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Ashta सिविल अस्पताल में आयुष्मान योजना का बड़ा घोटाला, 47 लाख से अधिक का गबन उजागर

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Published On: 3 February 2026
Major Fraud in Ayushman Scheme at Ashta Civil Hospital, Over ₹47 Lakh Embezzled
— Major Fraud in Ayushman Scheme at Ashta Civil Hospital, Over ₹47 Lakh Embezzled

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Ashta सिविल अस्पताल में आयुष्मान योजना का बड़ा घोटाला, 47 लाख से अधिक का गबन उजागर

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के Ashta सिविल अस्पताल में आयुष्मान भारत योजना के तहत एक गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। बीएमओ डॉ. अमित माथुर ने तत्परता दिखाते हुए इस पूरे घोटाले का खुलासा किया और मुख्य आरोपितों को पकड़ लिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए, डॉ. माथुर ने वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत सूचित किया और आगे की कड़ी कार्रवाई के लिए विस्तृत प्रतिवेदन भेज दिया।

घोटाले की जांच में सामने आया कि स्टोर इंचार्ज प्रमोद परमार और पूर्व आयुष्मान मित्र जगदीश मेवाड़ा ने मिलकर एक सुनियोजित योजना के तहत डॉक्टरों और नर्सों के हक का भुगतान अपने या अपने करीबी रिश्तेदारों के खातों में ट्रांसफर कर दिया। वर्ष 2017-18 से लेकर 2023 तक इस घोटाले में लगभग 47 लाख रुपए से अधिक का गबन किया गया।

मुख्य आरोपित और उनकी भूमिका

जांच में पता चला कि इस घोटाले में मुख्य रूप से दो व्यक्ति शामिल थे।

  • प्रमोद परमार: स्टोर इंचार्ज, जो भुगतान प्रक्रिया में सीधे शामिल था।
  • जगदीश मेवाड़ा: पूर्व आयुष्मान मित्र, जिसने घोटाले की योजना बनाई और अमल में मदद की।

इन दोनों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए न सिर्फ लाभ उठाया, बल्कि डॉक्टरों और नर्सों के मेहनताने और हक का पैसा अपने करीबी रिश्तेदारों के खातों में स्थानांतरित कर दिया।

तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

घोटाले के उजागर होने के बाद तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। भुगतान प्रक्रिया में लेखापाल (एमएल वर्मा) की “मेकर” की भूमिका और बीएमओ की “चेकर” की भूमिका प्रमुख थी। इसी प्रक्रिया के चलते तत्कालीन बीएमओ डॉ. जीडी सोनी, डॉ. सुरेश माहौर और डॉ. प्रवीर गुप्ता भी संदेह के घेरे में हैं। तकनीकी रूप से उनके आईडी, पासवर्ड और ओटीपी के बिना कोई भुगतान संभव नहीं था, जिससे उनकी संलिप्तता या लापरवाही की जांच अनिवार्य हो गई है।

सीनियर डॉक्टर और नर्स भी प्रभावित

यह घोटाला केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहा। आरोपितों ने आधा दर्जन से अधिक वरिष्ठ डॉक्टरों और कई स्टाफ नर्सों के इनसेंटिव्स को भी अपने लाभ के लिए इस्तेमाल किया। प्रभावितों में शामिल हैं:

  • डॉ. एके जैन
  • डॉ. माधवी राय
  • डॉ. शुभम दलोदरिया
  • पूर्व बीएमओ भी

इनके इनसेंटिव्स का पैसा भी रिश्तेदारों के खातों में ट्रांसफर किया गया, जिससे पूरे स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया।

जांच और कार्रवाई की तैयारी

बीएमओ डॉ. अमित माथुर ने 440 पन्नों की विस्तृत ट्रांजेक्शन लिस्ट तैयार की है और इसे वरिष्ठ अधिकारियों को सौंप दिया। इस घोटाले को सरकारी राशि के गबन और धोखाधड़ी का मामला मानते हुए, जल्द ही जांच टीम गठित की जाएगी। दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज कर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

डॉ. माथुर ने कहा कि यह मामला न केवल आष्टा सिविल अस्पताल तक सीमित है, बल्कि यह पूरे जिले के स्वास्थ्य विभाग में प्रभाव डालने वाला गंभीर घोटाला है। इस organized भ्रष्टाचार ने विभाग में कर्मचारियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भरोसे की स्थिति को भी प्रभावित किया है।

घोटाले का आर्थिक और सामाजिक प्रभाव

आयुक्तीय आंकड़ों के अनुसार, इस घोटाले में लगभग 47 लाख रुपए का गबन हुआ। यह राशि सीधे तौर पर डॉक्टरों और नर्सों के मेहनताना और उनके हक का हिस्सा थी। ऐसे घोटाले न केवल सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं, बल्कि आम जनता के हित को भी गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।

आयुष्मान भारत जैसी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य योजनाएं गरीब और वंचित वर्ग के लिए जीवन रक्षक साबित होती हैं। इन योजनाओं में हुए भ्रष्टाचार से सीधे तौर पर लाभार्थी प्रभावित होते हैं।

स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका

स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की भूमिका भी इस घोटाले में सवालों के घेरे में आई है। यह मामला यह स्पष्ट करता है कि उच्च स्तर पर निगरानी और पारदर्शिता की कमी ने भ्रष्टाचार को अंजाम देने का अवसर दिया।

डॉ. अमित माथुर के कदमों की प्रशंसा की जा रही है, जिन्होंने तत्परता और ईमानदारी से घोटाले का पर्दाफाश किया। उनका यह प्रयास अन्य स्वास्थ्य संस्थाओं के लिए भी मिसाल बन सकता है कि भ्रष्टाचार को उजागर करने में किस प्रकार प्रशासनिक सक्रियता और पारदर्शिता महत्वपूर्ण होती है।

आगे की कार्रवाई

घोटाले के खुलासे के बाद, उच्च स्तरीय जांच टीम गठित की जाएगी। इस टीम की जिम्मेदारी होगी:

  1. दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज करना
  2. पूरे घोटाले की विस्तृत जांच करना
  3. भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए नियमों और प्रक्रियाओं को कड़ा करना
  4. सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के प्रशिक्षण और निगरानी प्रणाली को सुधारना

इस घोटाले ने यह भी दर्शाया कि सरकारी योजनाओं में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही कितनी महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

Ashta सिविल अस्पताल में आयुष्मान योजना का यह घोटाला केवल एक वित्तीय अनियमितता नहीं है, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की गंभीर स्थिति को उजागर करता है। डॉक्टरों और नर्सों के मेहनताने का हक हथियाने वाली इस साजिश ने सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाया है।

डॉ. अमित माथुर की तत्परता और ईमानदारी ने इस घोटाले का पर्दाफाश किया, और अब उच्च स्तरीय जांच के जरिए दोषियों को कानून के कटघरे में लाया जाएगा। इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही ही भ्रष्टाचार को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय हैं।

 

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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