माटी के गणेश बना रहे हैं तो जान लें नियम, मिट्टी से लेकर रंग और सजावट तक बरतनी होगी सावधानी
प्रतिमा निर्माण से शुरू होती है पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी, प्राकृतिक सामग्री और सुरक्षित विसर्जन पर देना होगा ध्यान
जबलपुर। गणेशोत्सव श्रद्धा, भक्ति और उल्लास का पर्व है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण संरक्षण की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी जुड़ी है। यह जिम्मेदारी केवल प्रतिमा विसर्जन के दिन शुरू नहीं होती, बल्कि भगवान गणेश की प्रतिमा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी, रंग और सजावटी सामग्री के चयन से ही आरंभ हो जाती है।
हर वर्ष प्रशासन, नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित विभाग प्रतिमा निर्माण एवं विसर्जन को लेकर दिशा-निर्देश जारी करते हैं। इनका उद्देश्य नदियों, तालाबों और दूसरे जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाना है। इसके बावजूद बड़ा सवाल यह रहता है कि नियमों का पालन केवल बैठकों और कागजी निर्देशों तक सीमित है या प्रतिमा निर्माण और विसर्जन स्थल पर भी दिखाई देता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के संशोधित दिशा-निर्देशों में प्राकृतिक एवं जैव-अवक्रमणीय सामग्री से प्रतिमाएं बनाने और जलस्रोतों को प्रदूषित करने वाली वस्तुओं के इस्तेमाल से बचने पर जोर दिया गया है। CPCB की संशोधित प्रतिमा विसर्जन
प्राकृतिक मिट्टी से बनाएं गणेश प्रतिमा
पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमा तैयार करने के लिए प्राकृतिक चिकनी मिट्टी या स्थानीय रूप से उपलब्ध जैव-अवक्रमणीय सामग्री को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मिट्टी की प्रतिमा पानी में अपेक्षाकृत आसानी से घुल जाती है और उसका पर्यावरण पर नुकसान कम होता है।
प्रतिमा बनाने वाली मिट्टी में ऐसी रासायनिक सामग्री नहीं मिलाई जानी चाहिए, जिससे विसर्जन के बाद पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो। श्रद्धालुओं को प्रतिमा खरीदते समय विक्रेता से यह जानकारी अवश्य लेनी चाहिए कि प्रतिमा प्राकृतिक मिट्टी से बनाई गई है या उसमें प्लास्टर ऑफ पेरिस एवं दूसरी कृत्रिम सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।
कई बार ऊपर से मिट्टी जैसी दिखाई देने वाली प्रतिमा के अंदर दूसरी सामग्री इस्तेमाल की जाती है। इसलिए केवल रंग और बाहरी स्वरूप देखकर प्रतिमा का चयन करने के बजाय उसके निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की पुष्टि करना जरूरी है।
प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी प्रतिमाओं से बचें
प्लास्टर ऑफ पेरिस से तैयार प्रतिमाएं पानी में जल्दी नहीं घुलतीं। विसर्जन के बाद इनके अवशेष लंबे समय तक नदी या तालाब में पड़े रह सकते हैं। इससे जलस्रोत की स्वच्छता, जलीय जीवों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
स्थानीय प्रशासन द्वारा समय-समय पर प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी प्रतिमाओं की बिक्री और विसर्जन के संबंध में आदेश जारी किए जाते हैं। कारीगरों, विक्रेताओं और पूजा समितियों को अपने शहर या जिले में लागू ताजा आदेशों का पालन करना चाहिए।
मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देने के लिए केवल प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए कारीगरों को उचित मिट्टी, प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और बाजार उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
रासायनिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक रंग चुनें
प्रतिमाओं पर लगाए जाने वाले रंग पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। चमकीले रासायनिक रंगों में सीसा, पारा, क्रोमियम और अन्य हानिकारक तत्व होने की आशंका रहती है। विसर्जन के बाद ये तत्व पानी में मिलकर उसकी गुणवत्ता प्रभावित कर सकते हैं।
माटी के गणेश को रंगने के लिए प्राकृतिक, पानी में घुलने वाले और कम प्रदूषणकारी रंगों को प्राथमिकता देनी चाहिए। हल्दी, गेरू, मुल्तानी मिट्टी, फूलों एवं वनस्पतियों से बने सुरक्षित रंग बेहतर विकल्प हो सकते हैं।
प्रतिमा खरीदने वाले श्रद्धालु विक्रेता से रंगों के संबंध में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। बहुत ज्यादा चमकदार, प्लास्टिक जैसी परत वाले या तीखी गंध वाले रंगों से सजी प्रतिमाओं का चयन सावधानी से किया जाना चाहिए।
सजावट में प्लास्टिक और थर्मोकोल का इस्तेमाल न करें
गणेश प्रतिमा और पंडाल को सजाने के लिए प्लास्टिक, थर्मोकोल तथा दूसरी गैर-जैविक वस्तुओं का इस्तेमाल पर्यावरण के लिए नुकसानदेह हो सकता है। ऐसी सामग्री पानी में नष्ट नहीं होती और विसर्जन के बाद लंबे समय तक कचरे के रूप में बनी रहती है।
सजावट के लिए फूल, पत्तियां, कपड़ा, कागज, जूट, बांस और लकड़ी जैसी प्राकृतिक अथवा दोबारा इस्तेमाल की जा सकने वाली सामग्री को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रतिमा पर लगे वस्त्र, आभूषण, प्लास्टिक की माला, विद्युत सामग्री और अन्य सजावट को विसर्जन से पहले अलग कर लेना चाहिए।
पूजा सामग्री, फूल, नारियल और कपड़े को भी प्रतिमा के साथ सीधे नदी या तालाब में प्रवाहित नहीं करना चाहिए। इन्हें नगर निगम द्वारा निर्धारित संग्रह स्थल या अलग पात्र में रखा जाना चाहिए।
प्रतिमा का आकार भी रखें सीमित
पर्यावरण अनुकूल गणेशोत्सव के लिए प्रतिमा का आकार सीमित रखना भी महत्वपूर्ण है। छोटी मिट्टी की प्रतिमा बनाने में कम प्राकृतिक संसाधन लगते हैं और उसका विसर्जन घर में बाल्टी, टब या कृत्रिम कुंड में आसानी से किया जा सकता है।
बड़ी प्रतिमाओं के निर्माण, परिवहन और विसर्जन में अधिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। विसर्जन के समय दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ सकता है। सार्वजनिक समितियों को स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित आकार, ऊंचाई और विसर्जन संबंधी नियमों का पालन करना चाहिए।
निर्धारित कुंड में ही करें विसर्जन
प्रतिमा विसर्जन के लिए नगर निगम और प्रशासन द्वारा बनाए गए कृत्रिम कुंडों एवं निर्धारित स्थलों का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे प्राकृतिक जलस्रोतों में प्रतिमा, रंग और पूजा सामग्री जाने से रोकी जा सकती है।
घर में स्थापित छोटी मिट्टी की प्रतिमा का विसर्जन किसी साफ पात्र में किया जा सकता है। मिट्टी घुलने के बाद उस पानी और मिट्टी को पौधों या बगीचे में उपयोग किया जा सकता है, बशर्ते प्रतिमा में कोई जहरीला रंग या हानिकारक सामग्री इस्तेमाल न हुई हो।
प्राकृतिक नदी, तालाब या जलाशय में मनमाने स्थान पर प्रतिमा विसर्जित करने से बचना चाहिए। स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी मार्ग, समय और सुरक्षा निर्देशों का पालन करना भी जरूरी है।
कारीगरों और विक्रेताओं की जिम्मेदारी
प्रतिमा निर्माण से जुड़े कारीगरों को सामग्री की सही जानकारी ग्राहकों को देनी चाहिए। यदि प्रतिमा प्राकृतिक मिट्टी से बनी है और उसमें सुरक्षित रंगों का उपयोग हुआ है तो इसका स्पष्ट उल्लेख किया जा सकता है।
विक्रेताओं को ऐसी प्रतिमाओं की बिक्री से बचना चाहिए, जो स्थानीय नियमों के अनुसार प्रतिबंधित सामग्री से बनाई गई हों। बाजार में पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाओं को आकर्षक और किफायती बनाना भी आवश्यक है, ताकि लोग उन्हें आसानी से अपना सकें।
प्रशासन को केवल कार्रवाई करने के बजाय कारीगरों के लिए प्रशिक्षण शिविर, प्राकृतिक रंगों की जानकारी और मिट्टी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में भी प्रयास करना चाहिए।
श्रद्धालुओं और पूजा समितियों की भी अहम भूमिका
पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल प्रशासन या प्रतिमा निर्माता की नहीं है। श्रद्धालुओं और सार्वजनिक गणेशोत्सव समितियों को भी प्रतिमा खरीदने से पहले उसकी सामग्री, रंग और सजावट की जांच करनी चाहिए।
पूजा समितियों को पंडाल में गीले और सूखे कचरे के लिए अलग व्यवस्था करनी चाहिए। विसर्जन के बाद फूल, कपड़े और सजावटी सामग्री को जलस्रोत में छोड़ने के बजाय उनका सुरक्षित निस्तारण किया जाना चाहिए।
गणेशोत्सव की वास्तविक भावना प्रकृति और समाज के कल्याण से जुड़ी है। प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमा, सुरक्षित रंग, सीमित सजावट और निर्धारित स्थान पर विसर्जन जैसे छोटे कदम जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यदि कारीगर, विक्रेता, पूजा समितियां, श्रद्धालु और प्रशासन मिलकर नियमों का पालन करें तो आस्था के साथ पर्यावरण की रक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है।
