Guna में वन विभाग पर आदिवासी किसानों की मक्का की फसल बुलडोजर से नष्ट करने का आरोप, जांच और मुआवजे की मांग तेज
विशनखेड़ा गांव में कार्रवाई को लेकर ग्रामीणों में आक्रोश, जनप्रतिनिधियों ने निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग उठाई
Guna । मध्यप्रदेश के गुना जिले के आरोन विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत काकरिया के ग्राम विशनखेड़ा में वन विभाग की कार्रवाई को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने आरोप लगाया है कि वन विभाग की टीम ने बिना पूर्व सूचना या नोटिस दिए आदिवासी परिवारों की खड़ी मक्का की फसल पर बुलडोजर चलाकर उसे नष्ट कर दिया। इस घटना के बाद प्रभावित परिवारों में भारी नाराजगी है और मामले की निष्पक्ष जांच तथा आर्थिक मुआवजे की मांग की जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि जिन खेतों में मक्का की फसल तैयार हो रही थी, वहां अचानक वन विभाग की टीम पहुंची और बुलडोजर से फसल को रौंद दिया। उनका आरोप है कि कार्रवाई से पहले न तो कोई लिखित नोटिस दिया गया और न ही किसानों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला।
आदिवासी परिवारों ने लगाया आजीविका पर संकट का आरोप
स्थानीय लोगों के अनुसार प्रभावित परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं और खेती ही उनकी आय का प्रमुख स्रोत है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने मेहनत और संसाधनों से मक्का की फसल तैयार की थी, जिससे उन्हें इस वर्ष आय की उम्मीद थी। फसल नष्ट होने के बाद उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि इस कार्रवाई से कई परिवारों की सालभर की मेहनत पर पानी फिर गया। उनका कहना है कि फसल की बर्बादी से केवल आर्थिक नुकसान ही नहीं हुआ, बल्कि उनके परिवारों के सामने आजीविका का भी संकट पैदा हो गया है।
बिना नोटिस कार्रवाई का आरोप
ग्रामीणों और स्थानीय प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि किसी भूमि को लेकर विवाद या वन विभाग की कोई आपत्ति थी, तो संबंधित परिवारों को पहले कानूनी प्रक्रिया के तहत नोटिस दिया जाना चाहिए था। उनका आरोप है कि बिना पूर्व सूचना सीधे बुलडोजर चलाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
उनका कहना है कि यदि प्रशासन पहले सूचना देता, तो प्रभावित परिवार अपना पक्ष रख सकते थे या वैधानिक प्रक्रिया का पालन कर सकते थे।

जनप्रतिनिधियों ने उठाई निष्पक्ष जांच की मांग
मामले के सामने आने के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने घटना की उच्च स्तरीय एवं निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि कार्रवाई नियमानुसार की गई है तो उसके सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं, और यदि प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है तो जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई की जाए।
उन्होंने कहा कि प्रशासन को पूरे मामले की पारदर्शी जांच कर सच्चाई सामने लानी चाहिए, ताकि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।
मुआवजे की उठी मांग
प्रभावित परिवारों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने मांग की है कि यदि जांच में किसानों की फसल को अनुचित तरीके से नुकसान पहुंचाया जाना पाया जाता है, तो नुकसान का आकलन कर उन्हें शीघ्र उचित मुआवजा दिया जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि खेती उनकी जीविका का मुख्य साधन है और फसल की क्षति की भरपाई किए बिना उनके लिए सामान्य जीवनयापन करना कठिन होगा।
‘जल, जंगल, जमीन’ के अधिकारों का मुद्दा भी उठा
घटना के बाद कुछ सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों ने आदिवासी समुदाय के ‘जल, जंगल और जमीन’ से जुड़े अधिकारों का भी मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि आदिवासी समुदाय के अधिकारों और कानूनी संरक्षण का सम्मान किया जाना चाहिए तथा किसी भी कार्रवाई में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि भविष्य में ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले संबंधित पक्षों को पर्याप्त सूचना और सुनवाई का अवसर दिया जाए।
वन विभाग का पक्ष आना बाकी
समाचार लिखे जाने तक इस मामले में वन विभाग की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी थी। विभाग का पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कार्रवाई किन परिस्थितियों में की गई, क्या संबंधित भूमि वन क्षेत्र में आती थी और क्या सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था।
यदि वन विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी किया जाता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
प्रशासन से त्वरित हस्तक्षेप की मांग
स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रशासन को दोनों पक्षों की बात सुनकर निष्पक्ष निर्णय लेना चाहिए ताकि प्रभावित परिवारों को न्याय मिल सके और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सके।
फिलहाल यह मामला क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है और सभी की निगाहें प्रशासन एवं वन विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
