गुरु के मार्गदर्शन और निर्मल मन से संभव है ईश्वर की प्राप्ति: जया देवी जी
मनावर। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान एवं रुद्र महायज्ञ के चतुर्थ दिवस पर व्यासपीठ पर विराजमान कथा वाचिका जया देवी जी ने गुरु की महिमा, भक्ति और गृहस्थ जीवन में ईश्वर प्राप्ति पर प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि गुरु दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए थे और विभिन्न माध्यमों से शिक्षा प्राप्त की थी। गुरु के मार्गदर्शन को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए मन में प्रेम, श्रद्धा और निर्मलता होनी चाहिए। गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी भगवान की भक्ति और मोक्ष का मार्ग अपनाया जा सकता है।
गुरु दत्तात्रेय के प्रसंग से बताया सीखने का महत्व
जया देवी जी ने गुरु दत्तात्रेय के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने 24 गुरु बनाए थे। उन्होंने श्वान से शिक्षा प्राप्त करने का भी उल्लेख किया। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने गुरु और शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला।
कथा वाचिका ने कहा कि गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरु का मार्गदर्शन जीवन को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करता है। उन्होंने दिव्य दृष्टि जाग्रत होने के विषय में कहा कि ऐसी अवस्था में संसार के प्रति मोह का स्वरूप बदल जाता है। उनके प्रवचन में गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति में समर्पण का संदेश प्रमुख रहा।
गृहस्थ आश्रम में भी प्राप्त कर सकते हैं भगवान
कथा के दौरान जया देवी जी ने बताया कि गृहस्थ आश्रम में रहकर भी भगवान को प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रभु की भक्ति में लगा गृहस्थ भी मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। इसके लिए मन में प्रेम होना आवश्यक है।
उन्होंने पतिव्रता स्त्री की निष्ठा और उसके प्रभाव का उल्लेख भी किया। गृहस्थ जीवन के संदर्भ में उनका संदेश रहा कि पारिवारिक जीवन के बीच भी ईश्वर की आराधना संभव है। भगवान के प्रति प्रेम और मन की पवित्रता को उन्होंने भक्ति का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति का मन साफ होना चाहिए, तभी भक्ति के भाव को जीवन में स्थान मिल सकता है।
धन से अधिक महत्वपूर्ण है मन की निर्मलता
जया देवी जी ने अपने प्रवचन में धन और भक्ति के संबंध पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि धन के माध्यम से मिले ज्ञान और भजन से आध्यात्मिक प्राप्ति नहीं हो सकती, यदि मन में सच्चा प्रेम और निर्मलता नहीं है। उन्होंने श्रद्धालुओं को मन साफ रखने और प्रेमपूर्वक भगवान का स्मरण करने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि ‘राम-राम’ का उच्चारण भी प्रेम के भाव से जुड़ा है। भगवान का नाम लेते समय मन में प्रेम होना चाहिए। उनके अनुसार भक्ति में बाहरी साधनों से अधिक महत्व भीतर के भाव का है। प्रवचन में उन्होंने बार-बार प्रेम और साफ मन की आवश्यकता पर जोर दिया।
राजा परीक्षित और शुकदेव जी का सुनाया प्रसंग
कथा वाचिका ने राजा परीक्षित का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि उन्हें ऋषि का श्राप मिला था। श्राप के अनुसार सात दिन बाद तक्षक नाग के डसने से उनकी मृत्यु निश्चित थी। राजा परीक्षित को अपनी मृत्यु की निश्चितता का ज्ञान था।
जया देवी जी ने बताया कि इसी कारण शुकदेव जी महाराज ने राजा परीक्षित को दिन-रात कथा सुनाई। मृत्यु निश्चित होने की जानकारी के बावजूद राजा परीक्षित ने अपना मन कथा में लगा लिया। कथा सुनते हुए वे भावविभोर हो गए। इस प्रसंग के माध्यम से कथा वाचिका ने भगवान की कथा में मन लगाने और श्रद्धापूर्वक श्रवण करने का महत्व बताया।
समिति के तत्वावधान में हो रहा धार्मिक आयोजन
पितृ पक्ष के पावन पर्व पर वेदांत दर्शन सेवा समिति के तत्वावधान में महाभागवत पुराण कथा का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम में वरिष्ठ हिंदू नागरिक महासंघ का सहयोग प्राप्त है। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान एवं रुद्र महायज्ञ के चतुर्थ दिवस पर गुरु की महिमा और भक्ति से जुड़े प्रसंगों का वर्णन किया गया।
इस अवसर पर वरिष्ठ हिंदू नागरिक संगठन की ओर से रामेश्वर जी पाटीदार, टीकाराम राय, कैलाश शर्मा और जगदीश पाटीदार ने कथा वाचिका जया देवी जी का स्वागत किया तथा आशीर्वाद प्राप्त किया। चतुर्थ दिवस की कथा में गुरु के मार्गदर्शन, गृहस्थ जीवन में साधना और निर्मल मन से भगवान के प्रति प्रेम रखने का संदेश दिया गया।
