जैन दर्शन चमत्कार नहीं, चारित्र की पूजा करना सिखाता है : आचार्यश्री उदारसागर
धर्मसभा में अंधश्रद्धा से बचने और विवेक के साथ धर्म को समझने का दिया संदेश
मुरैना। परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए अमूढ़दृष्टि अंग की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने श्रद्धालुओं को धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने, अंधश्रद्धा से बचने और सत्य-असत्य के बीच विवेकपूर्ण अंतर करने का संदेश दिया।
आचार्यश्री ने कहा कि मूढ़ता अर्थात अज्ञानता और विवेकहीनता से रहित दृष्टि को अमूढ़दृष्टि कहा जाता है। मनुष्य के जीवन में यह आवश्यक है कि वह सत्य और असत्य, उचित और अनुचित तथा धर्म और अधर्म के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित करे। मिथ्या मार्ग और उस मार्ग पर चलने वालों की मन, वचन और काय से प्रशंसा न करना ही सम्यक् दृष्टि का महत्वपूर्ण लक्षण है।
ज्ञान और विवेक के आधार पर हो श्रद्धा
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि जैन दर्शन केवल किसी बात को परंपरा या मान्यता के आधार पर स्वीकार करने की शिक्षा नहीं देता। जैन दर्शन तत्त्वज्ञान और विवेक के आधार पर सत्य को समझने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि जिन समीचीन तत्त्वों का हमें ज्ञान प्राप्त हुआ है, हमारी श्रद्धा भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए। यदि ज्ञान कुछ और कहता है और श्रद्धा किसी दूसरी दिशा में चली जाती है तो वहां सम्यक्दर्शन की पूर्णता नहीं हो सकती।
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि धर्म को केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर स्वीकार करने के बजाय उसके वास्तविक स्वरूप को समझना चाहिए। किसी भी धार्मिक मान्यता को अपनाने से पहले उसके पीछे छिपे तत्त्व और उद्देश्य को समझना आवश्यक है।
चमत्कार नहीं, चारित्र को बनाएं आधार
धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि आज मनुष्य चमत्कारों से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता है। किसी व्यक्ति के संबंध में कोई असाधारण बात सुनकर या किसी स्थान को चमत्कारी बताए जाने पर लोग वहां आस्था जोड़ लेते हैं।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि जैन दर्शन हमें चमत्कार के पीछे चलने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि चारित्र और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना सिखाता है।
जैन दर्शन चमत्कार की पूजा नहीं, बल्कि चारित्र की पूजा करना सिखाता है।
आचार्यश्री ने कहा कि जिस व्यक्ति के जीवन में संयम, त्याग, अहिंसा, सत्य और आत्मशुद्धि जैसे गुण हैं, वही वास्तव में सम्मान और अनुकरण का पात्र है। बाहरी चमत्कारों की अपेक्षा व्यक्ति के आचरण और चरित्र को महत्व देना चाहिए।
स्वार्थ नहीं, परमार्थ की दृष्टि जरूरी
आचार्यश्री ने कहा कि स्वार्थी व्यक्ति अपने लाभ को सर्वोपरि मानता है। उसे इस बात की चिंता कम रहती है कि उसके द्वारा अपनाया गया मार्ग उचित है या अनुचित। इसके विपरीत विवेकशील व्यक्ति अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानकर परमार्थ की दिशा में आगे बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि हमें जीवन में उन्हीं साधनों और मान्यताओं को स्वीकार करना चाहिए, जो हमें आत्मकल्याण की ओर ले जाएं। सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए मिथ्या मान्यताओं, अंधविश्वासों और कुप्रथाओं का सहारा लेना आत्मकल्याण का मार्ग नहीं हो सकता।
आचार्यश्री ने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु परमार्थ के वास्तविक आधार हैं। इनके द्वारा बताए गए मार्ग को समझना और उसे अपने जीवन में उतारना ही सच्चे धर्म की दिशा है।

‘टांगी बाबा’ का उदाहरण देकर समझाई अंधश्रद्धा
अमूढ़दृष्टि के स्वरूप को सरल तरीके से समझाने के लिए आचार्यश्री ने ‘टांगी बाबा’ का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति घर से बाहर गया तो उसने रेस्ट हाउस के पास एक स्थान देखा, जिसे लोग ‘टांगी बाबा’ का स्थान मानने लगे थे।
आचार्यश्री के अनुसार, वहां वास्तव में कोई बाबा नहीं था। कुछ समय पहले उसी स्थान पर एक कुत्ते की मृत्यु हो गई थी। एक व्यक्ति ने वहां फूल चढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे दूसरे लोगों ने भी उसका अनुसरण करना शुरू कर दिया और कुछ समय बाद वह स्थान ‘टांगी बाबा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
उन्होंने इस उदाहरण के माध्यम से समझाया कि किसी बात को बार-बार कहे जाने और बड़ी संख्या में लोगों द्वारा स्वीकार किए जाने से वह सत्य नहीं बन जाती। कई बार लोकप्रचलित मान्यता की वास्तविकता कुछ और हो सकती है।
प्रसिद्धि नहीं, सत्य को बनाएं कसौटी
आचार्यश्री ने कहा कि धर्म के क्षेत्र में भी केवल लोकप्रचलित बातों को देखकर विश्वास नहीं करना चाहिए। प्रसिद्धि सत्य की कसौटी नहीं है। किसी भी मान्यता को तत्त्वज्ञान और विवेक की कसौटी पर परखना जरूरी है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि अंधश्रद्धा से बचने के लिए प्रत्येक धार्मिक मान्यता को तत्त्वज्ञान की दृष्टि से समझना चाहिए। किसी मिथ्या देवी-देवता या चमत्कारी स्थान से सांसारिक लाभ की अपेक्षा करना और उसके पीछे अपनी श्रद्धा लगा देना सम्यक् श्रद्धान नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने कहा कि अमूढ़दृष्टि हमें सिखाती है कि किसी मिथ्या मान्यता, कुपथ या अंधविश्वास से प्रभावित हुए बिना धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें।
विवेक से ही आत्मकल्याण का मार्ग
आचार्यश्री ने कहा कि जहां विवेक है, वहीं सम्यक् श्रद्धान है और जहां सम्यक् श्रद्धान है, वहीं आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए व्यक्ति को अपनी श्रद्धा को ज्ञान और विवेक से जोड़ना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि धर्म को केवल परंपरा के रूप में न अपनाएं, बल्कि उसके उद्देश्य और सिद्धांतों को समझकर जीवन में उतारें। संयम, त्याग, अहिंसा, सत्य और आत्मशुद्धि जैसे गुणों को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाना ही धर्म की सार्थकता है।
एकाग्रचित्त होकर सुने प्रवचन
धर्मसभा का सफल संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री ने किया। कार्यक्रम के प्रारंभ में सम्माननीय जनों द्वारा चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया। मंगलाचरण श्रीमती गुंजन जैन ने प्रस्तुत किया।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री उदारसागर महाराज के प्रवचनों को एकाग्रचित्त होकर सुना। पूरे आयोजन के दौरान धर्म, विवेक, आत्मकल्याण और अंधश्रद्धा से बचने का संदेश प्रमुख रूप से सामने आया।

