संजावली प्रतियोगिता में गूँजे मालवी लोकगीत, गोबर से सजीं संजा की कलाकृतियाँ: राज्यमंत्री डॉ. गौतम टेटवाल बोले,
संजा लोककला, प्रकृति संरक्षण और संस्कारों का सुंदर संगम, सेवा सदन में हुआ संजावली प्रतियोगिता एवं कला महोत्सव
सारंगपुर। मालवा की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक कलाओं और लोकगीतों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से कौशल विकास एवं रोजगार विभाग के राज्यमंत्री और सारंगपुर विधायक डॉ. गौतम टेटवाल की पहल पर सेवा सदन कार्यालय परिसर में संजावली प्रतियोगिता एवं कला महोत्सव आयोजित हुआ। क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों और विद्यालयों से आई छात्राओं ने संजा की पारंपरिक कलाकृतियों, मालवी लोकगीतों और लोकनृत्य के जरिए मालवा की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन किया।
“माताएँ-बहनें न होतीं तो परंपराएँ जीवित रखना कठिन होता”
राज्यमंत्री डॉ. टेटवाल ने कहा कि माताओं, दादी-नानियों और बहनों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोकगीतों, पारंपरिक कलाओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों को सहेजकर रखा है। संजावली जैसे आयोजन इसी अमूल्य विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम हैं। उन्होंने सारंगपुर में विलुप्त होती लोकपरंपराओं को पुनर्जीवित करने और युवाओं को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के इस प्रयास को सराहनीय बताया।
उन्होंने कहा कि लोककला केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि हमारी पहचान और सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा है। जब बेटियाँ दादी-नानी से लोकगीत सीखती हैं और अपने हाथों से संजा की आकृतियाँ बनाती हैं, तब एक पीढ़ी का अनुभव दूसरी पीढ़ी की चेतना का हिस्सा बनता है। ऐसे आयोजन बच्चों में रचनात्मकता, सामूहिक सहभागिता, संस्कार और संस्कृति के प्रति गर्व की भावना विकसित करते हैं।
संजा पर्व: माँ पार्वती की आराधना और प्रकृति से जुड़ाव की परंपरा
मालवा-निमाड़ अंचल में संजा (संजावली) का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। भाद्रपद पूर्णिमा से पितृपक्ष के दौरान लगभग 16 दिनों तक किशोरियाँ घरों की दीवारों पर गाय के गोबर से संजा के मांडने और विभिन्न आकृतियाँ बनाती हैं। इन्हें फूलों, पत्तियों और प्राकृतिक सामग्रियों से सजाकर रोज पारंपरिक संजा गीत गाए जाते हैं।
लोकमान्यता के अनुसार, इस पर्व को माँ पार्वती से भी जोड़ा जाता है। एक प्रचलित लोककथा में माँ पार्वती के मायके आने और सखियों के साथ स्नेहपूर्वक समय बिताने की कल्पना है। कुछ मान्यताओं में कुंवारी कन्याओं की मनचाहे वर और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना का भी उल्लेख मिलता है। इन कथाओं के अलग-अलग रूप स्थानीय लोकजीवन और मौखिक परंपराओं में प्रचलित हैं।
संजा की आकृतियाँ केवल सजावट नहीं, बल्कि लोकविश्वास, पारिवारिक स्नेह और स्त्री-जीवन की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति हैं। गोबर और फूल-पत्तियों जैसी प्राकृतिक सामग्री का उपयोग स्थानीय संसाधनों के महत्व और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन की प्रेरणा भी देता है।

मालवी लोकगीतों और लोकनृत्य की मनमोहक प्रस्तुतियाँ
प्रतियोगिता में बड़ी संख्या में स्कूली छात्राओं ने अपनी टीमों के साथ भाग लिया। उन्होंने “कौड़ियों बामन सांझ को क्यों लेने आयो” और “नानी सी गाड़ी गुड़कती जाए, जेमे बैठी संजाबाई” जैसे पारंपरिक संजा गीतों की प्रस्तुति देकर मालवी लोकसंस्कृति की मिठास से दर्शकों को परिचित कराया। गीतों की सहज लय, पारंपरिक शब्दावली और छात्राओं के उत्साह ने आयोजन में विशेष रंग भर दिया।
भ्याना, गुलावता, धनौरा, पचोर, पाड़ल्यामाता, आमलारोड़, पांदा और संडावता सहित कई ग्रामीण अंचलों के शासकीय विद्यालयों की छात्राओं ने सहभागिता की। कस्तूरबा गांधी छात्रावास की छात्राओं ने मालवी लोकनृत्य प्रस्तुत किया, जबकि सांदीपनि विद्यालय की छात्राओं ने संजा गीतों की प्रस्तुति दी।
प्रतियोगिताओं में विजेता रहीं ये टीमें
कार्यक्रम के अंत में गीत गायन और गोबर से संजा मांडना प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली छात्राओं को बैग और शील्ड देकर सम्मानित किया गया।
संजा गीत गायन प्रतियोगिता
- प्रथम स्थान: गुलावता संकुल
- द्वितीय स्थान: उत्कृष्ट मॉडल स्कूल
- तृतीय स्थान: शासकीय विद्यालय, उड़नखेड़ी
गोबर से संजा मांडना प्रतियोगिता
- प्रथम स्थान: शासकीय विद्यालय, पासल्यामाता
- द्वितीय स्थान: शासकीय कन्या विद्यालय, सारंगपुर
- तृतीय स्थान: संदीपनी विद्यालय, मऊ
पाड़ल्यामाता, भ्याना, आमलारोड़ सहित अन्य विद्यालयों की छात्राओं को भी प्रोत्साहन स्वरूप सम्मानित किया गया।
पिछले दो वर्षों से जारी है आयोजन
सेवा सदन परिसर में यह कार्यक्रम पिछले दो वर्षों से डॉ. टेटवाल की पहल पर लोकसंस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य संजा जैसी पारंपरिक लोककलाओं को घरों और आँगनों तक सीमित न रखकर विद्यालयों, सार्वजनिक आयोजनों और नई पीढ़ी के बीच पहचान दिलाना है।
शिक्षा से जोड़ने और डिजिटल माध्यम अपनाने पर जोर
डॉ. टेटवाल ने लोकपरंपराओं को शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों से जोड़ने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में लोककला, मालवी लोकगीत, लोककथाओं और पारंपरिक हस्तकला से जुड़ी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। आधुनिक माध्यमों और डिजिटल तकनीक से भी हमारी विरासत को व्यापक पहचान दिलाई जा सकती है।
उन्होंने कहा कि बेटियाँ संस्कृति की संवाहक होने के साथ विकसित भारत के निर्माण की शक्ति भी हैं। जब बेटियाँ शिक्षा, कला और रचनात्मकता में आगे बढ़ती हैं और अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करती हैं, तब परिवार, समाज और राष्ट्र तीनों सशक्त होते हैं।
सभी छात्राओं, शिक्षकों, माताओं-बहनों और आयोजकों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि हमारी लोकसंस्कृति केवल अतीत की स्मृति बनकर न रह जाए, बल्कि वर्तमान की चेतना और भविष्य की प्रेरणा बने।
ये रहे उपस्थित
कार्यक्रम में श्रीमती रेखा टेटवाल, नगर पालिका उपाध्यक्ष भावना निलेश वर्मा, सरपंच श्रद्धा पालीवाल, डॉ. सरिता यादव, पूजा विजयवर्गीय, संगीता गुप्ता, कुसुम भारतीय, मंडल अध्यक्ष महेश पुष्पद, निर्मल जैन, बद्रीलाल बामनिया, सुशील व्यास, राधेश्याम माहेश्वरी, विकासखंड शिक्षा अधिकारी सुरेश बीरमाल और बीआरसी बी.एल. वर्मा सहित अन्य जनप्रतिनिधि, शिक्षाविद् और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन मॉडल स्कूल की प्राचार्य एवं शिक्षिका बबीता मिश्रा ने किया।
संजावली प्रतियोगिता एवं कला महोत्सव ने संदेश दिया कि लोकसंस्कृति का संरक्षण परंपराओं को केवल दोहराने से नहीं, बल्कि उन्हें नई पीढ़ी के जीवन का हिस्सा बनाने से संभव है।
