खाने और सोने के बीच रखें दो से ढाई घंटे का अंतर, लंबे समय तक खाली पेट भी न रहें
भोपाल। भोजन का समय, सोने की आदत और दिनभर की गतिविधियां सेहत पर असर डालती हैं। अनियमित दिनचर्या के बीच खांसी, पाचन संबंधी परेशानी और बढ़ते वजन जैसी शिकायतों पर भोपाल में आयोजित ‘हेलो डॉक्टर’ कार्यक्रम में जनरल सर्जन और जनरल फिजीशियन डॉ. जेपी पालीवाल ने पाठकों के सवालों के जवाब दिए। उन्होंने भोजन के तुरंत बाद लेटने से बचने और खाने व सोने के बीच करीब दो से ढाई घंटे का अंतर रखने की सलाह दी।
भोजन के तुरंत बाद क्यों न लेटें?
डॉ. पालीवाल के अनुसार, खाने के बाद शरीर को पाचन के लिए समय देना चाहिए। भोजन करते ही बिस्तर पर चले जाने की आदत कुछ लोगों में एसिड रिफ्लक्स की परेशानी बढ़ा सकती है। एसिड रिफ्लक्स में पेट की सामग्री भोजन नली की ओर लौटती है। इससे सीने में जलन, खट्टी डकार या गले में असहजता महसूस हो सकती है।
रात में लेटने पर ऐसे लक्षण बढ़ते हों तो भोजन का समय और सोने की आदत, दोनों पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है। अमेरिकी स्वास्थ्य संस्थान एनआईडीडीके के अनुसार, रिफ्लक्स के लक्षण वाले लोगों को सोने या लेटने से करीब तीन घंटे पहले भोजन करने पर राहत मिल सकती है। अलग-अलग लोगों की स्थिति अलग होती है, इसलिए लगातार परेशानी होने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
लगातार खांसी को केवल मौसम का असर न मानें
मौसम बदलने पर खांसी होना आम बात है, लेकिन लंबे समय तक बनी रहने वाली खांसी का कारण समझना जरूरी है। डॉ. पालीवाल ने बताया कि कुछ मामलों में एसिड रिफ्लक्स भी खांसी से जुड़ा हो सकता है। हालांकि हर खांसी को रिफ्लक्स मान लेना सही नहीं होगा। संक्रमण सहित इसके दूसरे कारण भी हो सकते हैं।
यदि खांसी तीन सप्ताह से अधिक रहे, सीने में दर्द हो या खांसी के साथ खून आए, तो चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। ऐसे लक्षणों को घरेलू उपायों के भरोसे लंबे समय तक टालना ठीक नहीं है। जांच के बाद ही डॉक्टर कारण के अनुसार उपचार तय कर सकते हैं।
खाने में लंबा अंतर भी ठीक नहीं
भोजन और नींद के बीच अंतर रखने का मतलब लंबे समय तक भूखे रहना नहीं है। दिनचर्या ऐसी होनी चाहिए जिसमें व्यक्ति अपनी जरूरत के अनुसार नियमित समय पर भोजन कर सके। व्यस्तता के कारण बार-बार खाना टालना और फिर रात में बहुत देर से भोजन करना, नियमित खान-पान बनाए रखना मुश्किल कर सकता है।
डॉ. पालीवाल ने लंबे समय तक खाली पेट रहने से बचने की भी सलाह दी। भोजन का समय तय करते हुए काम, नींद और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए। जिन लोगों को पहले से कोई बीमारी है या जिनके लिए डॉक्टर ने विशेष आहार योजना बताई है, उन्हें उसी के अनुसार अपनी दिनचर्या रखनी चाहिए।
वजन बढ़ रहा है तो गतिविधि पर भी दें ध्यान
कार्यक्रम में बढ़ते वजन से जुड़े सवाल भी सामने आए। डॉ. पालीवाल ने वजन नियंत्रित रखने के लिए नियमित व्यायाम पर जोर दिया। खान-पान के साथ शारीरिक गतिविधि को दिनचर्या में जगह देना इस दिशा में एक व्यावहारिक कदम है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन वयस्कों के लिए सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि की सलाह देता है। पैदल चलना जैसी गतिविधि भी इसमें शामिल हो सकती है। व्यक्ति अपनी उम्र और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार व्यायाम चुने; किसी बीमारी या तकलीफ के कारण गतिविधि में बाधा हो तो डॉक्टर से मार्गदर्शन ले।
बच्चों की बार-बार बीमारी पर रखें नजर
डॉ. पालीवाल ने कहा कि बच्चों में बार-बार संक्रमण होने पर उनके खान-पान और दिनचर्या पर ध्यान देना चाहिए। बच्चा पर्याप्त खा रहा है या नहीं, उसकी नींद कैसी है और तकलीफ कितनी बार हो रही है—ये बातें डॉक्टर को बताने में मददगार हो सकती हैं। संक्रमण दोहराने पर केवल पुराने उपचार को फिर से अपनाने के बजाय बच्चे की जांच कराना बेहतर है।
पेट दर्द या रक्तस्राव जैसी शिकायतों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कार्यक्रम से निकला प्रमुख संदेश यही रहा कि नियमित दिनचर्या सेहत का आधार है, लेकिन लगातार बने रहने वाले लक्षणों का कारण जांच से ही स्पष्ट होता है।
