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विरोध करने वाले और अपशब्द कहने वाले में भी गुण देखने का प्रयास करें: मुनि श्री

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Published On: 4 September 2026
विरोध करने वाले और अपशब्द कहने वाले में भी गुण देखने का प्रयास करें: मुनि श्री

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विरोध करने वाले और अपशब्द कहने वाले में भी गुण देखने का प्रयास करें: मुनि श्री

राजेश जैन दद्दू
इंदौर। दलालबाग में चातुर्मास कर रहे श्रमण संस्कृति के महा ऋषि मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी महाराज ने आज शुक्रवार को धर्म सभा में कहा कि दूसरों में दुर्गुण खोजने के बजाय पहले स्वयं के भीतर झांकिये किसी अन्य व्यक्ति मैं दुर्गुण नहीं देखें।
अपने भगवान में गुण देखिए, अपने गुरु में गुण देखिए, धर्म में गुण देखिए और संसार के प्रत्येक जीव में भी किसी न किसी गुण को देखने का प्रयास करें।

जो आपका विरोध करता है, उसमें भी कोई गुण खोजिए।
जो आपको अपशब्द कहता है, उसमें भी कोई गुण देखने का प्रयास कीजिए।
जिससे आपका मतभेद है, उसमें भी कोई गुण खोजिए।

महाराज श्री ने कहा कि आसान परिस्थिति में गुण देखना बड़ी बात नहीं है। वास्तविक परीक्षा तब है जब कोई व्यक्ति आपको परेशान कर रहा हो और फिर भी आप उसके भीतर कोई गुण देख सकें।

इसी भाव को समझाने के लिए उन्होंने मच्छर का उदाहरण देते हुए कहा कि मच्छर काट रहा हो, तब भी उसमें कोई गुण देखने का प्रयास करो। अर्थात परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत हो, अपनी दृष्टि को दोष-दर्शन से गुण-दर्शन की ओर ले जाना है
महाराज श्री ने कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन से प्रश्न करना चाहिये।

“मैंने आज तक क्या किया? क्रोध, मान, माया, लोभ, राग-द्वेष के अलावा मैंने आत्मकल्याण के लिए कितना किया?”

जिस दिन यह प्रश्न भीतर से उठेगा, उस दिन अहंकार कमजोर होगा और आत्मदर्शन मजबूत होगा।
महाराज श्री ने अपने प्रवचन में धर्ममार्ग की एक और महत्वपूर्ण बात समझाई कि सही मंजिल के लिए सही रास्ता चुनना आवश्यक है। जीवन में जल्दी मंजिल पाने की इच्छा में गलत मार्ग पर नहीं चलना चाहिए।
मुनि श्री ने कहा कि धर्म कार्य में, मंदिर में एवं गुरु के सामने वीआइपी मत बनो भगवान और गुरु के सामने व्यक्ति को अपना पद, प्रतिष्ठा और अहंकार छोड़कर केवल भक्त बनकर विनम्रता का परिचय देना चाहिए।
धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को यह भी समझना चाहिए कि जीवन में संकट आएंगे। संकट आने पर धर्म छोड़ देना साधना नहीं है। सुख में धर्म करना आसान है, लेकिन दुख और संकट में भी धर्म पर अडिग रहना ही सच्चे धर्मात्मा की पहचान है।

धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि महाराज श्री ने कहा कि जीवन में आने वाले सुख-दुख को देखकर धर्म को दोष देना उचित नहीं है।
पूर्वकृत कर्मों का परिणाम हमारे जीवन में आ सकता है, लेकिन वर्तमान में किया गया धर्म हमारा पुरुषार्थ है। इसलिए कोई संकट आ जाए तो यह मत सोचिए कि धर्म फलता नहीं है।
धर्म सुख में भी धर्म है और दुख में भी धर्म है। सम्मान में भी
धर्म है और अपमान में भी धर्म है।

महाराज श्री ने कहा कि श्रीराम के जीवन में वनवास और अनेक संकट आए, लेकिन उन्होंने धर्म नहीं छोड़ा। पार्श्वनाथ भगवान पर कमठ के उपसर्ग आए, लेकिन उनकी साधना और समता नहीं डिगी। बाहुबली की तपस्या में शरीर पर बेलें चढ़ गईं, फिर भी उनका ध्यान नहीं टूटा।

इन महापुरुषों का जीवन हमें सिखाता है कि धर्म का मार्ग संकटों से खाली नहीं है, लेकिन संकटों के बीच धर्म पर टिके रहना ही वास्तविक साधना है, इसलिए जीवन में संकट आए तो घबराएं नहीं। धर्मात्मा जीवन में कितने भी संकट आ जाएं धर्म से कभी विमुख नहीं होता संकटों का सामना करता है और भगवान, गुरु और धर्म का स्मरण करते हुए अपनी साधना को और मजबूत करता है‌।
दूसरों के दोष देखने से पहले अपने दोष देखिए।

संसार को बदलने से पहले अपनी दृष्टि बदलिए।
दूसरों में अवगुण खोजने के बजाय गुण खोजिये और सही मंजिल के लिए सही रास्ते को पहचानिए।
मैं अच्छा और संसार बुरा इस दृष्टि को छोड़कर मैं दोषपूर्ण हूँ और संसार में गुण ही गुण हैं इस दृष्टि को अपनाइए
धर्म सभा में समाज के अनेक गणमान्य समाज श्रेष्ठी उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन अनुराग जैन ने किया

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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