पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा
Mamata Banerjee ने चुनाव आयोग पर लगाया गंभीर आरोप
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने बुधवार को खुद अदालत में अपनी बात रखी और चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि उनके राज्य में मतदाताओं के नाम जानबूझकर हटाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई सोमवार, 9 फरवरी को तय की है।
ममता ने अदालत में कहा कि उनका उद्देश्य केवल राजनीतिक हितों की रक्षा नहीं, बल्कि राज्य के नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने तमाम तथ्यों को जानने के बावजूद उनकी बात नहीं सुनी।
वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने का आरोप
Mamata Banerjee ने विशेष रूप से रवींद्रनाथ टैगोर के नाम की स्पेलिंग में बदलाव का जिक्र करते हुए कहा कि यह लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के दृष्टिकोण से गंभीर मामला है। उनका आरोप है कि चुनाव से ठीक पहले राज्य को टारगेट किया जा रहा है और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं।
वकील श्याम दीवान ने बताया कि फाइनल वोटर लिस्ट के प्रकाशन के लिए अब केवल 11 दिन शेष हैं, जो 14 फरवरी तक पूरी होनी है। वहीं, सुनवाई के लिए केवल चार दिन का समय बचा है। राज्य में लगभग 32 लाख ‘अनमैप्ड वोटर्स’ हैं और करीब 3.26 करोड़ नामों में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ पाई गई है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 20 प्रतिशत है।
चुनाव आयोग से मांगी गई स्पष्टीकरण
श्री दीवान ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट में शामिल हर मतदाता का नाम सार्वजनिक करना चाहिए और यह स्पष्ट करना चाहिए कि किसी का नाम सूची से क्यों हटाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया केवल सामान्य सूचना नहीं, बल्कि संबंधित लोगों को व्यक्तिगत नोटिस भी दिए जा रहे हैं।
Mamata Banerjeeने कहा कि अन्य राज्यों में चुनाव आयोग सभी दस्तावेज स्वीकार कर रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल में उन्हें खारिज किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब ऐसे समय हो रहा है जब त्योहार और फसल कटाई का मौसम है, और बड़ी संख्या में लोग राज्य से बाहर हैं।
‘व्हाट्सऐप कमीशन’ तक का आरोप
ममता ने चुनाव आयोग पर तंज कसते हुए कहा, “इलेक्शन कमीशन… सॉरी—व्हाट्सऐप कमीशन यह सब कर रहा है। लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं। बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि योग्य मतदाताओं के नाम सूची में शामिल होना चाहिए और आयोग को इसके लिए उचित कदम उठाने होंगे। केवल दोषसिद्ध व्यक्ति, राज्य या देश से बाहर गए लोग और गैर-नागरिकों के नाम ही हटाए जाने चाहिए।
तकनीकी और भाषाई गलती को गंभीरता से न लिया जाए
अदालत में चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि उन्हें अभी तक याचिका की कॉपी नहीं मिली है और समस्या स्पष्ट नहीं है। CJI ने कहा कि अगर किसी नाम की स्पेलिंग में तकनीकी या भाषाई गलती हुई है तो इसे गंभीरता से न लिया जाए, लेकिन किसी असली नागरिक को बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।
ममता ने उदाहरण देते हुए बताया कि शादी या पता बदलने वालों को ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ बताकर सूची से हटाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह “डिस्क्रिपेंसी मैपिंग” है और चुनाव आयोग केवल बंगाल को टारगेट कर रहा है।
माइक्रो-ऑब्जर्वर और अधिकारियों की नियुक्ति पर विवाद
Mamata Banerjee ने आरोप लगाया कि राज्य में 3800 माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त किए गए हैं, जिनमें अधिकांश बीजेपी शासित राज्यों से आए हैं। ये लोग ऑफिस में बैठकर नाम काट रहे हैं। पहले चरण में लगभग 58 लाख नाम ‘मृत घोषित’ कर हटाए गए, जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक है।
CJI ने निर्देश दिया कि जरूरत पड़ने पर हर नोटिस केवल BLO की अनुमति से ही जारी किया जाए। चुनाव आयोग के सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि राज्य सरकार ने पर्याप्त क्लास-2 अधिकारी उपलब्ध नहीं कराए, जिससे माइक्रो-ऑब्जर्वर लगाने पड़े।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर राज्य में नए मुद्दे आते हैं, लेकिन योग्य मतदाता का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस मामले में समय बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी किया और कहा कि आयोग सोमवार को जवाब पेश करे। अदालत ने राज्य सरकार को भी उपलब्ध ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची पेश करने का निर्देश दिया।
निष्कर्ष
इस पूरे विवाद में पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची, चुनाव आयोग की प्रक्रिया, और नागरिक अधिकारों के मुद्दे मुख्य रूप से उभरकर सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी, जब चुनाव आयोग और राज्य सरकार को अदालत में अपने तर्क और कदम स्पष्ट करने होंगे।
