श्रीमती शकुंतला बोहरा के नेत्रदान से दो व्यक्तियों को मिलेगी रोशनी:
Mahidpur रोड स्थित पंजाबी मोहल्ला कॉलोनी की निवासी श्रीमती स्व. शकुंतला बोहरा (63 वर्ष), जो श्री सुरेश जी बोहरा की धर्मपत्नी थीं, का स्वर्गवास 26 जनवरी 2026 को हुआ। अपने निधन के बाद, उनके परिवार ने एक महत्वपूर्ण और परोपकारी कदम उठाते हुए उनकी आंखों को दान करने का निर्णय लिया। इस कार्य के माध्यम से दो लोगों को अपनी खोई हुई दृष्टि पुनः प्राप्त होगी, जो उनके जीवन में रोशनी की नई किरण लेकर आएगा।
नेत्रदान की स्वीकृति और परिवार का समर्थन
श्रीमती बोहरा के सुपुत्र श्री नितिन बोहरा ने अपनी मां के नेत्रदान के लिए सहमति दी। यह निर्णय ना सिर्फ एक निजी बलिदान था, बल्कि यह समाज के प्रति उनके परिवार की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का प्रतीक भी था। यह जानकारी नेत्रदान, अंगदान और देहदान के प्रेरक श्री जवाहर डोसी और पीयूष पत्रकार महिदपुर को भेजी गई, जिनके मार्गदर्शन में यह कार्य संपन्न हुआ।
समिति द्वारा नेत्र उत्सर्जन का कार्य
श्रीमती बोहरा के परिवार द्वारा किए गए इस पुण्य कार्य को साकार रूप देने के लिए 26 जनवरी 2026 को गीता भवन न्यास समिति ने एक टीम बनाई। इस टीम में गीता भवन न्यास समिति के नेत्रदान/देहदान प्रभारी डॉ. जी एल ददरवाल, अजय कुमार चोरडिया, सचिन भंडारी (पत्रकार), राजेश कुमार, मनीष जी तलाच, और परमानंद जी पंवार ने मिलकर नेत्र उत्सर्जन का कार्य किया। यह कार्य सुबह 9:58 बजे शुरू हुआ और सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
समाज और परिवार की सराहना
इस महान कार्य के लिए गीता भवन न्यास समिति के अध्यक्ष श्री हरिकिशन मेलवाणी ने श्रीमती बोहरा के परिवार का आभार व्यक्त किया। उन्होंने इस परोपकारी कार्य के लिए बोहरा परिवार की सराहना की और कहा कि इस कठिन समय में भी उनके परिवार ने न सिर्फ अपनी मां के शरीर को दान किया, बल्कि समाज के दो अनजान लोगों के जीवन को रोशन किया।
नेत्रदान जैसे दान से न सिर्फ दो व्यक्तियों के जीवन में उजाला आता है, बल्कि यह समाज में मानवता और परोपकार की भावना को भी मजबूत करता है। यह कृत्य न केवल मेडिकल दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है, जो जीवन के अंतिम समय में भी दूसरों के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं।
समाज में परोपकारिता का संदेश
नेत्रदान के प्रति जागरूकता फैलाने और इसके महत्व को समझने के लिए यह कदम काफी महत्वपूर्ण है। जब व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम समय में भी दूसरों के भले के लिए अपना शरीर दान करता है, तो यह एक अमूल्य उपहार होता है। इस तरह के दान से न केवल दाता की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि इससे समाज में भी एक सकारात्मक संदेश जाता है। श्रीमती बोहरा के परिवार ने इस उदाहरण से यह साबित किया कि जीवन की हर कठिनाई से जूझते हुए भी अगर हम दूसरों की मदद के लिए तैयार हों, तो हमें आत्मिक संतोष और शांति मिलती है।
सभी को मिलकर उठानी चाहिए जिम्मेदारी
नेत्रदान का संदेश समाज में और व्यापक स्तर पर फैलाने की आवश्यकता है। इससे न केवल एक व्यक्ति को दृष्टि मिलती है, बल्कि यह समाज में एकजुटता और मानवता के महत्व को भी बढ़ाता है। गीता भवन न्यास समिति और इस कार्य में लगे सभी लोगों ने समाज में परोपकारिता का उदाहरण प्रस्तुत किया है, और यह दिखाया है कि किसी भी व्यक्ति का योगदान समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।
प्रेरणा स्रोत: श्रीमती बोहरा का परिवार
श्रीमती बोहरा के परिवार द्वारा उठाया गया यह कदम न केवल उनके व्यक्तिगत दुख को पार करने का एक तरीका था, बल्कि यह उनके द्वारा समाज की सेवा का एक अनमोल उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। इस पहल से न सिर्फ उन दो व्यक्तियों को दृष्टि मिलेगी, जिनके जीवन में अंधकार था, बल्कि इससे अन्य परिवारों को भी प्रेरणा मिलेगी कि वे भी अपने प्रियजनों के देहदान और नेत्रदान के माध्यम से दूसरों की मदद करें।
समाज में इस प्रकार के दान के बारे में और अधिक जागरूकता फैलाने की जरूरत है। श्रीमती बोहरा के परिवार की तरह, यदि और लोग नेत्रदान या अंगदान करने का निर्णय लें, तो यह समाज में एक नई रोशनी लेकर आएगा, और जीवन में आ रही समस्याओं का समाधान भी मिलेगा।
अंतिम शब्द
सच में, श्रीमती बोहरा के परिवार का यह कदम समाज के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है। एक परिवार द्वारा किया गया यह नेक कार्य न केवल दो जीवनों को रोशन करेगा, बल्कि समाज में परोपकार की भावना को भी जीवित रखेगा। यह एक ऐसा उदाहरण है, जिसे सभी को अपनाना चाहिए।
