दायित्वों की भी घोषणा
Mandleshwar । नगर मंडलेश्वर में संस्कृत भारती मालवा प्रांत के तत्वावधान में आयोजित संस्कृत सप्ताह समारोप समारोह गरिमामय एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत के आधुनिक संदर्भ में महत्व को लेकर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। समारोह में बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन, सामाजिक कार्यकर्ता और संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संस्कृत भारती के क्षेत्रीय संयोजक एवं मध्यप्रदेश योग आयोग के पूर्व चेयरमैन भरत बैरागी रहे। इसके अलावा मालवा प्रांत संगठन मंत्री मनीष पांचाल, प्रांत मंत्री सुरेंद्र शर्मा, प्रांत गण सदस्य पंडित पंकज मेहता तथा समाजसेवी रामचंद्र पाटीदार विशेष रूप से मौजूद रहे।
समारोह का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन, मां सरस्वती के पूजन और ग्रंथ पूजन के साथ हुआ। वातावरण में भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के प्रति श्रद्धा एवं उत्साह दिखाई दिया। आयोजन के दौरान संस्कृत भाषा के महत्व को आमजन तक पहुंचाने और इसे दैनिक व्यवहार का हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।
संस्कृत में भारतीय ज्ञान परंपरा का विशाल भंडार
मुख्य अतिथि भरत बैरागी ने अपने संबोधन में संस्कृत भाषा के महत्व को व्यापक संदर्भ में समझाया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल धार्मिक अनुष्ठानों या पूजा-पाठ तक सीमित भाषा नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, संस्कृति और व्यवहार की समृद्ध भाषा है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत में मानव जीवन के सर्वांगीण विकास से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण बातें निहित हैं। संस्कृत साहित्य में आध्यात्म और दर्शन के साथ-साथ विज्ञान, खगोल, भूगोल, चिकित्सा, संस्कृति और जीवन पद्धति से संबंधित ज्ञान भी उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के प्राचीन ग्रंथ आज भी शोधकर्ताओं और विद्वानों के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय हैं।
भरत बैरागी ने कहा कि संस्कृत को केवल कर्मकांड से जोड़कर देखना इसके व्यापक स्वरूप को सीमित कर देना है। संस्कृत को विज्ञान और व्यवहार की भाषा के रूप में भी समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने पर जोर
कार्यक्रम के दौरान संस्कृत भारती की गतिविधियों और भाषा के प्रचार-प्रसार के प्रयासों की जानकारी भी दी गई। आशुतोष मेहता ने संस्कृत भाषा में ही संस्था का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने संस्कृत भारती द्वारा किए जा रहे विभिन्न कार्यों और संस्कृत को समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के प्रयासों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि संस्कृत को केवल विद्यालयों और धार्मिक संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय सामान्य बातचीत और दैनिक जीवन में उपयोग करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। इस तरह के आयोजनों का उद्देश्य लोगों के बीच संस्कृत के प्रति रुचि पैदा करना और भाषा को सहज रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करना है।
अतिथियों का किया स्वागत
समारोह में उपस्थित अतिथियों का स्वागत शाल और श्रीफल भेंटकर किया गया। अर्चना पाटीदार, अर्जुन सिंह पटेल, गणेश पाटीदार, विमला सांखला, मालती बड़ोले, दीपक पाटीदार और राजेंद्र पाटीदार ने अतिथियों का स्वागत किया।
कार्यक्रम के दौरान संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर उपस्थित लोगों ने रुचि के साथ विचार सुने। आयोजन में संस्कृत के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने और नई पीढ़ी को भारतीय भाषाओं एवं ज्ञान परंपरा से जोड़ने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

नवीन दायित्वों की घोषणा
संस्कृत सप्ताह के समापन अवसर पर संगठन के आगामी कार्यों को गति देने के लिए नवीन दायित्वों की घोषणा भी की गई। इस दौरान पंडित रवींद्र शुक्ला को नगर संयोजक का दायित्व सौंपा गया। वहीं श्रीमती योगिता राठौड़ को नगर सह-संयोजिका नियुक्त किया गया।
इसके अलावा श्रीमती संध्या तिवारी और संगीता कुशवाहा को बस्ती संयोजिका की जिम्मेदारी दी गई। नवीन दायित्वों की घोषणा के बाद उपस्थित लोगों ने पदाधिकारियों को शुभकामनाएं दीं। पंडित रवींद्र शुक्ला के नगर संयोजक बनाए जाने पर नगरवासियों ने हर्ष व्यक्त किया।
आयोजकों ने उम्मीद जताई कि नवीन दायित्वों के माध्यम से मंडलेश्वर और आसपास के क्षेत्रों में संस्कृत के प्रचार-प्रसार से जुड़ी गतिविधियों को और विस्तार मिलेगा। संस्कृत के प्रति युवाओं और विद्यार्थियों में रुचि बढ़ाने के लिए भी भविष्य में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाने की बात कही गई।
संस्कृत और आधुनिक समाज का संबंध
समारोह में वक्ताओं के विचारों का प्रमुख केंद्र संस्कृत और आधुनिक समाज के बीच संबंध रहा। वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में किसी भाषा का महत्व केवल उसके साहित्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके ज्ञान और उपयोगिता को भी समझना आवश्यक है।
संस्कृत के संदर्भ में वक्ताओं का कहना था कि यह भाषा भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण माध्यम रही है। संस्कृत साहित्य में मौजूद ग्रंथों में दर्शन, गणित, ज्योतिष, खगोल, चिकित्सा, व्याकरण और विभिन्न विषयों से संबंधित सामग्री मिलती है। ऐसे में संस्कृत का अध्ययन भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
कार्यक्रम में यह संदेश भी दिया गया कि संस्कृत को लेकर आम लोगों के मन में मौजूद झिझक को दूर करने की जरूरत है। यदि संस्कृत को सरल तरीके से दैनिक व्यवहार से जोड़ा जाए तो इसे सीखना और समझना अधिक सहज हो सकता है।
बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन रहे मौजूद
कार्यक्रम के अंत में संस्कृत भारती के जिलाध्यक्ष जयसिंह चौहान ने आभार प्रदर्शन किया। उन्होंने आयोजन में सहयोग देने वाले सभी लोगों, अतिथियों और उपस्थित समाजजनों के प्रति धन्यवाद व्यक्त किया।
समारोह में पंडित प्रकाश मेहता, डॉ. मुकेश पाटीदार, गिरिजेश पाटीदार, अनिल भटोरे, माला मंडलोई, रत्ना पाटीदार, भूमिका कुशवाहा, विजय पाटीदार, वीरेंद्र पाटीदार, आकाश सोनी, नूतन केवट, कला पाटीदार, अंजना पाटीदार, प्रदीप पाटीदार, नरेंद्र पाटीदार, डॉ. ब्रह्मप्रकाश शर्मा, मनोज मातवनकर सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
धर्म, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित संस्कृत सप्ताह का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि संस्कृत को केवल अतीत की भाषा मानने के बजाय वर्तमान जीवन और ज्ञान-विज्ञान के संदर्भ में भी समझने की आवश्यकता है। समारोह में संस्कृत के प्रचार-प्रसार और इसके अध्ययन को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाने का संकल्प भी व्यक्त किया गया।
