मध्यप्रदेश पेंशनरों में नाराज़गी: महंगाई राहत 2% बढ़ी लेकिन एरियर नहीं, सरकार पर भेदभाव का आरोप
भोपाल, 16 अक्टूबर 2025:
दिवाली से ठीक पहले मध्यप्रदेश सरकार ने राज्य के लाखों पेंशनरों को महंगाई राहत (डीए) में 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी का तोहफा दिया है। सरकार के मुताबिक यह बढ़ोतरी पेंशनरों की महंगाई राहत दर को 53 प्रतिशत से बढ़ाकर 55 प्रतिशत कर देगी।
हालांकि यह घोषणा राहत की बजाय असंतोष का कारण बन गई है। पेंशनर्स संगठनों का कहना है कि सरकार ने सिर्फ आंकड़ों में सुधार किया है, असल में यह निर्णय “आधा-अधूरा” और “भेदभावपूर्ण” है क्योंकि इसका एरियर नहीं दिया गया और इसे गलत तिथि से लागू किया गया है।
आदेश में गलती और भ्रम
सरकार द्वारा जारी वित्त विभाग के आदेश ने विवाद को और गहरा दिया। आदेश के हिंदी संस्करण में जहां महंगाई राहत 55 प्रतिशत लिखी गई है, वहीं अंग्रेजी संस्करण में यह दर 53 प्रतिशत दर्ज है। यह अंतर न केवल तकनीकी गलती मानी जा रही है बल्कि पेंशनरों के बीच सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठा रहा है।
पेंशनरों का कहना है कि ऐसी चूक यह दिखाती है कि सरकार उनके मामलों को गंभीरता से नहीं ले रही। वे मानते हैं कि जब पेंशन से जुड़ी नीतियों में ही भ्रम रहेगा तो पारदर्शिता और विश्वास कैसे कायम रहेगा।
एरियर न मिलने से नाराज़गी
पेंशनरों का सबसे बड़ा आरोप है कि महंगाई राहत की बढ़ोतरी के बावजूद एरियर का भुगतान नहीं किया जा रहा। इससे पहले भी कई बार ऐसा हुआ कि राज्य कर्मचारियों को एरियर दिया गया, लेकिन पेंशनरों को इससे वंचित रखा गया।
राज्य पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष आमोद सक्सेना का कहना है कि सरकार बार-बार पेंशनरों के साथ भेदभाव कर रही है। उन्होंने बताया कि इस बार भी राहत जनवरी 2025 की जगह सितंबर 2025 से लागू की गई है, जबकि केंद्र सरकार की तिथि को अपनाया जाना चाहिए था।
कानूनी और प्रशासनिक विवाद
संरक्षक गणेश दत्त जोशी ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 की गलत व्याख्या कर पेंशनरों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है। उनके अनुसार, 1 नवंबर 2000 से पहले सेवानिवृत्त पेंशनरों पर अधिनियम की अनुसूची 6 लागू होती है, जबकि सरकार इसे बाद के पेंशनरों पर भी थोप रही है, जो सीधा भेदभाव है।
उन्होंने कहा कि यह न केवल प्रशासनिक त्रुटि है बल्कि कानून के मूल सिद्धांतों के भी विपरीत है।
“कर्मचारियों को एरियर, पेंशनरों को वंचित क्यों?”
राज्य राजपत्रित अधिकारी संघ के प्रांतीय संयोजक एम.के. सक्सेना ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि जब सरकार कर्मचारियों को डीए एरियर देती है तो पेंशनरों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि लगभग 5 लाख पेंशनर इस निर्णय से प्रभावित हुए हैं।
सक्सेना का कहना है,
“सरकार कर्मचारियों और पेंशनरों में दोहरी नीति अपना रही है। यह न्यायसंगत नहीं है। जब तक पेंशनरों को केंद्रीय दर के अनुरूप राहत नहीं दी जाएगी, तब तक इसे न्याय नहीं कहा जा सकता।”
पेंशनरों की प्रमुख मांगें
पेंशनरों ने सरकार से अपनी चार प्रमुख मांगें रखी हैं —
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महंगाई राहत को जनवरी 2025 से लागू किया जाए, ताकि इसे केंद्र के अनुरूप बनाया जा सके।
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सभी महीनों का एरियर तुरंत भुगतान किया जाए।
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कर्मचारियों के समान लाभ पेंशनरों को भी दिए जाएं।
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वित्त विभाग के आदेशों में भाषा और प्रतिशत की त्रुटियाँ सुधारी जाएं, ताकि कोई भ्रम न रहे।
पेंशनरों का कहना है कि अगर इन बिंदुओं पर सरकार ठोस कदम नहीं उठाती, तो वे राज्यव्यापी विरोध की रणनीति बना सकते हैं।
विवादित बिंदु: राहत या दिखावा?
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प्रभावी तिथि का विवाद:
केंद्र के विपरीत राज्य ने डीए को सितंबर से लागू किया है, जबकि कर्मचारियों को जनवरी से लाभ मिला। यह पेंशनरों के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन रहा है। -
एरियर भुगतान का अभाव:
डीए बढ़ोतरी के साथ एरियर न मिलने से राहत का असर कम हो गया है। कई पेंशनरों के लिए यह सिर्फ 300 से 800 रुपये की मामूली वृद्धि बनकर रह गई है। -
आदेश की त्रुटि:
53% और 55% के बीच अंतर ने आदेश की विश्वसनीयता को कमजोर किया है। -
भेदभाव की भावना:
कर्मचारियों और पेंशनरों के बीच बार-बार अंतर करने से असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
पेंशनरों की आवाज़: “यह राहत नहीं, छलावा है”
कई पेंशनरों ने इसे “राहत नहीं, छलावा” कहा है। उनका कहना है कि सरकार सिर्फ औपचारिकता निभा रही है।
इंदौर निवासी शिवकुमार शर्मा, जो 2003 में सेवानिवृत्त हुए थे, कहते हैं —
“महंगाई राहत बढ़ाने की बात सुनकर खुशी हुई थी, लेकिन जब एरियर का जिक्र नहीं मिला तो लगा जैसे सरकार सिर्फ दिखावा कर रही है। हमारी मेहनत की कमाई का सम्मान होना चाहिए।”
ग्वालियर की पेंशनर शशि अग्रवाल कहती हैं —
“हर बार सरकार त्योहारी सीजन में डीए की घोषणा करती है, लेकिन जब पैसा समय पर नहीं मिलता तो इसका कोई मतलब नहीं रह जाता। हमें दिखावटी घोषणाएँ नहीं, वास्तविक राहत चाहिए।”
सरकार के सामने चुनौती
राज्य सरकार के लिए यह मामला केवल वित्तीय नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील बन गया है। चुनावी वर्ष की तैयारी में लगी सरकार दिवाली से पहले जनता को खुश करने की कोशिश कर रही है, लेकिन पेंशनरों की नाराज़गी इसका विपरीत असर डाल सकती है।
वित्त विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि राज्य की वित्तीय स्थिति अभी सीमित है, और एरियर देने पर राजकोष पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। लेकिन पेंशनर संगठन इसे बहाना मानते हैं और कहते हैं कि जब कर्मचारियों को समय पर भुगतान किया जा सकता है तो पेंशनरों के साथ भेदभाव क्यों?
समाधान की राह
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को पारदर्शिता अपनाते हुए निम्न कदम उठाने चाहिए —
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आदेश में हुई त्रुटियों को तुरंत सुधारना।
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डीए बढ़ोतरी को केंद्र सरकार की तिथि से लागू करना।
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एरियर भुगतान का एक चरणबद्ध रोडमैप बनाना।
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पेंशनर संगठनों से सीधे संवाद स्थापित करना।
यदि सरकार समय रहते इन मांगों को संबोधित करती है तो पेंशनरों का विश्वास वापस पाया जा सकता है।
निष्कर्ष
मध्यप्रदेश सरकार का यह निर्णय भले ही कागज पर राहत का संदेश देता हो, लेकिन जमीनी हकीकत में पेंशनरों के लिए यह “अधूरी खुशी” साबित हो रहा है। एरियर न मिलने, तिथि में भेद और आदेश की त्रुटियों ने इस कदम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पेंशनरों की नाराज़गी धीरे-धीरे एक संगठित आंदोलन का रूप ले सकती है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह शीघ्र कार्रवाई करे और यह सुनिश्चित करे कि पेंशनरों के साथ कोई भेदभाव न हो — क्योंकि यही वह वर्ग है जिसने अपनी पूरी सेवा राज्य के लिए समर्पित की है।

