कल्पसूत्र महाशास्त्र के प्रवचन में भगवान महावीर के 27 भवों का वर्णन
कर्म सत्ता किसी को नहीं छोड़ती, राजा हो या रंक सभी को भोगना पड़ता है कर्मों का फल : साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी
महिदपुर रोड। पर्युषण महापर्व के चौथे दिन आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब आदि ठाणा ने कल्पसूत्र महाशास्त्र के माध्यम से श्रद्धालुओं को जिनवाणी का श्रवण कराया। उन्होंने भगवान महावीर स्वामी के 27 भवों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कर्म सिद्धांत का महत्व समझाया।
साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी ने कहा कि भगवान महावीर के तीसरे भव में बंधे हुए कर्म उनके 27वें भव में उदय में आए। इससे स्पष्ट होता है कि कर्म सत्ता किसी को नहीं छोड़ती। व्यक्ति चाहे राजा हो या रंक, सभी को अपने किए गए कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को अच्छे कर्म करने, धर्म के मार्ग पर चलने और जीवन में अहिंसा, सत्य, संयम तथा करुणा को अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने प्रत्येक कार्य के परिणाम के प्रति सजग रहना चाहिए, क्योंकि कर्मों का प्रभाव वर्तमान जीवन के साथ आने वाले भवों पर भी पड़ता है।
कल्पसूत्र महाशास्त्र की शोभायात्रा निकाली
जैन समाज के मीडिया प्रभारी सचिन भंडारी ने बताया कि शुक्रवार को संदीप कुमार, प्रणय कुमार चत्तर परिवार के निवास पर समाजजनों की उपस्थिति में भक्ति कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसके बाद सुबह लाभार्थी परिवार के निवास से पोथाजी कल्पसूत्र महाशास्त्र की शोभायात्रा निकाली गई।
शोभायात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई महाराणा प्रताप बस स्टैंड पहुंची। यहां लाभार्थी परिवार द्वारा परम पूज्य साध्वीजी को कल्पसूत्र महाशास्त्र वोहराया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ भगवान और जिनवाणी के जयकारे लगाए।
अष्टप्रकारी पूजन और आरती हुई
कार्यक्रम के दौरान पांच ज्ञानों की पूजा, अष्टप्रकारी पूजन और आरती की गई। श्रद्धालुओं ने धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता कर पुण्य लाभ अर्जित किया। शुक्रवार की स्नात्र पूजा, अंगरचना और प्रभावना का लाभ प्रकाशचंद, आलोक कुमार, अरविंद कुमार बरड़िया परिवार तथा प्रकाशचंद, प्रांजल कुमार और प्रशांत कुमार बोहरा परिवार ने लिया।
पर्युषण महापर्व के अंतर्गत आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में सकल जैन श्रीसंघ के महिला-पुरुष और युवाओं ने बड़ी संख्या में सहभागिता की। श्रद्धालुओं ने साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब के प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
