महावीर साधना संस्थान की रिट याचिका मंजूर
जयपुर, 8 मई। महावीर साधना संस्थान, महावीर नगर, जयपुर की रिट याचिका को स्वीकार करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी परिसर में केवल Jain प्रतिमाओं की स्थापना मात्र से उस भूमि को “विशेष धार्मिक उपयोग” की श्रेणी में नहीं माना जा सकता, जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि उस परिसर का उपयोग पूर्णतः किसी एक धर्म विशेष के अनुयायियों तक सीमित कर दिया गया है।
भूमि उपयोग पर अदालत की स्पष्ट व्याख्या
न्यायालय ने अपने निर्णय में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि किसी भी भूमि या परिसर के स्वरूप का निर्धारण केवल वहां स्थापित धार्मिक प्रतीकों के आधार पर नहीं किया जा सकता। वास्तविक परीक्षण यह होना चाहिए कि उस परिसर का व्यावहारिक और प्रमुख उपयोग क्या है।
अदालत ने कहा कि यदि किसी स्थान पर योग कक्षाएं, सामाजिक कार्यक्रम, सांस्कृतिक आयोजन, शोक सभाएं एवं अन्य सार्वजनिक गतिविधियां नियमित रूप से आयोजित की जा रही हैं, तो उसे केवल धार्मिक परिसर मानना उचित नहीं होगा।
“फैसिलिटी एरिया” का उपयोग महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवादित “फैसिलिटी एरिया” का प्रमुख उपयोग सार्वजनिक और सामुदायिक गतिविधियों के लिए होना चाहिए। ऐसे स्थानों को केवल धार्मिक दृष्टि से सीमित करना कानून की गलत व्याख्या होगी।
न्यायालय ने कहा कि वर्ष 2015 के पूर्व आदेश में भी केवल यह निर्देश था कि उक्त क्षेत्र का उपयोग किसी एक धर्म विशेष तक सीमित नहीं होना चाहिए, न कि धार्मिक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
प्रतिमाओं की स्थापना निर्णायक नहीं
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट शब्दों में कहा—
“प्रतिमाओं की स्थापना अपने आप में निर्णायक कसौटी नहीं है। वास्तविक परीक्षण यह है कि संपत्ति का प्रमुख एवं वास्तविक उपयोग क्या है।”
इस टिप्पणी के माध्यम से न्यायालय ने यह संदेश दिया कि धार्मिक प्रतीकों की उपस्थिति मात्र से किसी स्थान का स्वरूप नहीं बदला जा सकता।
सार्वजनिक उपयोग की गतिविधियों को मान्यता
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों का अवलोकन करते हुए पाया कि संबंधित परिसर में योग कक्षाएं, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां नियमित रूप से आयोजित होती रही हैं। साथ ही यह भी तथ्य सामने आया कि परिसर आम जनता के लिए खुला है।
इन्हीं आधारों पर अदालत ने कहा कि केवल प्रतिमाओं की स्थापना के आधार पर प्रतिबंधात्मक आदेश देना विधि की गलत व्याख्या है।
विविधता और सह-अस्तित्व पर टिप्पणी
निर्णय में अदालत ने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह देश अनेक धर्मों और संस्कृतियों का संगम है। यहां अनेक ऐसे स्थल हैं जो धार्मिक स्वरूप के बावजूद सभी समुदायों के लिए खुले रहते हैं और उन्हें सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में भी उपयोग किया जाता है।
भवन योजना और संरचना का उल्लेख
अदालत ने यह भी नोट किया कि जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) द्वारा स्वीकृत भवन योजना के अनुसार परिसर में सरस्वती भवन, जिनालय, योग सेंटर हॉल एवं पुस्तकालय का निर्माण किया गया है। यह सभी संरचनाएं सामान्य जनता के उपयोग हेतु उपलब्ध हैं।
निचली अदालत के आदेशों पर टिप्पणी
हाईकोर्ट ने वादी रेस्पॉन्डेंट शशिमाथुर के सिविल वाद एवं स्थगन प्रार्थनापत्र पर निचली अदालतों द्वारा 25 मार्च 2026 एवं 2 अप्रैल 2026 को दिए गए आदेशों को कानून की गलत व्याख्या और तथ्यों की समुचित समीक्षा न करने वाला बताते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत
पत्रकार डॉ. अखिल बंसल के अनुसार यह निर्णय सामुदायिक भवनों और सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर धार्मिक प्रतीकों की स्थापना से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत माना जा रहा है। इस फैसले से भविष्य में ऐसे मामलों की व्याख्या और दिशा तय होने की संभावना है।
